लोकतंत्र केवल चुनाव और प्रतिनिधियों तक सीमित नहीं है। सच्चा लोकतंत्र वही है जिसमें नागरिकों के अधिकारों (Rights) की रक्षा होती है। अधिकार वे दावे हैं जिन्हें समाज स्वीकार करता है और राज्य लागू करता है। लोकतांत्रिक अधिकार नागरिकों को सुरक्षा, स्वतंत्रता और गरिमा प्रदान करते हैं। भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) की व्यवस्था की गई है, जो संविधान के भाग III में निहित हैं। ये अधिकार न्यायपालिका द्वारा लागू किए जा सकते हैं। इस अध्याय में हम अधिकारों के महत्व, भारतीय मौलिक अधिकारों, विभिन्न देशों के उदाहरणों (ग्वांतानामो, सऊदी अरब, सर्बिया) तथा अधिकारों के विस्तार का अध्ययन करेंगे।
अधिकार किसी व्यक्ति के वे दावे हैं जिन्हें समाज मान्यता देता है और जिन्हें राज्य लागू करता है। अधिकार लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं क्योंकि:
यदि किसी देश में नागरिकों को अधिकार नहीं मिलते, तो वहां लोकतंत्र केवल औपचारिक होता है। इसलिए अधिकारों की रक्षा करना लोकतांत्रिक शासन की अनिवार्य शर्त है।
भारतीय संविधान के भाग III में छह मौलिक अधिकार दिए गए हैं:
यह अधिकार कानून के समक्ष सभी को समान मानता है। यह जाति, धर्म, लिंग, जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है। इसमें अस्पृश्यता का उन्मूलन भी शामिल है। असमानता दूर करने के लिए राज्य विशेष प्रावधान (जैसे SC/ST/OBC के लिए आरक्षण) कर सकता है।
इसमें छह स्वतंत्रताएं शामिल हैं: वाणी एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सम्मेलन की स्वतंत्रता, संघ/संगठन बनाने की स्वतंत्रता, आवागमन की स्वतंत्रता, निवास की स्वतंत्रता तथा कोई पेशा/व्यापार करने की स्वतंत्रता। इसके अतिरिक्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा तथा शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21 और 21A) भी इसी अधिकार में शामिल हैं।
यह अधिकार मानव तस्करी, बेगार (जबरन श्रम) और बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध लगाता है। इसके अतिरिक्त 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक कारखानों और खानों में काम पर लगाना प्रतिबंधित है।
यह अधिकार सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। इसके अंतर्गत धार्मिक मामलों का स्वतंत्र रूप से प्रबंध करने का अधिकार भी है। भारत एक पंथनिरपेक्ष राज्य है, जो किसी भी धर्म का पक्ष नहीं लेता।
यह अधिकार अल्पसंख्यकों और विभिन्न समुदायों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति संरक्षित करने का अधिकार देता है। यह शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना और प्रबंधन करने का अधिकार भी प्रदान करता है।
यह अधिकार नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे सर्वोच्च न्यायालय (या उच्च न्यायालय, अनुच्छेद 226) का द्वार खटखटाने का अधिकार देता है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस अधिकार को 'संविधान का हृदय और आत्मा' (Heart and Soul of the Constitution) कहा था, क्योंकि यह अन्य सभी अधिकारों को लागू कराने का माध्यम है।
2001 में आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के बाद अमेरिका ने क्यूबा में स्थित ग्वांतानामो बे नामक सैन्य अड्डे पर कई संदिग्धों को बिना मुकदमे के बंदी बनाया। वहां कैदियों को सैकड़ों वर्षों तक बिना सुनवाई के रखा गया। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि अधिकारों की सुरक्षा के बिना किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को नष्ट किया जा सकता है।
सऊदी अरब एक राजतंत्र है जहां नागरिकों को बुनियादी राजनीतिक अधिकार नहीं मिलते। वहां कोई निर्वाचित विधायिका नहीं है, राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध है, महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव है तथा धार्मिक स्वतंत्रता सीमित है। यह दर्शाता है कि राजनीतिक अधिकारों के बिना लोकतंत्र संभव नहीं।
1990 के दशक में सर्बिया में कोसोवो के अल्बानियाई लोगों के साथ जातीय सफाई (Ethnic Cleansing) जैसा भेदभाव किया गया। उनकी भाषा बोलने पर प्रतिबंध, उनके साथ घरेलू और सामाजिक भेदभाव तथा सरकारी नौकरियों से वंचित करना शामिल था। यह दर्शाता है कि बहुमतवादी शासन भी अधिकारों का हनन कर सकता है।
अधिकारों की सूची स्थिर नहीं होती, इसमें समय के साथ विस्तार होता है। भारत में भी नए अधिकार जोड़े गए हैं:
संविधान के अनुच्छेद 51A में मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख है, जैसे संविधान का सम्मान करना, राष्ट्रगान का सम्मान करना, पर्यावरण की रक्षा करना आदि। अधिकारों के साथ कर्तव्यों का निर्वहन भी नागरिक की जिम्मेदारी है।
भारत में मौलिक अधिकारों की रक्षा न्यायपालिका करती है। यदि किसी का मौलिक अधिकार छीना जाता है, तो वह अनुच्छेद 32 (सर्वोच्च न्यायालय) या अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) के तहत रिट याचिका दायर कर सकता है। सरकार और संसद कानून पारित कर अधिकारों को सीमित नहीं कर सकते यदि वे संविधान के विरुद्ध हों। यही कारण है कि भारत में लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित है।
| अधिकार | अनुच्छेद | मुख्य प्रावधान |
|---|---|---|
| समानता का अधिकार | 14-18 | कानून के समक्ष समानता, भेदभाव पर प्रतिबंध |
| स्वतंत्रता का अधिकार | 19-22 | छह स्वतंत्रताएं, जीवन-स्वतंत्रता |
| शोषण के विरुद्ध | 23-24 | तस्करी, बेगार, बाल श्रम पर प्रतिबंध |
| धार्मिक स्वतंत्रता | 25-28 | धर्म का पालन और प्रचार |
| सांस्कृतिक-शैक्षणिक | 29-30 | भाषा-संस्कृति की रक्षा |
| संवैधानिक उपचार | 32 | न्यायालय जाने का अधिकार |
| देश | अधिकारों का हनन |
|---|---|
| अमेरिका (ग्वांतानामो) | बिना मुकदमे बंदी |
| सऊदी अरब | राजनीतिक अधिकारों का अभाव |
| सर्बिया (कोसोवो) | जातीय सफाई, भाषा पर प्रतिबंध |
| अधिकार | विवरण |
|---|---|
| सूचना का अधिकार | सरकारी जानकारी तक पहुंच |
| शिक्षा का अधिकार | 6-14 वर्ष (अनुच्छेद 21A, 2002) |
| जनहित याचिका | जनहित में अदालत में याचिका |
लोकतांत्रिक अधिकार किसी भी सच्चे लोकतंत्र की बुनियाद हैं। भारत के संविधान ने नागरिकों को छह मौलिक अधिकार दिए हैं, जो समानता, स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और शोषण से सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। ग्वांतानामो, सऊदी अरब और सर्बिया के उदाहरण दिखाते हैं कि अधिकारों के बिना व्यक्ति की गरिमा की रक्षा संभव नहीं। भारत में न्यायपालिका अधिकारों की रक्षक है और समय-समय पर नए अधिकारों (सूचना, शिक्षा) को मान्यता दी जाती रही है। अधिकारों के साथ कर्तव्यों का पालन भी आवश्यक है। एक जागरूक नागरिक ही अपने अधिकारों का सही उपयोग कर सकता है और लोकतंत्र को मजबूत बना सकता है। यह अध्याय नागरिक शास्त्र के पूरे पाठ्यक्रम का सार है।