"प्रत्युद्गमनम्" कक्षा नौ की संस्कृत पाठ्यपुस्तक शेमुषी का षष्ठ पाठ है। प्रत्युद्गमनम् का अर्थ है — स्वागत के लिए उठकर आगे बढ़ना अथवा अतिथि के सम्मान में सामने जाकर उसका स्वागत करना। यह पाठ भारतीय आतिथ्य परम्परा से सम्बन्धित है। भारतीय संस्कृति में अतिथि को देवता के समान माना गया है। "अतिथि देवो भवः" — अतिथि देवता हो, यही भारतीय संस्कृति की मूल भावना है। इस पाठ में अतिथि के स्वागत की विधि, उसके सम्मान की परम्परा और आतिथ्य के महत्व का वर्णन किया गया है।
भारतीय परम्परा में जब कोई अतिथि घर आता है, तो गृहस्वामी उठकर उसके स्वागत के लिए आगे बढ़ता है। उसका प्रत्युद्गमन (स्वागतार्थ उठना) करता है, फिर उसे आसन पर बैठाता है, उसके चरण धोकर पूजा करता है, फल-जल अर्पित करता है और मधुर वाणी से उससे कुशल-मंगल पूछता है। यह सम्पूर्ण विधि प्रत्युद्गमन एवं आतिथ्य की परम्परा कहलाती है। अतिथि का यथोचित सत्कार करना गृहस्थ का परम धर्म माना गया है।
यह पाठ विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति की अतिथि-सेवा परम्परा से परिचित कराता है। आतिथ्य के माध्यम से अतिथि और गृहस्वामी के मध्य प्रेम और सम्मान का सम्बन्ध स्थापित होता है। यह पाठ हमें सिखाता है कि अतिथि का सम्मान करना चाहिए, उसके साथ विनम्रता से व्यवहार करना चाहिए और उसकी सेवा करनी चाहिए। इसके साथ ही विद्यार्थी प्रत्युद्गमन, उपवेशन, परिचर्या, आदर, सत्कार जैसे संस्कृत शब्दों से परिचित होते हैं और संस्कृत वाक्य-निर्माण का अभ्यास करते हैं।
पाठ का आरम्भ प्रत्युद्गमन के अर्थ की व्याख्या से होता है। प्रत्युद्गमन का अर्थ है — जब कोई अतिथि गृह में प्रवेश करता है, तो गृहस्वामी अपने आसन से उठकर अतिथि की ओर आगे बढ़ता है और उसका स्वागत करता है। यह प्रत्युद्गमन कहलाता है। यह अतिथि के प्रति गृहस्वामी के आदर की प्रथम अभिव्यक्ति है। अतिथि के प्रति आदर प्रकट करने का यह प्रमुख उपाय है।
अतिथि के आगमन पर गृहस्वामी उठकर प्रत्युद्गमन करता है। तत्पश्चात् वह अतिथि को उचित आसन पर बैठाता है। इसके बाद वह अतिथि के चरण धोता है, क्योंकि पैदल यात्रा के कारण उसके चरण धूल से युक्त हो जाते हैं। चरण धोने के पश्चात् गृहस्वामी अतिथि की पूजा करता है। फिर वह उसे फल, जल तथा भोजन अर्पित करता है। अतिथि से कुशल-मंगल पूछता है। इस प्रकार अतिथि का सत्कार करके ही गृहस्वामी धन्य होता है।
पाठ में आतिथ्य के महत्व का वर्णन किया गया है। भारतीय संस्कृति में अतिथि को देवता के समान माना गया है। अतिथि का सत्कार करने से गृहस्वामी को पुण्य प्राप्त होता है। अतिथि सेवा से घर में सुख, शान्ति और समृद्धि बढ़ती है। अतिथि के प्रति श्रद्धा और सम्मान ही भारतीय आतिथ्य की आत्मा है। मात्र स्वादिष्ट भोजन देना ही आतिथ्य नहीं है, वरन् आदर, प्रेम और स्नेह के साथ उसकी सेवा करना ही सच्चा आतिथ्य है।
पाठ के अन्त में "अतिथि देवो भवः" सूक्ति की व्याख्या की गई है। इसका अर्थ है — अतिथि ही देवता है। जिस प्रकार देवताओं का पूजन किया जाता है, उसी प्रकार अतिथि का पूजन और सत्कार करना चाहिए। इस सूक्ति के पालन से भारतीय संस्कृति में आतिथ्य की परम्परा सदा प्रवाहित रही है। अतिथि के आने पर उसे निराश करना अधर्म माना गया है।
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| प्रत्युद्गमनम् | स्वागत के लिए उठकर आगे बढ़ना |
| अतिथिः | मेहमान |
| गृहस्वामी | घर का मालिक |
| सत्कारः | आदर सहित सेवा |
| आसनम् | बैठने का स्थान |
| चरणम् | पैर |
| पूजनम् | पूजा करना |
| कुशलम् | मंगल, भलाई |
| आतिथ्यम् | मेहमान-नवाज़ी |
| देवः | देवता |
| श्रद्धा | आदर-भाव |
| विनम्रता | नम्रता |
| धर्मः | कर्तव्य |
| अधर्मः | गलत कर्म |
| क्रम | क्रिया |
|---|---|
| 1 | प्रत्युद्गमन (उठकर आगे बढ़ना) |
| 2 | उपवेशन (आसन पर बैठाना) |
| 3 | पादप्रक्षालन (चरण धोना) |
| 4 | पूजन (पूजा करना) |
| 5 | फल-जल अर्पण |
| 6 | कुशल-मंगल प्रश्न |
| मूल्य | अर्थ |
|---|---|
| आदर | अतिथि का सम्मान |
| प्रेम | स्नेहपूर्ण व्यवहार |
| सेवा | यथासम्भव सहायता |
| विनम्रता | नम्र व्यवहार |
| श्रद्धा | देवता के समान भाव |
प्रत्युद्गमनम् पाठ भारतीय आतिथ्य परम्परा का सुन्दर वर्णन करता है। अतिथि के आगमन पर गृहस्वामी उठकर उसका स्वागत करता है, उसे आसन देता है, चरण धोकर पूजा करता है और फल-जल अर्पित करता है। "अतिथि देवो भवः" की सूक्ति के अनुसार अतिथि को देवता के समान पूजनीय माना गया है। आतिथ्य केवल भोजन कराना नहीं, वरन् आदर, प्रेम, सेवा और विनम्रता से अतिथि का सत्कार करना है। यह पाठ विद्यार्थियों को विनम्रता, श्रद्धा और परोपकार का पाठ पढ़ाता है। भारतीय संस्कृति की यह अतिथि-सेवा परम्परा विश्व को आदर-सम्मान की प्रेरणा देती है।