नात्सीवाद (Nazism) 20वीं शताब्दी के सबसे विनाशकारी राजनीतिक आंदोलनों में से एक था। प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) में जर्मनी की पराजय के बाद उत्पन्न आर्थिक और राजनीतिक संकटों ने जर्मनी की जनता को हताश कर दिया। इसी हताशा के बीच एडॉल्फ हिटलर के नेतृत्व में नात्सी दल (Nazi Party) का उदय हुआ। हिटलर ने अपनी भड़काऊ भाषणों और प्रचार के माध्यम से जर्मन जनता को यह विश्वास दिलाया कि वह जर्मनी की पराजय, अपमान और आर्थिक विपत्ति का समाधान कर सकता है। 1933 में हिटलर के चांसलर बनने के साथ ही जर्मनी में लोकतंत्र का पतन शुरू हो गया और नात्सी तानाशाही की स्थापना हुई। इस अध्याय में हम वायमर गणराज्य की विफलता, हिटलर के उदय, नात्सी अत्याचार, यहूदियों के नरसंहार (होलोकॉस्ट) तथा प्रचार के माध्यम से विचारधारा फैलाने की रणनीतियों का अध्ययन करेंगे।
प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी और उसके सहयोगी देशों की पराजय हुई। युद्ध में हार के कारण जर्मनी के सम्राट (Kaiser) को त्यागपत्र देना पड़ा। नवंबर 1918 में जर्मनी में गणतंत्र की घोषणा हुई और 1919 में वायमर गणराज्य (Weimar Republic) की स्थापना की गई, जिसका नाम उस शहर के नाम पर रखा गया जहां इसका संविधान बना। वायमर गणराज्य की स्थापना एक लोकतांत्रिक संविधान के साथ हुई, जिसमें प्रतिनिधित्वपूर्ण सभा तथा राष्ट्रपति का प्रावधान था।
वायमर गणराज्य कई कमजोरियों से ग्रस्त था। सबसे पहले, समानुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था के कारण कोई भी एक दल स्पष्ट बहुमत नहीं पा सका और अस्थिर गठबंधन सरकारें बनती रहीं। दूसरे, संविधान के अनुच्छेद 48 के अनुसार राष्ट्रपति को आपातकाल की घोषणा करके संसद की शक्तियों को दरकिनार करने का अधिकार था, जिससे लोकतंत्र कमजोर हुआ। तीसरे, जर्मन जनता ने वायमर गणराज्य को पराजय का प्रतीक माना, क्योंकि इसकी स्थापना युद्ध की हार के बाद हुई थी। अनेक लोगों का मानना था कि जर्मनी ने वास्तव में युद्ध नहीं हारा था, बल्कि उसे 'पीठ में छुरा घोंपा' गया।
युद्ध समाप्त होने के बाद विजयी राष्ट्रों ने 1919 में वर्साय की संधि लागू की, जिसने जर्मनी पर अत्यंत कठोर शर्तें थोपीं। इस संधि के अनुसार जर्मनी को अपने अनेक क्षेत्र खोने पड़े, उसकी सेना को घटाकर एक लाख सैनिकों तक सीमित कर दिया गया, उसे हथियारों का निर्माण करने की मनाही हुई और युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। जर्मनी पर भारी क्षतिपूर्ति (Reparations) भी थोपी गई। इस संधि को जर्मन जनता ने अपमानजनक माना और इसे 'धिक्कार-संधि' (Diktat) का नाम दिया। इसी जन-आक्रोश पर हिटलर ने बाद में अपना राजनीतिक कैरियर बनाया।
वायमर गणराज्य को कई आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ा। 1923 में जर्मनी क्षतिपूर्ति का भुगतान नहीं कर पाया, जिसके परिणामस्वरूप फ्रांस ने जर्मनी के औद्योगिक क्षेत्र रूर को अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद जर्मन सरकार ने नोट छापकर क्षतिपूर्ति का भुगतान करने का प्रयास किया, जिसके कारण देश में अतिमुद्रास्फीति (Hyperinflation) फैल गई। मुद्रा का मूल्य इतना गिर गया कि लोगों को रोटी खरीदने के लिए ठेलागाड़ी भर कर नोट ले जाने पड़ते थे। मध्य वर्ग की बचतें पूरी तरह समाप्त हो गईं।
इस संकट से उबरने के लिए अमेरिकी बैंकों से ऋण मिला, लेकिन 1929 में महान आर्थिक अवसाद (Great Depression) के कारण अमेरिकी बैंकों ने ऋण वापस मांग लिया। जर्मनी में फिर से आर्थिक तबाही फैल गई। कारखाने बंद हो गए, लाखों लोग बेरोजगार हो गए और किसानों तथा मध्य वर्ग की आय ध्वस्त हो गई। इस अवसर का लाभ उठाकर हिटलर और नात्सी दल ने अपना प्रचार तेज किया।
एडॉल्फ हिटलर का जन्म 1889 में ऑस्ट्रिया में हुआ था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उसने जर्मन सेना में सेवा की। युद्ध के बाद वह जर्मनी की गुप्त सेवा (सेना के एक विभाग) में काम करने लगा। 1919 में उसे जर्मन वर्कर्स पार्टी (DAP) की बैठक में भाग लेने का कार्य दिया गया। इसी दल का नाम बदलकर बाद में नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी (Nazi Party) रखा गया। हिटलर जल्द ही इस दल का प्रमुख बन गया।
हिटलर ने अपनी विचारधारा 'माइन कैम्फ' (Mein Kampf) नामक पुस्तक में प्रस्तुत की। उसके मुख्य विचार थे: आर्यन नस्ल की श्रेष्ठता, यहूदियों के प्रति घृणा, जर्मनी की सैन्य शक्ति का पुनर्निर्माण, क्षेत्रीय विस्तार (लीबेन्सराम/रहने की जगह) की मांग तथा नात्सी दल का अत्यंत कट्टर राष्ट्रवाद। हिटलर यहूदियों को जर्मनी की समस्याओं का मुख्य कारण मानता था और उसने उन्हें 'निकृष्ट' बताया। उसका मानना था कि नस्लों का उन्मूलन और शुद्ध आर्यन नस्ल की स्थापना ही जर्मनी की महानता का मार्ग है।
हिटलर ने नात्सी दल को एक शक्तिशाली संगठन बनाया। उसके अर्धसैनिक संगठन स्टॉर्म ट्रूपर्स (SA/ब्राउनशर्ट) और शूट्ज़स्टाफ़ेल (SS/हिमलर के नेतृत्व में) का गठन किया गया। गेस्टापो नामक गुप्त पुलिस का निर्माण किया गया। प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबल्स के नेतृत्व में नात्सी दल ने रेडियो, फिल्मों, अखबारों, रैलियों और विशाल प्रचार अभियानों से जनता को प्रभावित किया। 1923 में हिटलर ने म्यूनिख में बीयर हॉल विद्रोह (Beer Hall Putsch) का प्रयास किया, जो विफल रहा और उसे जेल भेज दिया गया। जेल में ही उसने 'माइन कैम्फ' लिखी।
1932 के चुनावों में नात्सी दल को सबसे अधिक सीटें मिलीं। इसके बाद जनवरी 1933 में जर्मनी के राष्ट्रपति हिंडनबर्ग ने हिटलर को चांसलर नियुक्त कर दिया। चांसलर बनने के तुरंत बाद हिटलर ने लोकतंत्र को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। फरवरी 1933 में जर्मन संसद (राइखस्टाग) भवन में आग लग गई। हिटलर ने इसका आरोप कम्युनिस्टों पर लगाया और आपातकाल की घोषणा कर दी। इसके बाद मार्च 1933 में सक्षमता अधिनियम (Enabling Act) पारित किया गया, जिसने हिटलर को चार वर्ष के लिए विशेष अधिकार दिए और संसद की शक्ति समाप्त कर दी। इस प्रकार जर्मनी में लोकतंत्र का अंत हो गया और एकदलीय नात्सी शासन स्थापित हो गया।
सत्ता में आने के बाद नात्सियों ने सभी विपक्षी दलों, ट्रेड यूनियनों और कम्युनिस्ट दल को समाप्त कर दिया। हिटलर ने अपने राजनीतिक विरोधियों को 'नाइट ऑफ द लॉन्ग नाइव्स' (1934) नामक घटना में मरवा दिया। सभी पत्र-पत्रिकाओं और प्रचार माध्यमों पर नात्सी दल का नियंत्रण स्थापित कर दिया गया।
1935 में नूर्नबर्ग नस्ली कानून पारित किए गए, जिनके अनुसार यहूदियों से जर्मन नागरिकता छीन ली गई और उन्हें जर्मनों से विवाह करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। नवंबर 1938 में क्रिस्टलनाख्ट (कांच की रात) नामक घटना में नात्सियों ने यहूदियों के घरों, दुकानों और आराधनालयों पर हमला किया। इसके बाद यहूदियों को बंदी बनाकर एकाग्रता शिविरों (Concentration Camps) में भेजा गया, जहां उन्हें कठोर श्रम कराया गया और अनेक को मार दिया गया। इस योजनाबद्ध सामूहिक हत्या को होलोकॉस्ट (Holocaust) कहते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध तक लाखों यहूदियों के साथ-साथ जिप्सियों, विकलांग व्यक्तियों और राजनीतिक विरोधियों को मार दिया गया।
नात्सियों ने स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव किया, इतिहास को नात्सी विचारधारा के अनुसार लिखवाया और बच्चों को यहूदियों से घृणा करना सिखाया। जर्मन युवाओं को नात्सी युवा संगठनों (जैसे हिटलर यूथ) में शामिल किया गया। महिलाओं की भूमिका को घर और परिवार तक सीमित किया गया। नात्सी ने 'एक राष्ट्र, एक साम्राज्य, एक नेता' का नारा दिया और जर्मन समाज को पूरी तरह नियंत्रण में ले लिया।
