"भ्रान्तो बालकः" कक्षा नौ की संस्कृत पाठ्यपुस्तक शेमुषी का पञ्चम पाठ है। भ्रान्तः का अर्थ है भटका हुआ अथवा भ्रमित। अतः भ्रान्तो बालकः का अर्थ है — भटका हुआ बालक। यह एक गद्य कथा है, जिसमें एक बालक के भटक जाने की घटना का वर्णन किया गया है। भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर बच्चों के अपने अभिभावकों से बिछुड़ जाने की घटनाएँ प्रायः घटती रहती हैं। ऐसी स्थिति में बालक भयभीत और भ्रमित हो जाता है। इस कथा में ऐसे ही एक बालक की कहानी प्रस्तुत की गई है।
कथा में बताया गया है कि एक बालक अपने माता-पिता के साथ नगर के बाजार अथवा मेले में गया था। वहाँ भारी भीड़ के कारण वह अपने माता-पिता से बिछुड़ गया। भ्रमित होकर वह इधर-उधर भटकने लगा। कुछ समय बाद उसे भय लगने लगा। परन्तु उसने धैर्य नहीं खोया। उसने समझदारी दिखाते हुए वहाँ उपस्थित सज्जन व्यक्तियों से सहायता माँगी। उन लोगों ने उसकी सहायता की और उसके माता-पिता का पता लगाकर उसे उनके पास पहुँचा दिया।
यह कथा विद्यार्थियों को यह शिक्षा देती है कि विपत्ति के समय घबराना नहीं चाहिए, वरन् धैर्य और बुद्धि का उपयोग करना चाहिए। भटक जाने पर रोने और चिल्लाने के स्थान पर सही व्यक्ति से सहायता माँगनी चाहिए। साथ ही यह भी शिक्षा मिलती है कि अजनबी व्यक्तियों से सावधानी बरतनी चाहिए और केवल विश्वसनीय व्यक्तियों से ही सहायता लेनी चाहिए। इस पाठ के अध्ययन से विद्यार्थी कथा को समझेंगे, उसका आनन्द लेंगे और जीवन-मूल्यों को ग्रहण करेंगे।
कथा के आरम्भ में बताया गया है कि बालक अपने परिवार के साथ नगर के व्यस्त बाजार में गया। बाजार में अत्यधिक भीड़ थी। लोग एक-दूसरे से टकराते हुए चल रहे थे। इसी भीड़ में बालक अपने माता-पिता से बिछुड़ गया। जब उसने चारों ओर देखा, तो उसे अपने माता-पिता दिखाई नहीं दिए। वह भयभीत हो गया और उसकी आँखों में आँसू आ गये।
बिछुड़ने के बाद बालक भ्रमित होकर इधर-उधर भटकने लगा। वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करें। उसे लग रहा था कि शायद उसके माता-पिता किसी दुकान में घुसे होंगे। वह एक-एक दुकान में देखने लगा, परन्तु वहाँ उसे कोई नहीं मिला। कुछ समय के बाद उसे गहरा भय लगा और वह रोने लगा।
तभी कुछ सज्जन व्यक्ति उसके पास आये। उन्होंने बालक से उसका नाम और उसके पिता का पता पूछा। बालक ने धैर्यपूर्वक सब कुछ बताया। उन सज्जन व्यक्तियों ने बाजार के व्यवस्थापक की सहायता से घोषणा कराई। इस घोषणा को सुनकर बालक के माता-पिता तुरन्त वहाँ पहुँचे। बालक को देखकर उन्होंने राहत की साँस ली और सज्जनों का धन्यवाद किया।
अन्त में बालक अपने माता-पिता के साथ सुरक्षित घर लौट आया। इस घटना से उसने सीखा कि भीड़ वाले स्थानों में सावधान रहना चाहिए और विपत्ति के समय धैर्य एवं बुद्धि से काम लेना चाहिए। इस प्रकार कथा का सुखद अन्त होता है।
इस कथा से विद्यार्थियों को अनेक महत्वपूर्ण शिक्षाएँ मिलती हैं। सबसे पहले यह कि भीड़-भाड़ वाले स्थानों में जाते समय माता-पिता का हाथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। दूसरे, बच्चों को अपना नाम, अपने माता-पिता का नाम तथा घर का पता सदा याद रखना चाहिए, जिससे आवश्यकता पड़ने पर दूसरे लोग उनकी सहायता कर सकें। तीसरे, विपत्ति के समय घबराना नहीं चाहिए, वरन् धैर्यपूर्वक सोचना चाहिए कि सहायता कैसे प्राप्त की जाए। चौथे, अजनबी व्यक्तियों से सावधानी बरतनी चाहिए और केवल विश्वसनीय सज्जनों या पुलिस कर्मियों से ही सहायता माँगनी चाहिए। इसके साथ ही यह भी शिक्षा मिलती है कि समाज में दयालु और सहायक लोग सदैव मिलते हैं, इसलिए आवश्यकता के समय उनसे निसंकोच सहायता माँगनी चाहिए। इस प्रकार यह कथा सावधानी, धैर्य, आत्मविश्वास और सामाजिक सहयोग का पाठ पढ़ाती है।
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| भ्रान्तः | भटका हुआ, भ्रमित |
| बालकः | लड़का |
| भयम् | डर |
| भीड़ | जनसमूह |
| बाजारः | बाजार, हाट |
| बिछुड़ना | अलग हो जाना |
| धैर्यम् | धैर्य, सहनशीलता |
| सहायता | मदद |
| घोषणा | एलान |
| माता-पिता | माता और पिता |
| सज्जनः | भला आदमी |
| सावधानता | सतर्कता |
| सुरक्षा | रक्षा |
| आँसू | अश्रु |
| क्रम | घटना |
|---|---|
| 1 | बालक परिवार के साथ बाजार गया |
| 2 | भीड़ में बिछुड़ गया |
| 3 | भ्रमित होकर भटका और डर गया |
| 4 | सज्जनों से सहायता माँगी |
| 5 | घोषणा द्वारा माता-पिता मिले |
| 6 | सुरक्षित घर लौटा |
| गुण | उदाहरण |
|---|---|
| धैर्य | भय के बाद भी स्थिर रहा |
| बुद्धिमत्ता | सज्जनों से सहायता माँगी |
| सत्यवादिता | अपना नाम और पता बताया |
| आत्मविश्वास | घबराहट पर विजय पाई |
भ्रान्तो बालकः कथा एक बालक के भटक जाने की घटना पर आधारित है, जो भीड़-भाड़ वाले बाजार में अपने माता-पिता से बिछुड़ जाता है। भ्रम और भय के बावजूद वह धैर्य नहीं खोता और बुद्धिमानी से सज्जन व्यक्तियों से सहायता माँगता है। घोषणा के द्वारा उसके माता-पिता उसे खोज लेते हैं और वह सुरक्षित घर लौटता है। यह कथा विद्यार्थियों को सिखाती है कि विपत्ति के समय घबराना नहीं चाहिए, वरन् धैर्य, बुद्धि और विवेक का उपयोग करना चाहिए। साथ ही भीड़ वाले स्थानों में सावधानी बरतनी चाहिए और अजनबियों से सतर्क रहना चाहिए। इस प्रकार यह कथा जीवन में सावधानी और आत्मविश्वास का महत्व सिखाती है।