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जीवों में विविधता — अध्ययन नोट्स

विस्तृत सिद्धांत, सूत्र, आरेख और स्मृति सहायक।

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1. वर्गीकरण का आधार (Basis of Classification)

पृथ्वी पर लाखों प्रकार के सजीव पाए जाते हैं। जीवों की इस विशाल विविधता को समझने के लिए उन्हें वर्गीकृत करना आवश्यक है। वर्गीकरण का अर्थ है जीवों को उनकी समानताओं और असमानताओं के आधार पर समूहों में बांटना।

वर्गीकरण और जैव विकास (Classification and Evolution)

चार्ल्स डार्विन ने 1859 में अपनी पुस्तक 'द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज' (The Origin of Species) में सर्वप्रथम जैव विकास (Evolution) की अवधारणा दी। जैव विकास के अनुसार, वर्तमान जीव अपने पूर्वजों में समय के साथ होने वाले क्रमिक परिवर्तनों के कारण अस्तित्व में आए हैं। - आदिम जीव (Primitive/Lower): जिनकी शारीरिक संरचना में प्राचीन काल से कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है। - उन्नत जीव (Advanced/Higher): जिनकी शारीरिक संरचना में विकास के साथ जटिलता आई है।

2. व्हिटेकर का पाँच जगत वर्गीकरण (Whittaker's Five Kingdom Classification)

1969 में रॉबर्ट एच. व्हिटेकर ने सजीवों को पाँच मुख्य जगतों (Kingdoms) में वर्गीकृत किया:

graph TD
    A[सजीव] --> B[प्रोकैरियोटिक: मोनेरा]
    A --> C[यूकैरियोटिक]
    C --> D[एककोशिकीय: प्रोटिस्टा]
    C --> E[बहुकोशिकीय]
    E --> F[कोशिका भित्ति सहित]
    E --> G[कोशिका भित्ति रहित: एनीमेलिया]
    F --> H[प्रकाश संश्लेषण न करने वाले: कवक]
    F --> I[प्रकाश संश्लेषण करने वाले: प्लांटी]

1. मोनेरा (Monera)

2. प्रोटिस्टा (Protista)

3. कवक (Fungi)

4. प्लांटी जगत (Kingdom Plantae - पादप जगत)

ये बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक स्वपोषी जीव हैं जिनमें सेल्यूलोज की बनी कोशिका भित्ति पाई जाती है। इन्हें शरीर की जटिलता के आधार पर पांच समूहों में बांटा गया है:

  1. थैलोफाइटा (Thallophyta): पौधों का शरीर जड़, तना और पत्तियों में विभाजित नहीं होता (थैलस रूप)। इन्हें सामान्यतः शैवाल (Algae) कहते हैं। ये मुख्य रूप से जल में पाए जाते हैं। उदाहरण: यूलोथ्रिक्स, स्पाइरोगाइरा, कारा।
  2. ब्रायोफाइटा (Bryophyta): इन्हें पादप जगत का उभयचर (Amphibians) कहा जाता है क्योंकि ये मिट्टी पर रहते हैं लेकिन प्रजनन के लिए जल पर निर्भर करते हैं। तने और पत्ती जैसी संरचनाएं होती हैं, लेकिन संवहन ऊतक (जाइलम/फ्लोएम) नहीं होते। उदाहरण: मॉस (फ्यूनारिया), रिक्सिया, मर्केंशिया।
  3. टेरिडोफाइटा (Pteridophyta): इनका शरीर जड़, तना और पत्तियों में विभाजित होता है और संवहन ऊतक उपस्थित होते हैं। इनमें फूल और बीज नहीं बनते, इन्हें क्रिप्टोगैम (Cryptogams) कहते हैं। उदाहरण: फर्न, मार्सिलिया, हॉर्स-टेल।
  4. जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms - नग्नबीजी): ये बहुवर्षीय, सदाबहार और काष्ठीय पौधे हैं। इनके बीज फलों के अंदर बंद नहीं होते (नग्न बीज)। उदाहरण: पाइनस (चीड़), साइकस।
  5. एंजियोस्पर्म (Angiosperms - आवृतबीजी): इन्हें पुष्पीय पौधे भी कहते हैं। इनके बीज फलों के अंदर ढके होते हैं। भ्रूण के बीजों में बीजपत्र (Cotyledons) होते हैं।
  6. एकबीजपत्री (Monocots): एक बीजपत्र वाले (जैसे मक्का, गेहूं)।
  7. द्विबीजपत्री (Dicots): दो बीजपत्र वाले (जैसे चना, मटर)।

5. एनीमेलिया जगत (Kingdom Animalia - जंतु जगत)

ये बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक और विषमपोषी जीव हैं जिनमें कोशिका भित्ति नहीं पाई जाती। इन्हें शारीरिक संरचना के आधार पर 10 संघों (Phyla) में बांटा गया है:

