"सन्धि विचार" कक्षा नौ की संस्कृत पाठ्यपुस्तक शेमुषी का षोडश पाठ है। सन्धि का अर्थ है — मेल, मिलन अथवा जोड़। संस्कृत व्याकरण में जब दो वर्ण (अक्षर) आपस में मिलते हैं, तो उनमें जो परिवर्तन होता है, उसे सन्धि कहते हैं। सन्धि के विचार अर्थात नियमों का अध्ययन ही सन्धि विचार है। जैसे — राम + अयोध्या = रामायोध्या। यहाँ 'अ + अ = आ' हो गया। इसी प्रकार सूर्य + उदय = सूर्योदय। ये सन्धि के उदाहरण हैं। सन्धि का ज्ञान शब्दों की शुद्ध रचना और उच्चारण के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
संस्कृत में सन्धि के तीन मुख्य प्रकार होते हैं — स्वर सन्धि, व्यञ्जन सन्धि और विसर्ग सन्धि। स्वर सन्धि में दो स्वरों के मिलने से परिवर्तन होता है। स्वर सन्धि के चार भेद होते हैं — दीर्घ सन्धि, गुण सन्धि, वृद्धि सन्धि और यण सन्धि। व्यञ्जन सन्धि में व्यञ्जन और व्यञ्जन अथवा व्यञ्जन और स्वर के मिलने से परिवर्तन होता है। विसर्ग सन्धि में विसर्ग (ः) के स्थान पर परिवर्तन होता है। इन तीनों सन्धियों के नियमों का ज्ञान संस्कृत भाषा के शुद्ध प्रयोग के लिए आवश्यक है।
यह पाठ विद्यार्थियों को सन्धि के नियमों से परिचित कराता है। सन्धि-विच्छेद अर्थात सन्धि को अलग-अलग करना और सन्धि करना दोनों का अभ्यास महत्वपूर्ण है। परीक्षा में प्रायः सन्धि-विच्छेद और सन्धि के प्रकार पूछे जाते हैं। अतः विद्यार्थियों को दीर्घ, गुण, वृद्धि और यण सन्धि के नियम तथा व्यञ्जन और विसर्ग सन्धि के नियम ध्यान से याद करने चाहिए। सन्धि के नियमों के अभ्यास से शब्दों का शुद्ध उच्चारण और लेखन सम्भव होता है।
जब समान स्वर (अ, इ, उ) आपस में मिलते हैं, तो दीर्घ सन्धि होती है। अ + अ = आ, इ + इ = ई, उ + उ = ऊ। उदाहरण — विद्या + आलय = विद्यालय (आ + आ = आ); महा + आत्मा = महात्मा; हित + उपदेश = हितोपदेश (इ + उ = ई); गुरु + उपदेश = गुरूपदेश (उ + उ = ऊ)।
जब अ या आ के बाद इ, उ या ऋ आता है, तो क्रमशः ए, ओ या अर् होता है। अ + इ = ए, अ + उ = ओ, अ + ऋ = अर्। उदाहरण — सूर्य + उदय = सूर्योदय (अ + उ = ओ); राजा + इन्द्र = राजेन्द्र (आ + इ = ए); देव + ऋषि = देवर्षि (अ + ऋ = अर्)।
जब अ या आ के बाद ए, ऐ, ओ या औ आता है, तो क्रमशः ऐ या औ होता है। अ + ए = ऐ, अ + ओ = औ। उदाहरण — वन + ओषधि = वनौषधि (अ + ओ = औ); महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य (आ + ऐ = ऐ)।
जब इ, उ या ऋ के बाद कोई अन्य स्वर आता है, तो इ का य, उ का व और ऋ का र होता है। इ + अ = य, उ + अ = व, ऋ + अ = र। उदाहरण — प्रति + उत्तर = प्रत्युत्तर (इ + उ = यु); अनु + अय = अन्वय (उ + अ = व); मातृ + अंश = मात्रंश (ऋ + अ = र)।
व्यञ्जन और व्यञ्जन अथवा व्यञ्जन और स्वर के मिलने से व्यञ्जन सन्धि होती है। इसमें पहले व्यञ्जन का परिवर्तन होता है। उदाहरण — सत् + जन = सज्जन (त् + ज = ज्ज); सत् + चरित = सच्चरित (त् + च = च्च); भवत् + ए = भवते; दिक् + गज = दिग्गज (क् + ग = ग्ग)। तवर्गीय वर्णों के स्थान पर अगले वर्ण के वर्ग का पहला वर्ण हो जाता है।
विसर्ग (ः) के बाद स्वर या व्यञ्जन आने पर विसर्ग का परिवर्तन होता है। कुछ नियम हैं — सः + एव = स एव; मनः + रथ = मनोरथ (सः + र = सोर); निः + कल = निष्कल (विसर्ग का ष); दुः + कर = दुष्कर। विसर्ग का प्रयोग सूत्र के रूप में याद रखना चाहिए।
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| सन्धिः | मेल, जोड़ |
| विचारः | विचार, अध्ययन |
| वर्णः | अक्षर |
| स्वरः | स्वर (अ, इ, उ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ) |
| व्यञ्जनम् | व्यंजन वर्ण |
| विसर्गः | विसर्ग (ः) |
| दीर्घः | लम्बा (स्वर) |
| गुणः | गुण (ए, ओ, अर्) |
| वृद्धिः | वृद्धि (ऐ, औ) |
| यण् | य, व, र (यण वर्ण) |
| सन्धि-विच्छेदः | सन्धि को अलग करना |
| शुद्धिः | शुद्धता |
| सन्धि | नियम | उदाहरण |
|---|---|---|
| दीर्घ | अ+अ=आ, इ+इ=ई, उ+उ=ऊ | विद्यालय |
| गुण | अ+इ=ए, अ+उ=ओ, अ+ऋ=अर् | सूर्योदय |
| वृद्धि | अ+ए=ऐ, अ+ओ=औ | वनौषधि |
| यण | इ=य, उ=व, ऋ=र | प्रत्युत्तर |
| प्रकार | आधार |
|---|---|
| स्वर सन्धि | दो स्वरों का मेल |
| व्यञ्जन सन्धि | व्यञ्जन का मेल |
| विसर्ग सन्धि | विसर्ग का परिवर्तन |
सन्धि विचार पाठ संस्कृत व्याकरण के महत्वपूर्ण अंग सन्धि के नियमों का ज्ञान कराता है। दो वर्णों के मेल से होने वाले परिवर्तन को सन्धि कहते हैं। स्वर सन्धि के दीर्घ, गुण, वृद्धि और यण भेद तथा व्यञ्जन और विसर्ग सन्धि के नियम संस्कृत के शुद्ध उच्चारण और लेखन के आधार हैं। विद्यार्थियों को सन्धि और सन्धि-विच्छेद दोनों का नियमित अभ्यास करना चाहिए। परीक्षा में प्रायः सन्धि-विच्छेद और सन्धि के प्रकार पूछे जाते हैं, अतः इन नियमों को ध्यान से स्मरण रखना चाहिए। सन्धि के अभ्यास से ही संस्कृत शब्दों की शुद्धता सिद्ध होती है।