"कल्याणं भवातु" कक्षा नौ की संस्कृत पाठ्यपुस्तक शेमुषी का चतुर्थ पाठ है। कल्याणं भवातु का अर्थ है — सबका कल्याण हो, सबका मंगल हो। यह पाठ मंगल-कामना अर्थात शुभकामनाओं से सम्बन्धित है। इसमें सभी प्राणियों के सुख, शान्ति और कल्याण की कामना की गई है। इस प्रकार के मन्त्रों को शान्तिमन्त्र अथवा मंगलमन्त्र कहा जाता है। भारतीय परम्परा में प्रत्येक शुभ कार्य के आरम्भ में सबके कल्याण की कामना की जाती है।
यह पाठ हमें सिखाता है कि मनुष्य को केवल अपने कल्याण की ही इच्छा नहीं करनी चाहिए, वरन् समस्त संसार के कल्याण की कामना करनी चाहिए। "सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः" — सब सुखी हों, सब निरोग रहें — यही इस पाठ की भावना है। सुख, शान्ति, आरोग्य (स्वास्थ्य) तथा सद्बुद्धि की कामना प्रत्येक मनुष्य के हृदय में होनी चाहिए। जब सभी प्राणी सुखी और स्वस्थ रहते हैं, तभी संसार में शान्ति स्थापित होती है।
इस पाठ में वेदों एवं उपनिषदों के शान्तिमन्त्रों की भावना प्रतिबिम्बित होती है। शान्ति की कामना से ही सत्य, अहिंसा और परोपकार जैसे मूल्यों का विकास होता है। विद्यार्थियों के लिए यह पाठ अत्यन्त प्रेरणादायक है, क्योंकि यह उनमें परोपकार, सद्भावना और मानवताप्रेम की भावना जागृत करता है। इसके साथ ही इस पाठ से संस्कृत के मंगलवाचक शब्दों, शान्तिमन्त्रों की भाषा और व्याकरण का भी परिचय मिलता है। कल्याण, मंगल, शान्ति, आरोग्य, सुख — ये सभी शब्द संस्कृत साहित्य की मूल भावनाओं से जुड़े हैं।
पाठ की प्रथम पंक्तियों में समस्त प्राणियों के सुख की कामना की गई है। कहा गया है — सर्वे भवन्तु सुखिनः — सभी सुखी हों। सर्वे सन्तु निरामयाः — सभी निरोग रहें। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु — सभी शुभ देखें। मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत् — किसी को भी दुःख का भागी न होना पड़े। यह मन्त्र समस्त मानवता के कल्याण की कामना करता है। इसमें किसी एक व्यक्ति या समूह का भेदभाव नहीं है, वरन् सबके लिए शुभकामना व्यक्त की गई है।
इस पाठ में सुख, शान्ति और आरोग्य की कामना का विशेष उल्लेख है। शान्तिः — मन और बुद्धि की शान्ति; सुखम् — सांसारिक सुख; आरोग्यम् — शरीर का स्वास्थ्य। इन तीनों को मनुष्य के जीवन के आधार स्तम्भ माना गया है। बिना शान्ति के ज्ञान नहीं होता, बिना सुख के जीवन नीरस रहता है और बिना आरोग्य के कुछ भी सम्भव नहीं है। अतः सभी के लिए इनकी कामना की गई है।
पाठ का तीसरा खण्ड परोपकार और सद्भावना पर आधारित है। कहा गया है कि जिस प्रकार नदियाँ सदैव परोपकार करती हैं, वृक्ष दूसरों को फल देते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी दूसरों के कल्याण में अपना कल्याण समझना चाहिए। परोपकार ही जीवन का सच्चा धर्म है। जो मनुष्य दूसरों का भला करता है, उसे स्वयं भी सुख और शान्ति मिलती है। यह भावना ही इस पाठ की आत्मा है।
अन्त में बताया गया है कि मंगलकामना अर्थात शुभकामना भारतीय संस्कृति का मूल है। जन्म, विवाह, गृह प्रवेश, नव वर्ष आदि शुभ अवसरों पर सबके कल्याण की कामना की जाती है। यह परम्परा सद्भावना को बढ़ाती है और समाज में प्रेम का वातावरण बनाती है। कल्याण की कामना मात्र शब्द नहीं, वरन् शुभ भावना की अभिव्यक्ति है।
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| कल्याणम् | मंगल, भलाई |
| भवातु | हो (आशीर्वाद) |
| सुखिनः | सुखी |
| निरामयाः | निरोग, रोग रहित |
| शान्तिः | शान्ति |
| आरोग्यम् | स्वास्थ्य |
| मङ्गलम् | कल्याण |
| परोपकारः | दूसरों की भलाई |
| सद्भावना | अच्छी भावना |
| मानवता | मनुष्यत्व |
| अहिंसा | किसी को कष्ट न देना |
| सत्यम् | सच |
| आशीर्वादः | आशीर्वाद |
| प्राणिनः | प्राणी, जीव |
| संस्कृत | अर्थ |
|---|---|
| सर्वे भवन्तु सुखिनः | सभी सुखी हों |
| सर्वे सन्तु निरामयाः | सभी निरोग रहें |
| सर्वे भद्राणि पश्यन्तु | सभी शुभ देखें |
| मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत् | किसी को दुःख का भागी न बनना पड़े |
| स्तम्भ | अर्थ | महत्व |
|---|---|---|
| शान्तिः | मन की शान्ति | ज्ञान का आधार |
| सुखम् | सांसारिक सुख | जीवन की सार्थकता |
| आरोग्यम् | स्वास्थ्य | सभी सुखों का मूल |
कल्याणं भवातु पाठ शुभकामना और मंगलकामना के माध्यम से समस्त संसार के कल्याण की प्रार्थना करता है। सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसे मन्त्र हमें सिखाते हैं कि केवल अपना नहीं, वरन् सबका भला सोचना चाहिए। शान्ति, सुख और आरोग्य मानव जीवन के तीन आधार स्तम्भ हैं। परोपकार, अहिंसा, सत्य और सद्भावना के द्वारा ही समाज में शान्ति स्थापित होती है। यह पाठ विद्यार्थियों में मानवता और सेवा की भावना जागृत करता है। यदि प्रत्येक मनुष्य दूसरों के कल्याण की कामना करे और परोपकार करे, तो सम्पूर्ण संसार में सुख और शान्ति का वातावरण बन सकता है। यही इस पाठ की महान शिक्षा है।