"आवृष्टिकर्मकर्माणि" कक्षा नौ की संस्कृत पाठ्यपुस्तक शेमुषी का द्वितीय पाठ है। यह एक गद्य पाठ है, जिसमें वर्षा (वृष्टि) से सम्बन्धित विभिन्न कर्मों अथवा कार्यों का वर्णन किया गया है। वृष्टि का अर्थ है वर्षा अथवा बारिश। हमारे जीवन में वर्षा का अत्यधिक महत्व है। वर्षा ही पृथ्वी पर जल की पूर्ति करती है। वर्षा के जल से ही नदियाँ, तालाब, सरोवर एवं कुँए जल से भरते हैं। कृषि, पशुपालन, वन एवं समस्त जीव-जगत का आधार वर्षा ही है।
इस पाठ में बताया गया है कि मनुष्य वर्षा को अपने जीवन का आधार मानता है। प्राचीन काल से ही भारतवर्ष में वर्षा को देववर की संज्ञा दी गई है और वर्षा के लिए विभिन्न कर्म किये जाते रहे हैं। वर्षा न होने पर अनावृष्टि (सूखा) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिससे फसलें नष्ट हो जाती हैं और अन्न का अभाव हो जाता है। इसलिए वर्षा के जल को संचित करने तथा उसका सदुपयोग करने के कर्मों का विशेष महत्व है। जल संरक्षण, वर्षा जल संग्रहण, वृक्षारोपण तथा कृषि में वर्षा जल का उचित प्रबन्ध — ये सब आवृष्टिकर्म के अन्तर्गत आते हैं।
वैज्ञानिक युग में वर्षा को कृत्रिम रूप से उत्पन्न करने के प्रयास भी किये जा रहे हैं। आकाश में बादलों को बीज करने (क्लाउड सीडिंग) की विधि द्वारा कृत्रिम वर्षा कराने का प्रयत्न होता है। इसके अतिरिक्त वनों की सुरक्षा, पर्यावरण का संतुलन तथा वर्षा जल का संचयन वर्षा से सम्बन्धित महत्वपूर्ण कर्म हैं। इस पाठ के अध्ययन से विद्यार्थी समझ सकते हैं कि वर्षा केवल प्रकृति की देन नहीं है, वरन् उसका सदुपयोग करने की जिम्मेदारी मनुष्य की भी है। जल ही जीवन है, इसका सन्देश इस पाठ में निहित है।
पाठ का प्रारम्भ वर्षा के महत्व के वर्णन से होता है। वर्षा के जल से पृथ्वी पर हरियाली आती है। वर्षा होने से किसान खेतों में बीज बोता है और अच्छी फसल प्राप्त करता है। वर्षा के अभाव में भूमि सूख जाती है और अन्न का उत्पादन नहीं हो पाता। अतः वर्षा सभी जीवों के जीवन का आधार है। प्राचीन ऋषियों ने भी वर्षा की कामना के लिए यज्ञ करने का विधान बताया है। भारतीय संस्कृति में वर्षा को 'वर्षा देव' मानकर उसकी पूजा की जाती रही है।
पाठ में जलचक्र की प्रक्रिया का भी वर्णन है। सूर्य की किरणों से समुद्र, नदी, तालाब तथा सरोवरों का जल वाष्प बनकर आकाश में उड़ता है। यह जलवाष्प ऊपर जाकर ठण्डा होकर बादलों का रूप धारण करता है। जब बादल अधिक भारी हो जाते हैं तो वर्षा के रूप में जल पृथ्वी पर लौट आता है। इस प्रकार जलचक्र (जल का वाष्पीकरण एवं संघनन) निरन्तर चलता रहता है। यह प्रक्रिया ही वर्षा का मूल कारण है।
पाठ में वर्षा जल संग्रहण (वाटर हार्वेस्टिंग) के उपायों का वर्णन किया गया है। छतों से गिरने वाले वर्षा जल को संग्रह करने के लिए विशेष प्रबन्ध किये जा सकते हैं। तालाब खुदवाकर, कुँए बनाकर अथवा जमीन में छोटे-छोटे गड्ढे बनाकर वर्षा का जल संचित किया जा सकता है। इस संग्रहीत जल का उपयोग सिंचाई, पशु और मानव के पीने के लिए किया जा सकता है। राजस्थान जैसे शुष्क प्रदेशों में वर्षा जल संग्रहण की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है।
आधुनिक विज्ञान के कारण अब मनुष्य कृत्रिम वर्षा कराने में भी समर्थ हुआ है। जब आकाश में जल से भरे बादल दिखाई देते हैं, तो विमानों द्वारा उन बादलों पर कुछ रसायन छिड़के जाते हैं। इस विधि को क्लाउड सीडिंग कहा जाता है। इससे बादलों में जल की बूँदें मिलकर बड़ी हो जाती हैं और वर्षा होने लगती है। इस प्रकार विज्ञान द्वारा वर्षा के अभाव में भी वर्षा कराने के कर्म किये जाते हैं।
वर्षा से सम्बन्धित प्रमुख शब्दों के रूप:
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| वृष्टिः | वर्षा, बारिश |
| आवृष्टि | वर्षा से सम्बन्धित कर्म |
| अनावृष्टिः | वर्षा का अभाव, सूखा |
| जलम् | पानी |
| मेघः | बादल |
| जलचक्रम् | जल का वाष्पीकरण एवं संघनन चक्र |
| कृषकः | किसान |
| सस्यम् | फसल |
| वाष्पः | भाप, जलवाष्प |
| संघननम् | संघनन (गाढ़ा होना) |
| संग्रहणम् | एकत्र करना |
| सिंचनम् | सिंचाई |
| वृक्षारोपणम् | पेड़ लगाना |
| संरक्षणम् | सुरक्षा करना |
| क्रम | प्रक्रिया | विवरण |
|---|---|---|
| 1 | वाष्पीकरण | सूर्य की किरणों से जल भाप बनकर ऊपर उठता है |
| 2 | संघनन | भाप ठण्डी होकर बादल बनती है |
| 3 | वर्षण | बादल भारी होकर वर्षा करते हैं |
| 4 | संचयन | वर्षा जल जमीन, तालाब, नदियों में एकत्र होता है |
| वर्षा के लाभ | अनावृष्टि (सूखा) की हानि |
|---|---|
| फसलों की हरियाली | फसलों का नष्ट होना |
| जल का संचयन | जल का अभाव |
| वनों का विकास | वृक्षों का सूखना |
| पर्यावरण संतुलन | पशु-पक्षियों का कष्ट |
आवृष्टिकर्मकर्माणि पाठ वर्षा के महत्व और उससे सम्बन्धित मानवीय कर्मों का वर्णन करता है। वर्षा पृथ्वी पर जीवन का आधार है। जलचक्र द्वारा जल सदैव पृथ्वी और आकाश के मध्य घूमता रहता है। वर्षा के अभाव में अनावृष्टि होती है, जिससे कष्ट उत्पन्न होता है। अतः मनुष्य को वर्षा जल का संग्रहण करना चाहिए, वृक्ष लगाने चाहिए और जल का सदुपयोग करना चाहिए। आधुनिक विज्ञान ने कृत्रिम वर्षा की विधि भी प्रदान की है। यह पाठ हमें सिखाता है कि जल ही जीवन है और उसकी रक्षा तथा सदुपयोग ही हमारा प्रमुख कर्म होना चाहिए। जल संरक्षण के द्वारा ही हम अपना भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं।