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ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है जो हमारे कानों में सुनने की संवेदना उत्पन्न करती है।
ध्वनि कंपन करती हुई वस्तुओं द्वारा उत्पन्न होती है। जब कोई वस्तु कंपन करती है, तो वह अपने आस-पास के माध्यम (जैसे हवा) के कणों को कंपित करती है, जिससे तरंग उत्पन्न होती है।
ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम (जैसे हवा, पानी, ठोस) की आवश्यकता होती है। - निर्वात (Vacuum) में ध्वनि संचरित नहीं हो सकती क्योंकि वहाँ कंपन को आगे बढ़ाने के लिए कण नहीं होते (जैसे चंद्रमा पर या बेल-जार प्रयोग द्वारा सिद्ध)। - ध्वनि तरंगें अनुदैर्ध्य तरंगें (Longitudinal Waves) होती हैं, जहाँ माध्यम के कण तरंग के संचरण की दिशा के समानांतर आगे-पीछे कंपन करते हैं। - ध्वनि के चलने पर माध्यम में दो प्रकार के क्षेत्र बनते हैं: - संपीडन (Compression - C): उच्च दाब और उच्च घनत्व का क्षेत्र जहाँ कण पास-पास आ जाते हैं। - विरलन (Rarefaction - R): निम्न दाब और निम्न घनत्व का क्षेत्र जहाँ कण दूर-दूर फैल जाते हैं।
graph LR
A[कंपनकारी स्रोत] --> B[संपीडन C: कण अत्यंत पास]
B --> C[विरलन R: कण दूर-दूर]
C --> B
B & C --> D[अनुदैर्ध्य तरंग का संचरण]
एक ध्वनि तरंग को चार मुख्य अभिलक्षणों द्वारा वर्णित किया जा सकता है:
graph TD
A[तरंग अभिलक्षण] --> B[तरंगदैर्ध्य: दो क्रमागत गर्तों/शृंगों की दूरी]
A --> C[आवृत्ति: प्रति सेकंड कंपनों की संख्या]
A --> D[आयाम: अधिकतम विस्थापन / प्रबलता]
A --> E[आवर्तकाल: एक कंपन का समय]
$$v = \nu \lambda$$ यहाँ $v$ = तरंग वेग, $\nu$ = आवृत्ति, और $\lambda$ = तरंगदैर्ध्य है। (या, वेग = आवृत्ति $\times$ तरंगदैर्ध्य)
ध्वनि की चाल माध्यम के गुणों (तापमान, घनत्व और प्रत्यास्थता) पर निर्भर करती है। - ठोसों में ध्वनि की चाल सबसे अधिक, द्रवों में उससे कम और गैसों में सबसे कम होती है। - माध्यम का तापमान बढ़ने पर ध्वनि की चाल बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए, 0°C पर शुष्क हवा में ध्वनि की चाल 331 m/s होती है, जबकि 22°C पर यह 344 m/s हो जाती है।
प्रकाश की तरह ध्वनि भी किसी ठोस या द्रव की सतह से टकराकर वापस लौटती है, जिसे ध्वनि का परावर्तन कहते हैं। इसके लिए बड़े परावर्तक पृष्ठों की आवश्यकता होती है।
जब मूल ध्वनि के बाद परावर्तित ध्वनि स्पष्ट रूप से सुनाई देती है, तो उसे प्रतिध्वनि कहते हैं। - हमारे मस्तिष्क में ध्वनि का प्रभाव लगभग 0.1 सेकंड तक रहता है। - अतः स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए मूल ध्वनि और परावर्तित ध्वनि के बीच कम से कम 0.1 s का समय अंतराल होना चाहिए। - 22°C पर हवा में ध्वनि की चाल 344 m/s मानते हुए, परावर्तक सतह की न्यूनतम दूरी: $$\text{Total Distance} = v \times t = 344 \text{ m/s} \times 0.1 \text{ s} = 34.4 \text{ m}$$ $$\text{Minimum Distance} = \frac{34.4}{2} = 17.2 \text{ m}$$ अर्थात, कुल तय की गई दूरी 34.4 मीटर और परावर्तक सतह की न्यूनतम एकतरफा दूरी 17.2 मीटर होनी चाहिए।
किसी बड़े हॉल में बार-बार होने वाले परावर्तन के कारण ध्वनि का स्थायित्व (गूंज) अनुरणन कहलाता है। इसे कम करने के लिए हॉल की छतों और दीवारों पर ध्वनि-अवशोषक पदार्थ (जैसे कंप्रेस्ड फाइबर बोर्ड, मोटे परदे) लगाए जाते हैं।
मनुष्य के कानों के लिए सुनने की सीमा (श्रव्यता परिसर): - श्रव्य ध्वनि (Audible Sound): $20 \text{ Hz}$ से $20,000 \text{ Hz}$ (20 kHz) तक। - अव्यध्वनि (Infrasonic): $20 \text{ Hz}$ से कम आवृत्ति की ध्वनि (जैसे व्हेल, हाथी, गैंडे उत्सर्जित करते हैं। भूकंप के समय भी अव्यध्वनि तरंगें निकलती हैं)। - पराश्रव्य ध्वनि (Ultrasonic/Ultrasound): $20,000 \text{ Hz}$ ($20\text{ kHz}$) से अधिक आवृत्ति की ध्वनि (जैसे चमगादड़, डॉल्फ़िन, चूहे उत्सर्जित करते हैं)।
मानव कान एक संवेदनशील संवेदी अंग है जो हवा में होने वाले दाब परिवर्तनों (ध्वनि तरंगों) को विद्युत संकेतों में बदलता है।
graph LR
A[बाहरी कान: पिन्ना] -->|श्रवण नलिका| B[मध्य कान: कर्ण पटह / तीन हड्डियां]
B -->|प्रवर्धित दाब| C[आंतरिक कान: कॉकलिया]
C -->|विद्युत संकेत| D[श्रवण तंत्रिका द्वारा मस्तिष्क तक]