  1. पोरिफेरा (Porifera): छिद्रयुक्त शरीर वाले अचल जीव। ये समुद्र में पाए जाते हैं। इनका कंकाल कठोर होता है। उदाहरण: साइकॉन, स्पंजिला।
  2. सीलेन्ट्रेटा (Coelenterata / Cnidaria): जलीय जंतु, जिनके शरीर में एक गुहा (coelenteron) पाई जाती है। शरीर दो परतों का बना होता है। उदाहरण: हाइड्रा, जेलीफिश, कोरल।
  3. प्लेटिहेल्मिंथीज (Platyhelminthes - चपटे कृमि): द्विपार्श्व सममित (bilaterally symmetrical) और त्रिकोरकी (triploblastic) शरीर। वास्तविक देहगुहा का अभाव। चपटे शरीर वाले। उदाहरण: प्लेनेरिया, लिवर फ्लूका, फीताकृमि (Tapeworm)।
  4. नेमेटोड (Nematoda - गोल कृमि): बेलनाकार शरीर, त्रिकोरकी और द्विपार्श्व सममित। कूट देहगुहा (pseudocoelom) पाई जाती है। अधिकांश परजीवी होते हैं। उदाहरण: एस्केरिस (गोलकृमि), फाइलेरिया कृमि (वुचेरेरिया)।
  5. एनेलिडा (Annelida): वास्तविक देहगुहा उपस्थित। शरीर खंडों में विभाजित होता है (Metameric segmentation)। उदाहरण: केंचुआ (Earthworm), जोंक (Leech)।
  6. आर्थ्रोपोडा (Arthropoda): यह जंतु जगत का सबसे बड़ा संघ है। इनमें जुड़े हुए पैर (jointed legs) पाए जाते हैं। खुला परिसंचरण तंत्र होता है। देहगुहा रक्त से भरी होती है (haemocoel)। उदाहरण: झींगा, तितली, मकड़ी, बिच्छू, केकड़ा, मक्खी।
  7. मोलस्का (Mollusca): द्विपार्श्व सममित शरीर। देहगुहा बहुत कम होती है। शरीर पर कठोर कैल्सियम का कवच होता है। खुला परिसंचरण तंत्र और उत्सर्जन के लिए गुर्दे जैसी संरचना होती है। उदाहरण: घोंघा (Pila), ऑक्टोपस, सीप (Unio)।
  8. इकाईनोडर्मेटा (Echinodermata): त्वचा काँटेदार होती है। ये मुक्त रूप से समुद्री जंतु हैं। इनमें विशिष्ट जल संवहन नाल तंत्र (water vascular system) पाया जाता है जो चलन में मदद करता है। उदाहरण: तारा मछली (Starfish), समुद्री अर्चिन।
  9. प्रोटोकॉर्डेटा (Protochordata): द्विपार्श्व सममित, त्रिकोरकी और देहगुहा युक्त। जीवन की कुछ अवस्थाओं में नोटोकॉर्ड (पृष्ठरज्जू) पाया जाता है। उदाहरण: बैले्नोग्लोसस, एम्फियोक्सस।
  10. वर्टीब्रेटा (Vertebrata - कशेरुकी): इनमें वास्तविक मेरुदंड (vertebral column) और अंतःकंकाल पाया जाता है। इन्हें पांच वर्गों में बांटा गया है:
    • मत्स्य (Pisces): मछली। शल्क होते हैं, गलफड़ों (gills) से श्वसन, द्विकक्षीय हृदय, असमतापी (cold-blooded)।
    • जल-स्थलचर (Amphibia): मेंढक, टोड। श्लेष्म ग्रंथियां होती हैं, फेफड़ों और त्वचा से श्वसन, त्रिकक्षीय हृदय, असमतापी।
    • सरीसृप (Reptilia): साँप, कछुआ, छिपकली। सूखी त्वचा और शल्क, त्रिकक्षीय हृदय (मगरमच्छ में चार कक्ष), असमतापी, अंडे देते हैं।
    • पक्षी (Aves): शुतुरमुर्ग, कबूतर। पंख होते हैं, चार कक्षीय हृदय, समतापी (warm-blooded), फेफड़ों से श्वसन।
    • स्तनधारी (Mammalia): मनुष्य, बिल्ली, व्हेल, चमगादड़। दुग्ध ग्रंथियां और त्वचा पर बाल होते हैं, चार कक्षीय हृदय, समतापी, बच्चों को जन्म देते हैं (अपवाद: एकिडना और प्लेटिपस अंडे देते हैं)।

3. द्विपद नामकरण पद्धति (Binomial Nomenclature)

कैरोलस लिनियस ने 18वीं शताब्दी में जीवों के वैज्ञानिक नामकरण के लिए द्विपद नामकरण पद्धति दी। इसके अनुसार प्रत्येक वैज्ञानिक नाम के दो भाग होते हैं: 1. जीनस (Genus): वंश का नाम, जो अंग्रेजी के बड़े अक्षर (Capital letter) से शुरू होता है। 2. स्पीशीज (Species): जाति का नाम, जो छोटे अक्षर (Small letter) से शुरू होता है। - वैज्ञानिक नामों को लिखते समय तिरछे अक्षरों (Italics) में छापा जाता है या हाथ से लिखने पर रेखांकित (underlined) किया जाता है। जैसे: मानव का वैज्ञानिक नाम Homo sapiens है।

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