"जटायोः शौर्यम्" कक्षा नौ की संस्कृत पाठ्यपुस्तक शेमुषी का दशम पाठ है। यह पाठ रामायण की एक प्रसिद्ध घटना पर आधारित है। जटायोः शौर्यम् का अर्थ है — जटायु का वीरत्व। जटायु एक विशाल गिद्ध (पक्षिराज) था, जो अरुण का पुत्र और संपाति का भाई था। वह सूर्य और इन्द्र का मित्र तथा गरुड़ का भतीजा था। जब रावण सीता का हरण करके उसे ले जा रहा था, तब जटायु ने अपने प्राणों की चिन्ता किये बिना उसका विरोध किया और भयंकर युद्ध किया। यही जटायु का शौर्य है।
यह कथा ताड़का वध के पश्चात् राम के वनवास के समय की है। जब राम, सीता और लक्ष्मण पञ्चवटी नामक स्थान पर निवास कर रहे थे, तब रावण ने मायावी ऋषि के रूप में आकर सीता का हरण किया। जटायु ने यह देखकर रावण को रोकने का प्रयत्न किया। उसने सीता को छोड़ने के लिए कहा, किन्तु रावण नहीं माना। तब दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध में जटायु के पंख कट गये और वह भूमि पर गिर पड़ा। इसी बीच रावण सीता को लेकर चला गया।
यह पाठ विद्यार्थियों को वीरता, कर्तव्य-पालन और धर्म-रक्षा की शिक्षा देता है। जटायु जानता था कि वह रावण के बल का सामना नहीं कर सकता, फिर भी उसने धर्म की रक्षा के लिए शौर्य दिखाया। अपने प्राणों की चिन्ता न करते हुए उसने सीता की रक्षा का प्रयत्न किया। राम ने उसकी भक्ति और शौर्य से प्रसन्न होकर उसका अन्तिम संस्कार किया और उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई। यह कथा हमें सिखाती है कि परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो, धर्म और सत्य के लिए शौर्य दिखाना चाहिए।
जटायु पक्षिराज था। वह अरुण का पुत्र, संपाति का भाई और गरुड़ का भतीजा था। वह अत्यन्त बलवान् और वीर था। सूर्य और इन्द्र उसके मित्र थे। वह धर्म के प्रति निष्ठावान् था और देवताओं का सहायक था। उसके समान बलवान् पक्षी संसार में दूसरा कोई नहीं था।
जब राम, सीता और लक्ष्मण पञ्चवटी में निवास कर रहे थे, तब रावण छलपूर्वक वहाँ आया। उसने माया से ऋषि का रूप धारण किया और सीता का हरण करके उसे आकाशमार्ग से ले जाने लगा। सीता रक्षा के लिए चिल्लाने लगीं। उनका आर्तनाद सुनकर जटायु उनकी रक्षा के लिए दौड़ा। उसने रावण को रोककर कहा — "सीता को छोड़ दो, तुम्हारा यह कर्म अधर्म है।"
रावण ने जटायु की चेतावनी को नहीं माना। तब जटायु और रावण में भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ। जटायु ने अपने पंखों, नखों और चोंच से रावण पर प्रहार किया। रावण के बाणों से जटायु के पंख कट गये और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। इसी बीच रावण सीता को लेकर लङ्का की ओर चला गया।
सीता को खोजते हुए राम और लक्ष्मण उस स्थान पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने घायल जटायु को देखा। जटायु ने राम को सीता के हरण की पूरी सूचना दी और बताया कि रावण उन्हें ले गया है। राम ने जटायु की वीरता और भक्ति की प्रशंसा की। जटायु की मृत्यु के पश्चात् राम ने उसका विधिपूर्वक अन्तिम संस्कार किया। उसके पुण्य कर्मों के कारण उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई।
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| शौर्यम् | वीरता, बहादुरी |
| पक्षिराजः | पक्षियों का राजा |
| गरुड़ः | गरुड़ (पक्षिराज) |
| संपातिः | संपाति (जटायु का भाई) |
| हरणम् | अपहरण |
| रावणः | रावण (लङ्कापति) |
| युद्धम् | युद्ध, लड़ाई |
| पंख | पक्ष, पर |
| अन्तिम संस्कार | अन्त्येष्टि |
| स्वर्गः | स्वर्ग |
| धर्मः | धर्म, कर्तव्य |
| पञ्चवटी | राम का आश्रम स्थान |
| भक्तिः | भक्ति, श्रद्धा |
| आर्तनादः | दुःख की पुकार |
| पात्र | पहचान |
|---|---|
| जटायु | पक्षिराज, अरुणपुत्र |
| राम | अयोध्या के राजकुमार |
| सीता | राम की पत्नी |
| रावण | लङ्कापति |
| लक्ष्मण | राम के भाई |
| गरुड़ | जटायु के चाचा |
| गुण | उदाहरण |
|---|---|
| शौर्य | रावण से निडर होकर युद्ध |
| धर्म-निष्ठा | अधर्म का विरोध |
| कर्तव्य-पालन | सीता की रक्षा का प्रयास |
| भक्ति | राम के प्रति श्रद्धा |
| त्याग | प्राणों का बलिदान |
जटायोः शौर्यम् रामायण की अमर घटना पर आधारित पाठ है। पक्षिराज जटायु ने रावण के बल का सामना करने के लिए अपने प्राणों की चिन्ता नहीं की। उसने धर्म की रक्षा के लिए शौर्य दिखाया, सीता की रक्षा का प्रयत्न किया और रावण से भयंकर युद्ध किया। यद्यपि उसके पंख कट गये और वह गिर पड़ा, तथापि उसकी वीरता अमर हो गई। राम ने उसके अन्तिम संस्कार से उसे सम्मान दिया और उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई। यह पाठ हमें सिखाता है कि जीवन में धर्म, सत्य और कर्तव्य के लिए सदा शौर्य दिखाना चाहिए। बलवान् शत्रु से भयभीत होकर पीछे नहीं हटना चाहिए। जटायु का बलिदान आज भी हमें वीरता और धर्म-निष्ठा की प्रेरणा देता है।