"पर्यावरणम्" कक्षा नौ की संस्कृत पाठ्यपुस्तक शेमुषी का एकादश पाठ है। पर्यावरणम् शब्द की रचना है — परि + आवरण। परि का अर्थ है चारों ओर और आवरण का अर्थ है घेरा। अतः पर्यावरण का अर्थ है — हमारे चारों ओर का घेरा अथवा वातावरण। पृथ्वी पर जो कुछ भी हमारे चारों ओर है — भूमि, जल, वायु, वन, पहाड़, नदियाँ, जीव-जन्तु, पक्षी और पेड़-पौधे — ये सब मिलकर पर्यावरण बनाते हैं। मनुष्य और समस्त प्राणियों का जीवन पर्यावरण पर ही निर्भर है। स्वच्छ वायु, शुद्ध जल और उपजाऊ भूमि के बिना जीवन सम्भव नहीं है।
यह पाठ पर्यावरण के महत्व और उसके संरक्षण के विषय में बताता है। प्रकृति का संतुलन बना रहे, इसके लिए यह आवश्यक है कि हम वनों को नष्ट न करें, जल को प्रदूषित न करें और वायु को स्वच्छ रखें। परन्तु आधुनिक युग में औद्योगिकरण, वाहनों का धुआँ, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई और रासायनिक कचरे के कारण पर्यावरण प्रदूषित होता जा रहा है। जल, वायु, भूमि और ध्वनि का प्रदूषण दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। इस प्रदूषण के कारण मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है और पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है।
यह पाठ विद्यार्थियों को पर्यावरण-संरक्षण का संकल्प दिलाता है। वृक्षारोपण करना, जल का सदुपयोग करना, कम से कम प्रदूषण फैलाना और प्लास्टिक का उपयोग कम करना — ये छोटे-छोटे प्रयास पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं। इसके साथ ही इस पाठ से पर्यावरण, प्रदूषण, संरक्षण, संतुलन जैसे महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दों का ज्ञान भी होता है। पर्यावरण की रक्षा हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है, यही इस पाठ का केन्द्रीय सन्देश है।
पाठ का आरम्भ पर्यावरण के अर्थ की व्याख्या से होता है। पर्यावरण = परि + आवरण। चारों ओर जो कुछ है, वह पर्यावरण है। भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाश, वन, पर्वत, नदियाँ, सरोवर, जीव-जन्तु और पेड़-पौधे — ये सब पर्यावरण के घटक हैं। मनुष्य इन्हीं के मध्य रहकर जीवन व्यतीत करता है। पर्यावरण के संतुलन पर ही समस्त प्राणियों का अस्तित्व निर्भर है।
पर्यावरण हमें जीवन के लिए आवश्यक सब कुछ देता है। वायु हमें प्राणवायु (ऑक्सीजन) देती है, वन हमें वर्षा, लकड़ी और औषधियाँ देते हैं, नदियाँ जल देती हैं और भूमि अन्न देती है। वन ही वर्षा को आकर्षित करते हैं और पर्यावरण को संतुलित रखते हैं। यदि पर्यावरण स्वच्छ रहेगा, तो जीवन सुखी और स्वस्थ रहेगा। इसलिए पर्यावरण का संरक्षण अत्यन्त आवश्यक है।
पाठ में पर्यावरण-प्रदूषण के कारणों का वर्णन है। औद्योगिक कारखानों का धुआँ वायु को प्रदूषित करता है। कारखानों और घरों का कचरा नदियों में डाला जाता है, जिससे जल प्रदूषित होता है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से वर्षा घटती है और भूमि का क्षरण होता है। अधिक ध्वनि से ध्वनि प्रदूषण होता है। प्लास्टिक और रासायनिक पदार्थ भूमि को अनुपजाऊ बनाते हैं। ये सभी पर्यावरण के शत्रु हैं।
पर्यावरण की रक्षा के लिए हमें अनेक उपाय करने चाहिए। अधिक से अधिक वृक्ष लगाने चाहिए और वनों की कटाई रोकनी चाहिए। जल का सदुपयोग करना चाहिए और उसे प्रदूषित नहीं करना चाहिए। कचरे का उचित निपटान करना चाहिए। प्लास्टिक का उपयोग कम करना चाहिए। स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग करना चाहिए। इन प्रयासों से ही पर्यावरण का संतुलन बना रहेगा और पृथ्वी सुरक्षित रहेगी।
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| पर्यावरणम् | चारों ओर का वातावरण |
| प्रदूषणम् | प्रदूषण, गन्दगी |
| संरक्षणम् | रक्षा करना |
| संतुलनम् | संतुलन |
| वृक्षः | पेड़ |
| वनम् | जंगल |
| वायुः | हवा |
| जलम् | पानी |
| भूमिः | धरती |
| प्राणवायुः | ऑक्सीजन |
| प्रदूषकः | प्रदूषण फैलाने वाला |
| स्वच्छता | सफाई |
| वृक्षारोपणम् | पेड़ लगाना |
| कचरः | कचरा, गंदगी |
| प्रदूषण | मुख्य कारण |
|---|---|
| वायु प्रदूषण | कारखानों और वाहनों का धुआँ |
| जल प्रदूषण | कचरा और रसायन नदियों में |
| भूमि प्रदूषण | प्लास्टिक और रासायनिक पदार्थ |
| ध्वनि प्रदूषण | अधिक शोर |
| उपाय | लाभ |
|---|---|
| वृक्षारोपण | वर्षा और स्वच्छ वायु |
| जल संरक्षण | जल की उपलब्धता |
| कचरे का निपटान | स्वच्छता |
| प्लास्टिक कम करना | भूमि की रक्षा |
| स्वच्छ ऊर्जा | कम प्रदूषण |
पर्यावरणम् पाठ हमें पर्यावरण के महत्व और उसके संरक्षण की शिक्षा देता है। भूमि, जल, वायु, वन और जीव-जन्तु मिलकर पर्यावरण बनाते हैं, जिस पर समस्त जीवन निर्भर है। आधुनिक युग में वायु, जल, भूमि और ध्वनि का प्रदूषण बढ़ता जा रहा है, जो मनुष्य और प्रकृति दोनों के लिए घातक है। अतः हमें वृक्षारोपण करना चाहिए, जल का सदुपयोग करना चाहिए, कचरे का उचित निपटान करना चाहिए और प्लास्टिक का उपयोग कम करना चाहिए। पर्यावरण की रक्षा हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है। यदि हम पर्यावरण की रक्षा करेंगे, तो पर्यावरण भी हमारी रक्षा करेगा। यही इस पाठ का महत्वपूर्ण सन्देश है।