किसी स्थान का मौसम और जलवायु उसकी भौगोलिक पहचान का अभिन्न अंग है। मौसम (Weather) किसी स्थान का वायुमंडल की अल्पकालिक (दिन-प्रतिदिन) स्थिति है, जबकि जलवायु (Climate) किसी स्थान का दीर्घकालिक (लगभग 30 वर्षों का) औसत मौसम है। मौसम बदलता रहता है, लेकिन जलवायु दीर्घकाल में स्थिर रहती है। किसी स्थान की जलवायु के प्रमुख तत्वों में तापमान, वायुदाब, पवन, आर्द्रता, मेघ और वर्षण शामिल हैं। भारत की जलवायु मुख्यतः मानसूनी प्रकार की है। भारत की जलवायु को समझने के लिए मानसून की उत्पत्ति, उसकी विशेषताएं, मौसम और ऋतुएं तथा वर्षा का वितरण आवश्यक है। यह अध्याय इन सभी पहलुओं का विस्तृत अध्ययन करेगा।
भारत की जलवायु को कई भौगोलिक कारक प्रभावित करते हैं:
भारत का मौसम-विज्ञान मानसून पर आधारित है। मानसून की उत्पत्ति के पारंपरिक सिद्धांत के अनुसार, गर्मियों में भूमि जल से अधिक गर्म होती है, जिससे भूमि पर कम दबाव और समुद्र पर उच्च दबाव बनता है, और हवाएं समुद्र से भूमि की ओर बहती हैं। आधुनिक सिद्धांतों के अनुसार, मानसून की उत्पत्ति में जेट धाराएं, तिब्बत का पठार तथा इंटर-ट्रॉपिकल कन्वर्जेंस ज़ोन (ITCZ) की भूमिका होती है। गर्मियों में जेट धाराएं हिमालय के उत्तर में चली जाती हैं, जबकि सर्दियों में ये हिमालय के दक्षिण में आ जाती हैं। तिब्बत के पठार का गर्म होना मानसून की उत्पत्ति में सहायक होता है।
भारतीय मानसून निम्नलिखित विशेषताओं के लिए जाना जाता है:
जून के आरंभ में दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत के तटों पर पहुंचता है। यह अरब सागर की शाखा और बंगाल की खाड़ी की शाखा में विभाजित होता है। अरब सागर की शाखा पश्चिमी घाट की पवनमुखी ढाल पर भारी वर्षा करती है, जबकि बंगाल की खाड़ी की शाखा असम तथा उत्तर-पूर्वी भारत में भारी वर्षा करती है। मावसिनराम और चेरापूंजी (मेघालय) विश्व के सबसे अधिक वर्षा वाले स्थानों में से एक हैं।
भारत में मुख्यतः चार ऋतुएं पाई जाती हैं:
इस ऋतु में तापमान कम रहता है। उत्तर भारत में ठंडी, शुष्क और शुष्क उत्तरी-पूर्वी पवनें चलती हैं। उत्तर-पश्चिमी भारत में शीतकालीन वर्षा पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) के कारण होती है। ये विक्षोभ भूमध्य सागर से आने वाली पछुआ हवाएं हैं।
इस ऋतु में तापमान तेजी से बढ़ता है। राजस्थान और उत्तर-पश्चिमी भारत में अत्यधिक गर्मी पड़ती है। इसी ऋतु में लू (Loo) नामक गर्म, शुष्क और तेज हवाएं चलती हैं। भारत के कुछ भागों में पूर्वावर्ती मानसून वर्षा (Pre-monsoon showers) होती है, जैसे कर्नाटक में 'मांगो शावर', बंगाल में 'काल बैसाखी' (आंधियां)।
इस ऋतु में दक्षिण-पश्चिम मानसून के कारण देश के अधिकांश भागों में वर्षा होती है। यह देश की वार्षिक वर्षा का लगभग 75 से 80 प्रतिशत हिस्सा देती है।
इस ऋतु में मानसून लौटता है (प्रत्यावर्तन होता है)। वर्षा धीरे-धीरे घटती है। अक्टूबर-नवंबर में बंगाल की खाड़ी में चक्रवात (Cyclones) बनते हैं, जो तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के तटों पर वर्षा करते हैं।
