फ्रांसीसी क्रांति (1789) विश्व इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। यह केवल फ्रांस तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने पूरे यूरोप तथा विश्व में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty, Equality, Fraternity) के विचारों को फैलाया। इस क्रांति ने राजतंत्र को समाप्त कर गणतंत्र की नींव रखी और यह साबित किया कि जब शासक जनता की सुनना बंद कर देते हैं तो जनता स्वयं शासन बदलने की शक्ति रखती है। कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में फ्रांसीसी क्रांति को उसके कारणों, घटनाक्रम और परिणामों के साथ विस्तार से समझाया गया है। इस अध्याय को पढ़कर हमें समझ आता है कि मध्य वर्ग ने किस प्रकार असमानता के विरुद्ध आवाज उठाई, किस प्रकार तीसरे वर्ग ने संघर्ष किया और अंततः राष्ट्रवाद तथा लोकतंत्र के आधुनिक विचारों ने जन्म लिया।
क्रांति से पहले फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों या एस्टेट में विभाजित था। प्रथम एस्टेट में पादरी वर्ग (Clergy), द्वितीय एस्टेट में कुलीन वर्ग (Nobility) तथा तृतीय एस्टेट में किसान, कारीगर, व्यापारी, वकील, अधिवक्ता और आम नागरिक शामिल थे। पहले दो वर्ग विशेषाधिकार प्राप्त थे और करों से मुक्त थे। सारा कर बोझ तृतीय एस्टेट पर ही था। तृतीय एस्टेट को विभिन्न प्रकार के कर देने पड़ते थे, जैसे टेल (राज्य को दिया जाने वाला प्रत्यक्ष कर), टाइद (चर्च को दिया जाने वाला कर) तथा कुलीनों को दिए जाने वाले सामंती लगान (Feudal Dues)। इसके अलावा नमक पर लगने वाले कर गैबेल जैसे अप्रत्यक्ष कर भी लगाए गए थे।
1774 में लुई सोलहवें ने फ्रांस की गद्दी संभाली। फ्रांस लंबे युद्धों, विशेषकर सात वर्षीय युद्ध तथा अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में सहायता के कारण भारी कर्ज में डूब चुका था। वर्साय के महल का विलासी जीवन-यापन और शाही परिवार का खर्च राजकोष पर भारी बोझ बन गया था। कर्ज चुकाने के लिए कर बढ़ाए गए, लेकिन पादरी और कुलीन वर्ग ने कर देने से इनकार कर दिया। इस संकट को सुलझाने के लिए लुई सोलहवें को 1789 में एस्टेट्स जनरल (एक ऐसी सभा जिसमें तीनों एस्टेट के प्रतिनिधि बैठते थे) बुलाना पड़ा।
18वीं सदी में फ्रांस की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी, लेकिन उत्पादन इतनी तेजी से नहीं बढ़ा। फसल खराब होने से अनाज की कीमतें बढ़ गईं, जिससे रोटी का मूल्य बढ़ गया। श्रमिकों के वेतन में वृद्धि नहीं हुई। इस स्थिति को निर्वाह संकट (Subsistence Crisis) कहा जाता है। आम जनता रोटी के लिए तरसने लगी और उनमें असंतोष फैल गया।
18वीं सदी के दार्शनिकों और बुद्धिजीवियों, जैसे जॉन लॉक, जीन जैक्स रूसो और मोंटेस्क्यू ने ऐसे विचार प्रस्तुत किए जिन्होंने जनमानस को प्रभावित किया। जॉन लॉक ने 'टू ट्रीटीज़ ऑफ गवर्नमेंट' में राजा के ईश्वर प्रदत्त अधिकारों को चुनौती दी। रूसो ने अपनी पुस्तक 'सोशल कॉन्ट्रैक्ट' में कहा कि शासन जनता की इच्छा पर आधारित होना चाहिए। मोंटेस्क्यू ने शक्ति के विभाजन (न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका) का विचार दिया। इन विचारों ने लोगों में समानता और अधिकारों की चेतना जगाई।
5 मई 1789 को वर्साय में एस्टेट्स जनरल की बैठक हुई। परंपरा के अनुसार प्रत्येक एस्टेट को एक मत दिया जाता था। तृतीय एस्टेट ने मांग की कि मतदान प्रति व्यक्ति के आधार पर हो, क्योंकि उनके पास प्रतिनिधियों की संख्या सबसे अधिक थी। जब राजा ने इस मांग को ठुकरा दिया, तो तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधियों ने अपनी अलग सभा बनाई और खुद को नेशनल असेंबली घोषित कर दिया। 20 जून 1789 को उन्होंने वर्साय के टेनिस कोर्ट में शपथ ली कि जब तक फ्रांस के लिए संविधान नहीं बन जाता, वे तब तक नहीं बिखरेंगे। इस शपथ को टेनिस कोर्ट की शपथ कहा जाता है।
