विस्तृत सिद्धांत, सूत्र, आरेख और स्मृति सहायक।
तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या की भोजन संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हमारे पास उपलब्ध कृषि भूमि सीमित है। इसलिए कृषि और पशुधन (animal husbandry) की उत्पादन क्षमता बढ़ाना अनिवार्य है। - हरित क्रांति (Green Revolution): फसल उत्पादन में भारी वृद्धि (विशेषकर उन्नत बीजों और उर्वरकों के उपयोग से)। - श्वेत क्रांति (White Revolution): दूध के उत्पादन और उसकी उपलब्धता में भारी वृद्धि।
विभिन्न फसलों के लिए अलग-अलग जलवायु संबंधी परिस्थितियों (तापमान, वर्षा) की आवश्यकता होती है। फसलों को मौसम के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है: - खरीफ फसलें (Kharif Crops): वर्षा ऋतु में (जून से अक्टूबर तक) उगाई जाती हैं। जैसे: धान, सोयाबीन, अरहर, मक्का, मूंग। - रबी फसलें (Rabi Crops): शीत ऋतु में (नवंबर से अप्रैल तक) उगाई जाती हैं। जैसे: गेहूं, चना, मटर, सरसों, अलसी।
graph TD
A[फसलों के प्रकार] --> B[खरीफ: वर्षा ऋतु / जून-अक्टूबर / धान, मक्का]
A --> C[रबी: शीत ऋतु / नवंबर-अप्रैल / गेहूं, सरसों]
फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए ऐसी किस्मों (varieties) का चयन किया जाता है जो अधिक उपज दे सकें और रोगों के प्रति प्रतिरोधी हों। - संकरण (Hybridization): विभिन्न आनुवंशिक गुणों वाले पौधों के बीच क्रॉस कराकर नई वांछित गुणों वाली किस्में विकसित करना। - आनुवंशिकीय रूपांतरित फसलें (Genetically Modified Crops - GM Crops): पौधे के डीएनए में किसी वांछित बाहरी जीन को डालकर नई विशेषता प्रदान करना (जैसे बीटी कपास)। - वांछित आनुवंशिक सुधार के गुण: - उच्च उपज (High Yield) - जैविक और अजैविक प्रतिरोधकता (कीड़े-मकोड़े, सूखा, लवणता से बचाव) - परिपक्वता काल में परिवर्तन (फसल बोने से काटने तक कम समय लगना ताकि किसान साल में कई फसलें ले सके) - व्यापक अनुकूलता (विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में उगने की क्षमता)
इसमें पोषक तत्व प्रबंधन, सिंचाई और फसल प्रतिरूप (cropping patterns) शामिल हैं:
पौधों को वृद्धि के लिए 16 आवश्यक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है: - हवा से: कार्बन और ऑक्सीजन - जल से: हाइड्रोजन - मिट्टी से: शेष 13 तत्व, जिन्हें दो श्रेणियों में बांटा गया है: 1. वृहत् पोषक तत्व (Macro-nutrients): जिनकी पौधों को अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है (6 तत्व: नाइट्रोजन $N$, फास्फोरस $P$, पोटैशियम $K$, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर)। 2. सूक्ष्म पोषक तत्व (Micro-nutrients): जिनकी बहुत कम मात्रा में आवश्यकता होती है (7 तत्व: लोहा, मैंगनीज, बोरॉन, जस्ता, तांबा, मोलिब्डेनम, क्लोरीन)।
graph TD
A[पौधों के लिए आवश्यक 16 पोषक तत्व] --> B[हवा: C, O]
A --> C[जल: H]
A --> D[मिट्टी: 13 तत्व]
D --> E[वृहत् मैक्रो: N, P, K, Ca, Mg, S]
D --> F[सूक्ष्म माइक्रो: Fe, Mn, B, Zn, Cu, Mo, Cl]
खेतों में फसलों को खरपतवार, कीड़ों और रोगों से बचाना आवश्यक है। - खरपतवार (Weeds): मुख्य फसल के साथ उगने वाले अवांछित पौधे (जैसे गोखरू / ज़ैंथियम, गाजर घास / पार्थेनियम, मोथा / साइपरिनस रोटंडस)। ये धूप, पानी और पोषक तत्वों के लिए मुख्य फसल से प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे पैदावार घटती है। - अनाज का भंडारण: भंडारण के समय नमी और कीड़े-मकोड़े, कवक आदि अनाज को खराब कर देते हैं। अनाज को भंडारित करने से पहले धूप में अच्छी तरह सुखाना आवश्यक है।
पशुओं (गाय, भैंस, मुर्गी, मछली, मधुमक्खी) के वैज्ञानिक प्रबंधन को पशुपालन कहते हैं।
दूध देने वाले पशुओं (गाय, भैंस) को दुधारू पशु (Milch animals) कहते हैं। - विदेशी नस्लें (Foreign breeds): जैसे जर्सी, ब्राउन स्विस। इनका दुग्धस्रवण काल (lactation period) बहुत लंबा होता है। - देशी नस्लें (Local breeds): जैसे रेड सिंधी, साहीवाल। इनमें रोगों के प्रति असाधारण प्रतिरोधक क्षमता होती है। - संकरण द्वारा दोनों वांछित गुणों (लंबा दुग्धकाल और रोग प्रतिरोधक क्षमता) वाली नस्लें बनाई जाती हैं।
अंडे और मुर्गे के मांस (broiler) के उत्पादन को बढ़ाने के लिए मुर्गी पालन किया जाता है। - नई नस्लें विकसित करने के लिए देशी (जैसे असील) और विदेशी (जैसे लेगहॉर्न) नस्लों का संकरण कराया जाता है।
मछली प्रोटीन का सस्ता स्रोत है। - प्राकृतिक स्रोत: समुद्र या मीठे पानी से पकड़ना (Captive fishery)। - संवहन स्रोत: जलीय संवर्धन (Aquaculture/Mariculture) द्वारा पालना। - मिश्रित मछली संवर्धन (Composite Fish Culture): एक ही तालाब में 5 या 6 विभिन्न मछली प्रजातियों को एक साथ पालना जिनकी आहार आदतें अलग-अलग हों (जैसे कटला सतह से, रोहू मध्य क्षेत्र से, और म्रिगल व कॉमन कार्प तली से भोजन लेती हैं)। इससे भोजन का पूर्ण उपयोग होता है।
शहद और मोम (wax) के उत्पादन के लिए मधुमक्खी पालन किया जाता है। - व्यावसायिक शहद उत्पादन के लिए इतालवी मधुमक्खी (Apis mellifera) का उपयोग किया जाता है क्योंकि इसकी शहद एकत्र करने की क्षमता बहुत अधिक होती है और यह डंक कम मारती है। - शहद की गुणवत्ता मधुमक्खियों के चरागाह (pasturage) यानी फूलों पर निर्भर करती है जिनसे वे मकरंद (nectar) एकत्र करती हैं।