हिटलर ने वर्साय की संधि की शर्तों का उल्लंघन करते हुए जर्मनी की सेना का विस्तार किया और सैन्य क्षेत्रों पर दोबारा अधिकार जमाया। 1938 में उसने ऑस्ट्रिया को जर्मनी में मिला लिया (एनश्लस) और चेकोस्लोवाकिया के सुडेटेनलैंड क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। पश्चिमी देशों (ब्रिटेन, फ्रांस) की तुष्टीकरण (Appeasement) की नीति ने हिटलर को और आक्रामक बना दिया। 1 सितंबर 1939 को हिटलर ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया। युद्ध के दौरान नात्सियों ने अनेक देशों पर कब्जा किया और सामूहिक नरसंहार किए। अंततः 1945 में जर्मनी की पराजय हुई और 30 अप्रैल 1945 को हिटलर ने आत्महत्या कर ली। मई 1945 में जर्मनी ने आत्मसमर्पण कर दिया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945-46 में विजयी राष्ट्रों ने नूर्नबर्ग न्यायिक कार्यवाही (Nuremberg Trials) आयोजित की, जिसमें नात्सी नेताओं पर मानवता के विरुद्ध अपराधों का मुकदमा चलाया गया। इस कार्यवाही ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि अपराध के आदेश का पालन करना भी अपराध हो सकता है और युद्ध अपराधों तथा मानवता के विरुद्ध अपराधों के लिए व्यक्तियों को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। जर्मनी को युद्ध के बाद दो भागों में बांट दिया गया - पश्चिमी जर्मनी और पूर्वी जर्मनी। नात्सीवाद के खिलाफ विश्व में घृणा फैली और लोकतंत्र, मानवाधिकारों और सहनशीलता के मूल्यों पर नए सिरे से विचार किया गया।
| वर्ष/तिथि | घटना |
|---|---|
| 1918 | प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की पराजय |
| 1919 | वायमर गणराज्य की स्थापना, वर्साय की संधि |
| 1923 | अतिमुद्रास्फीति, बीयर हॉल विद्रोह |
| 1929 | महान आर्थिक अवसाद |
| 1933 | हिटलर का चांसलर बनना, सक्षमता अधिनियम |
| 1934 | नाइट ऑफ द लॉन्ग नाइव्स |
| 1935 | नूर्नबर्ग नस्ली कानून |
| 1938 | एनश्लस, क्रिस्टलनाख्ट |
| 1 सितंबर 1939 | पोलैंड पर आक्रमण, द्वितीय विश्व युद्ध |
| 30 अप्रैल 1945 | हिटलर की आत्महत्या |
| 1945-46 | नूर्नबर्ग न्यायिक कार्यवाही |
| कमजोरी | विवरण |
|---|---|
| समानुपातिक प्रतिनिधित्व | कोई दल स्पष्ट बहुमत नहीं जीत पाता, अस्थिर सरकारें |
| अनुच्छेद 48 | राष्ट्रपति आपातकाल में संसद की शक्ति समाप्त कर सकता था |
| वर्साय की संधि | कठोर शर्तों ने जनता में अपमान की भावना पैदा की |
| आर्थिक संकट | 1923 की अतिमुद्रास्फीति और 1929 का अवसाद |
| जनता का अविश्वास | वायमर को पराजय का प्रतीक माना गया |
| संगठन | कार्य |
|---|---|
| SA (स्टॉर्म ट्रूपर्स) | अर्धसैनिक दल, राजनीतिक विरोधियों को दबाना |
| SS (शूट्ज़स्टाफ़ेल) | हिमलर का शक्तिशाली दस्ता, यहूदियों का उत्पीड़न |
| गेस्टापो | गुप्त राज्य पुलिस |
| हिटलर यूथ | युवाओं का नात्सीकरण |
नात्सीवाद और हिटलर का उदय इस बात का दुखद उदाहरण है कि आर्थिक संकट, राष्ट्रीय अपमान और राजनीतिक अस्थिरता किस प्रकार किसी देश को तानाशाही की ओर धकेल सकती है। वायमर गणराज्य की कमजोरियाँ, वर्साय की संधि का अपमान और महान आर्थिक अवसाद ने मिलकर हिटलर को सत्ता का मार्ग प्रशस्त किया। नात्सी शासन ने लोकतंत्र को नष्ट कर दिया, मानवाधिकारों को कुचला और होलोकॉस्ट जैसा भयानक नरसंहार किया। द्वितीय विश्व युद्ध और नूर्नबर्ग न्यायिक कार्यवाही ने विश्व को यह सिखाया कि नस्लवाद, असहिष्णुता और निरंकुशता कितनी घातक हो सकती है। इस अध्याय से विद्यार्थियों को यह शिक्षा मिलती है कि लोकतंत्र की रक्षा करना और सहिष्णुता, समानता तथा मानवीय गरिमा के मूल्यों को बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।