राजा ने इस विरोध को कुचलने के लिए पेरिस में सेना भेजी। 14 जुलाई 1789 को क्रोधित भीड़ ने बैस्टील दुर्ग पर आक्रमण कर उसे तोड़ दिया। बैस्टील एक दुर्ग-जेल था जो राजा की निरंकुशता का प्रतीक माना जाता था। भीड़ ने वहां से हथियार लेने का प्रयास किया। बैस्टील के पतन के साथ ही फ्रांस में क्रांति की शुरुआत हो गई। उसी वर्ष ग्रामीण इलाकों में भी अशांति फैल गई। किसानों ने सामंतों के दस्तावेजों को जला दिया। इस घटना को महान भय (Great Fear) कहा गया। 4 अगस्त 1789 को नेशनल असेंबली ने सामंतवादी व्यवस्था समाप्त करने का आदेश पारित किया।
26 अगस्त 1789 को नेशनल असेंबली ने मानव और नागरिक अधिकारों की घोषणा (Declaration of the Rights of Man and Citizen) जारी की। इस घोषणा के मुख्य बिंदु थे: जन्म से ही सभी व्यक्ति स्वतंत्र और समान अधिकारों के साथ पैदा होते हैं; व्यक्ति की स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा तथा उत्पीड़न के प्रति प्रतिरोध प्राकृतिक अधिकार हैं; स्वतंत्रता का अर्थ है किसी भी कार्य को करने में सक्षम होना जो दूसरों को हानि न पहुंचाए; राज्य का उद्देश्य सभी के प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा करना है; कानून केवल सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति है और सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हैं।
1791 में फ्रांस का पहला संविधान बनाया गया। इस संविधान के अनुसार फ्रांस एक संवैधानिक राजतंत्र बन गया। विधायिका की शक्ति नेशनल असेंबली को दी गई, जिसका चुनाव होना था। हालांकि, मताधिकार केवल सक्रिय नागरिकों (Active Citizens) को ही प्राप्त था, जो श्रमिक के तीन दिन की मजदूरी के बराबर कर चुकाते थे। जो नागरिक इस मानदंड को पूरा नहीं करते थे, उन्हें निष्क्रिय नागरिक (Passive Citizens) कहा गया और उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं था। इस प्रकार केवल संपन्न वर्ग को ही राजनीतिक भागीदारी मिली। महिलाओं को भी वोट का अधिकार नहीं मिला। लेखिका ओलम्प दे गूज ने 1791 में 'महिला और नागरिका के अधिकारों की घोषणा' प्रस्तुत की, जिसमें महिलाओं को भी समान अधिकार देने की मांग की गई।
1792-93 के दौरान राजनीतिक क्लबों का प्रभाव बढ़ा। सबसे प्रसिद्ध क्लब जैकोबिन क्लब था, जिसका नेतृत्व मैक्सीमिलियन रोबेस्पियर कर रहे थे। जैकोबिन का सबसे बड़ा समूह सैंस-क्यूलोट्स (Sans-Culottes) कहलाता था, जिसमें छोटे व्यापारी, शिल्पकार, नौकर और दिहाड़ी मजदूर शामिल थे। उनका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि वे कुलीनों की तरह चौड़े-छोटे पतलून (क्यूलोट्स) के बजाय सामान्य पतलून पहनते थे। राजा लुई सोलहवें ने फ्रांस से भागने का प्रयास किया लेकिन उसे पकड़ लिया गया।
सितंबर 1792 में फ्रांस को गणतंत्र घोषित किया गया। नेशनल कन्वेंशन ने राजा लुई सोलहवें पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर जनवरी 1793 में उसे गिलोटिन द्वारा मृत्युदंड दिया। इसके बाद आतंक का शासन (Reign of Terror) शुरू हुआ, जिसमें रोबेस्पियर के नेतृत्व में क्रांति के विरोधियों को गिलोटिन से मारा गया। रोबेस्पियर ने कई सुधार भी किए, जैसे अधिकतम मूल्य सीमा तय करना, गुलामी समाप्त करना, ब्रेड की कीमतें सीमित करना। लेकिन उसका शासन अत्यंत कठोर था और 1794 में स्वयं रोबेस्पियर को भी गिलोटिन द्वारा मृत्युदंड दे दिया गया। इसके बाद 1795 में डायरेक्टरी नामक शासन व्यवस्था बनी, जो भ्रष्टाचार के कारण अलोकप्रिय हो गई।
डायरेक्टरी की अयोग्यता का लाभ उठाकर नेपोलियन बोनापार्ट ने 1799 में सत्ता पर कब्जा कर लिया। उसने स्वयं को पहले कौंसल और फिर 1804 में सम्राट घोषित किया। नेपोलियन ने कई युद्ध जीते और यूरोप के बड़े भाग पर विजय प्राप्त की। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि नेपोलियन की सिविल संहिता 1804 (Civil Code) थी, जिसे नेपोलियन संहिता भी कहा जाता है। इस संहिता में जन्म के आधार पर विशेषाधिकारों को समाप्त किया गया, कानून के समक्ष समानता स्थापित की गई और संपत्ति के अधिकार की गारंटी दी गई। लेकिन 1815 में वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन की हार हुई और उसका साम्राज्य समाप्त हो गया।
