"भारतीवसन्तगीतिः" कक्षा नौ की संस्कृत पाठ्यपुस्तक शेमुषी (प्रथमो भागः) का प्रथम पाठ है। यह एक काव्य रचना है, जिसे गीतिकाव्य भी कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें गाने के योग्य भाव एवं लय विद्यमान है। इस पाठ का केन्द्रीय विषय वसन्त ऋतु का आगमन है। जब वसन्त ऋतु आती है तो सम्पूर्ण प्रकृति उल्लास से भर जाती है। वृक्षों पर नये पल्लव फूटते हैं, फूल खिलते हैं, कोयल कूकने लगती है, भ्रमर गुनगुनाने लगते हैं और मंद-मंद मलय पवन चलने लगती है।
संस्कृत में भारती शब्द का अर्थ वाणी या सरस्वती देवी से लिया जाता है। वसन्त ऋतु में सम्पूर्ण संसार सुन्दर, मनोरम और आनन्ददायक बन जाता है। कवि ने इस गीति के माध्यम से वसन्त के सौन्दर्य के साथ-साथ भारती अर्थात संस्कृत भाषा और वाणी की महिमा का भी गुणगान किया है। जिस प्रकार वसन्त प्रकृति को हरा-भरा, पुष्पित और सुगन्धित बनाता है, उसी प्रकार भारती अर्थात अच्छी वाणी और सुन्दर साहित्य मनुष्य के जीवन को आनन्द से भर देता है। इसीलिए कवि दोनों को एक साथ जोड़कर गीति की रचना करता है। इस पाठ में प्रकृति के अनेक चित्र उपस्थित किये गये हैं — मलयानिल, कोकिल, आम्रपुष्प, भ्रमर, कमल, सरोवर, वन एवं उपवन आदि। ये सभी चित्र वसन्त ऋतु के प्रतीक हैं।
इस काव्य को पढ़ते समय विद्यार्थियों को यह समझना चाहिए कि वसन्त को ऋतुराज क्यों कहा गया है। समस्त ऋतुओं में वसन्त की शोभा सबसे अधिक मनोरम मानी जाती है। कवि की दृष्टि में वसन्त केवल एक ऋतु नहीं है, वरन् वह आनन्द, उल्लास और सुन्दरता का प्रतीक है। इस पाठ के अध्ययन से विद्यार्थियों को वसन्त ऋतु के विषय में, संस्कृत काव्य की भावनात्मक अभिव्यक्ति के विषय में तथा छन्द, अलंकार एवं लय के विषय में भी जानकारी प्राप्त होगी। यह पाठ प्रकृति प्रेम, सुन्दरता के प्रति संवेदना और जीवन के प्रति उत्साह सिखाता है।
कवि सबसे पहले वसन्त ऋतु के आगमन का चित्र प्रस्तुत करता है। जब वसन्त ऋतु आती है, तो मंद-मंद मलयानिल बहने लगती है, जो अपने साथ फूलों की सुगन्ध लेकर आती है। मलय पर्वत से आने वाली यह पवन शीतल और सुगन्धित होती है। इस ऋतु में वन-उपवन नये पल्लवों से भर जाते हैं। वृक्ष अपनी पुरानी पत्तियों को त्यागकर नये पत्तों से सुशोभित हो जाते हैं। इस प्रकार प्रकृति का प्रत्येक कण नवीनता और उल्लास से भर उठता है। वसन्त का आगमन मानो प्रकृति के जीवन में नया संचार कर देता है।
दूसरे पद्य में कवि वसन्त ऋतु की विशेषताओं का वर्णन करता है। इस ऋतु में कोकिल (कोयल) अपनी मधुर वाणी से कूकना प्रारम्भ करती है। उसकी कूक समस्त वन को आनन्द से भर देती है। आम्रवृक्षों पर मंजरियाँ (बौर) आ जाती हैं, जिनकी सुगन्ध सम्पूर्ण वातावरण में फैल जाती है। इस सुगन्ध से आकर्षित होकर भ्रमर (भौंरे) गुनगुनाते हुए फूलों पर मण्डराते हैं और मधु पान करते हैं। इस प्रकार वसन्त ऋतु में प्रत्येक दिशा में चेतना, मधुरता और आनन्द का साम्राज्य स्थापित हो जाता है।