भारत में वर्षा का वितरण अत्यंत असमान है। पश्चिमी तट और उत्तर-पूर्वी भारत को सबसे अधिक वर्षा (200 से 400 सेंटीमीटर से अधिक) मिलती है। पश्चिमी राजस्थान, गुजरात के कुछ भाग, दक्कन का आंतरिक भाग और उत्तर-पूर्वी भागों के कुछ क्षेत्र कम वर्षा (50 सेंटीमीटर से कम) प्राप्त करते हैं। शेष देश को मध्यम वर्षा (50 से 200 सेंटीमीटर) मिलती है। भारत में वर्षा का यह असमान वितरण कृषि, जल संसाधन और जीवन-शैली को गहराई से प्रभावित करता है।
मानसून भारत की विविधता के बावजूद देश को एकजुट करता है। उत्तर-पश्चिम का शुष्क क्षेत्र, उत्तर-पूर्व का आर्द्र क्षेत्र, प्रायद्वीपीय पठार और उत्तरी मैदान - सभी मानसून की वर्षा पर निर्भर करते हैं। मानसून की वर्षा ही देश की कृषि, जल-विद्युत, पेयजल और अर्थव्यवस्था का आधार है। भारतीय किसान की पूरी फसल-व्यवस्था मानसून पर टिकी हुई है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि मानसून भारत की 'एकता का सूत्र' और 'एकीकरण का बंधन' है। हालांकि मानसून की अनियमितता, अति-वर्षा और सूखे जैसी समस्याओं के कारण कभी-कभी विनाश भी लाती है।
हाल के वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण भारत की मानसून-प्रणाली में परिवर्तन देखा जा रहा है। असामान्य वर्षा, चक्रवातों की बढ़ती आवृत्ति, सूखे और बाढ़ की घटनाएं बढ़ी हैं। इसका कारण हरितगृह गैसों का उत्सर्जन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए भारत ने राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) जैसे कदम उठाए हैं। जल संरक्षण, सौर ऊर्जा, वृक्षारोपण और सतत कृषि भविष्य के लिए आवश्यक हैं।
| पहलू | मौसम (Weather) | जलवायु (Climate) |
|---|---|---|
| समय-अवधि | अल्पकालिक (दिन/घंटे) | दीर्घकालिक (30+ वर्ष) |
| परिवर्तन | तेजी से बदलता है | स्थिर रहती है |
| अध्ययन | मौसम विज्ञान | जलवायु विज्ञान |
| ऋतु | माह | विशेषताएं |
|---|---|---|
| शीत ऋतु | दिसंबर-फरवरी | शुष्क पवनें, पश्चिमी विक्षोभ से वर्षा |
| ग्रीष्म ऋतु | मार्च-मई | लू, मांगो शावर, काल बैसाखी |
| वर्षा ऋतु | जून-सितंबर | दक्षिण-पश्चिम मानसून, अधिकांश वर्षा |
| प्रत्यावर्तन | अक्टूबर-नवंबर | मानसून लौटता है, चक्रवात |
| तत्व | भूमिका |
|---|---|
| जेट धाराएं | मानसून का मार्ग निर्धारित करती हैं |
| तिब्बत का पठार | गर्मी से कम दबाव बनता है |
| ITCZ | वर्षा क्षेत्र का स्थानांतरण |
| पश्चिमी घाट | पवनमुखी ढाल पर भारी वर्षा |
भारत की जलवायु मुख्यतः मानसूनी है, जो देश के सभी क्षेत्रों को एकजुट करने वाली ताकत है। अक्षांश, ऊंचाई, समुद्र-दूरी, दबाव-पवन तंत्र, महासागरीय धाराएं और उच्चावच मिलकर भारतीय जलवायु का निर्धारण करते हैं। चार ऋतुओं का चक्र कृषि और जीवन-शैली को निर्धारित करता है। मानसून की वर्षा भारतीय किसान के लिए जीवन-रेखा है, लेकिन इसकी अनियमितता बाढ़ और सूखे जैसी समस्याएं भी लाती है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून-प्रणाली में आ रहे परिवर्तनों को देखते हुए जल संरक्षण, सतत कृषि और पर्यावरण संरक्षण अनिवार्य हो गया है। यह अध्याय कृषि, वनस्पति और जनसंख्या जैसे अन्य भूगोल अध्यायों को समझने की नींव है।