फ्रांसीसी क्रांति की विरासत आज भी जीवित है। क्रांति ने लोगों के मन में राष्ट्रवाद और लोकतंत्र के विचार स्थापित किए। 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' का नारा पूरे विश्व में गूंजा। बाद में समाजवादी विचारों, साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों और जनवादी आंदोलनों ने इसी से प्रेरणा ली। महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखा और धीरे-धीरे विश्व के कई देशों में उन्हें मताधिकार मिला। क्रांति ने यह संदेश दिया कि शासन की वैधता जनता की इच्छा से आती है, किसी राजा के जन्मसिद्ध अधिकार से नहीं।
फ्रांसीसी क्रांति से जुड़ी प्रमुख तिथियों और घटनाओं को याद रखना परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है। 1774 में लुई सोलहवें राजा बने; 1789 में एस्टेट्स जनरल बुलाई गई; 14 जुलाई 1789 को बैस्टील का पतन; 26 अगस्त 1789 को मानवाधिकारों की घोषणा; 1791 में संविधान निर्माण; 1792 में गणतंत्र की घोषणा; 1793 में राजा का मृत्युदंड; 1793-94 में आतंक का शासन; 1795 में डायरेक्टरी का गठन; 1799 में नेपोलियन का सत्ता-अभिग्रहण; 1804 में नेपोलियन संहिता; और 1815 में वाटरलू का युद्ध। इन घटनाओं का सही क्रम समझना विद्यार्थियों को तिथि-परक प्रश्नों को हल करने में मदद करता है। साथ ही, अर्थव्यवस्था के संकट, सामाजिक असमानता, दार्शनिक विचारों तथा निर्वाह संकट जैसे कारणों को अलग-अलग करके समझना भी आवश्यक है।
| तिथि/वर्ष | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 1774 | लुई सोलहवें का राज्यारोहण | निरंकुश शासन की शुरुआत |
| 5 मई 1789 | एस्टेट्स जनरल की बैठक | तृतीय एस्टेट ने बहुमत मांगा |
| 20 जून 1789 | टेनिस कोर्ट की शपथ | संविधान बनाने का संकल्प |
| 14 जुलाई 1789 | बैस्टील का पतन | क्रांति की शुरुआत |
| 26 अगस्त 1789 | मानवाधिकारों की घोषणा | स्वतंत्रता एवं समानता की घोषणा |
| 1791 | संविधान निर्माण | संवैधानिक राजतंत्र |
| सितंबर 1792 | गणतंत्र की घोषणा | राजतंत्र का अंत |
| जनवरी 1793 | राजा का मृत्युदंड | राजद्रोह का दंड |
| 1793-94 | आतंक का शासन | रोबेस्पियर का कठोर शासन |
| 1795 | डायरेक्टरी शासन | भ्रष्ट एवं अलोकप्रिय |
| 1799 | नेपोलियन का सत्ता-अभिग्रहण | सैनिक तानाशाही |
| 1804 | नेपोलियन संहिता | कानून की समानता |
| 1815 | वाटरलू का युद्ध | नेपोलियन की पराजय |
| विशेषता | प्रथम एस्टेट | द्वितीय एस्टेट | तृतीय एस्टेट |
|---|---|---|---|
| वर्ग | पादरी (Clergy) | कुलीन (Nobility) | किसान, कारीगर, व्यापारी, मध्यवर्ग |
| विशेषाधिकार | प्राप्त | प्राप्त | नहीं |
| कर | नहीं देते | नहीं देते | सभी कर देते थे |
| जनसंख्या का अनुपात | अल्पमत | अल्पमत | बहुमत (लगभग 96%) |
| भूमि स्वामित्व | महत्वपूर्ण भाग | महत्वपूर्ण भाग | सीमित/न्यून |
| कर का नाम | किसे दिया जाता था | प्रकार |
|---|---|---|
| टेल (Taille) | राज्य | प्रत्यक्ष कर |
| टाइद (Tithe) | चर्च | धार्मिक कर |
| सामंती लगान | कुलीनों को | सामंती कर |
| गैबेल (Gabelle) | राज्य | नमक पर अप्रत्यक्ष कर |
फ्रांसीसी क्रांति केवल फ्रांस की घटना नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतंत्र की आधारशिला है। इसने यह सिद्ध किया कि अन्याय और असमानता स्थायी नहीं हो सकते। क्रांति के माध्यम से मध्य वर्ग, किसान और श्रमिक सभी ने अपनी आवाज उठाई। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांत आज भी विश्व के संविधानों का आधार हैं। हालांकि क्रांति के बाद फ्रांस में तुरंत स्थायी लोकतंत्र स्थापित नहीं हुआ और नेपोलियन जैसा तानाशाह उभरा, फिर भी इसके द्वारा जगाए गए राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक चेतना के बीज बाद में पूरे यूरोप में फले-फूले। कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए यह अध्याय केवल परीक्षा की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि नागरिक जागरूकता की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।