तीसरे पद्य में कवि जलाशयों और सरोवरों का वर्णन करता है। वसन्त ऋतु में सरोवरों में कमल के फूल खिल उठते हैं। जल में कमल का प्रतिबिम्ब अत्यन्त सुन्दर दिखाई देता है। भौंरे कमल के मधु का पान करने के लिए गुनगुनाते हैं। पवन के थपेड़ों से कमल लहराने लगते हैं। इस प्रकार जलाशय भी वसन्त की शोभा में चार चाँद लगा देते हैं। कवि ने यहाँ प्रकृति के जल से सम्बन्धित सौन्दर्य का सजीव चित्रण किया है। जल, फूल, पवन और भ्रमर के इस संगम से वसन्त का सौन्दर्य और अधिक बढ़ जाता है।
अन्तिम पद्य में कवि भारती अर्थात वाणी या सरस्वती की स्तुति करता है। कवि का कथन है कि जिस प्रकार वसन्त सम्पूर्ण प्रकृति को सुन्दर बना देता है, उसी प्रकार मधुर वाणी एवं सुन्दर साहित्य मनुष्य के जीवन को सुन्दर बना देता है। वाणी का सौन्दर्य मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है। जैसे वसन्त ऋतु में प्रकृति नवीन रूप धारण करती है, वैसे ही मनुष्य की वाणी में मधुरता हो तो उसका जीवन भी नवीन हो जाता है। इस प्रकार कवि ने प्रकृति के सौन्दर्य और वाणी की मधुरता को एक सूत्र में बाँधकर गीति की रचना की है। यही इस पाठ की केन्द्रीय भावना है — प्रकृति का उल्लास और वाणी की मधुरता।
वसन्त ऋतु के वर्णन में प्रयुक्त प्रमुख संज्ञा शब्दों के शब्द रूप निम्नलिखित हैं:
इस पाठ में क्रियाओं का प्रयोग वर्तमान काल में हुआ है। प्रमुख धातुओं के लट् लकार रूप:
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| वसन्त | वसंत ऋतु |
| मलयानिल | सुगन्धित, मंद पवन |
| कोकिल | कोयल |
| भ्रमर | भौंरा, भँवर |
| आम्र | आम का वृक्ष |
| मञ्जरी | मंजरी, बौर |
| कमल | कमल का फूल |
| सरोवर | तालाब, झील |
| पल्लव | नया पत्ता, कोंपल |
| वन | जंगल |
| उपवन | बगीचा |
| भारती | वाणी, सरस्वती |
| ऋतुराज | ऋतुओं का राजा |
| मधु | शहद, मीठा |
| ऋतु | संस्कृत नाम | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| वसंत | वसन्त | मंद पवन, कोयल की कूक, पुष्प विकास |
| ग्रीष्म | ग्रीष्म | तेज धूप, ताप |
| वर्षा | वर्षा | वर्षा, हरियाली |
| शरद | शरद | खिले कमल, चाँदनी |
| हेमंत | हेमन्त | शीत का आरम्भ |
| शिशिर | शिशिर | अधिक ठंड, पतझड़ |
| प्राकृतिक तत्व | वसन्त ऋतु में रूप |
|---|---|
| वृक्ष | नये पल्लव, मंजरियाँ |
| पक्षी | कोयल का मधुर कूजन |
| फूल | खिले कमल, सुगन्धित पुष्प |
| पवन | मंद मलयानिल |
| भ्रमर | गुंजन और मधु पान |
| सरोवर | कमलों से शोभित जल |
भारतीवसन्तगीतिः एक मधुर काव्य है जो वसन्त ऋतु के आगमन पर प्रकृति के उल्लास का सजीव चित्रण करता है। इस गीति में मलयानिल, कोकिल की कूक, आम्र की मंजरियाँ, भ्रमरों का गुंजन और सरोवरों में खिले कमल — इन सभी के माध्यम से वसन्त का सौन्दर्य प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही कवि ने भारती अर्थात मधुर वाणी की महिमा भी बताई है, क्योंकि मधुर वाणी जीवन को वसन्त के समान सुन्दर बना देती है। यह पाठ विद्यार्थियों को प्रकृति प्रेम, सौन्दर्य-बोध और जीवन में मधुरता का महत्व सिखाता है। वसन्त ऋतु ऋतुराज है और उसकी शोभा सम्पूर्ण प्रकृति में आनन्द भर देती है। इस प्रकार यह गीति हमें सिखाती है कि जीवन को उल्लास और मधुरता से परिपूर्ण करना चाहिए।