प्राकृतिक वनस्पति (Natural Vegetation) वह वनस्पति है जो मनुष्य के हस्तक्षेप के बिना प्राकृतिक रूप से उगती है। भारत अपनी विविध जलवायु, भू-आकृति और मिट्टी के कारण प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन के मामले में विश्व के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। भारत में पाए जाने वाले वनस्पति और वन्य जीवन की विविधता देश की जैव विविधता (Biodiversity) कहलाती है। भारत में वनस्पति के वितरण को नियंत्रित करने वाले मुख्य कारक हैं: भूमि, मिट्टी, तापमान, प्रकाश की अवधि (फोटोपीरियड) और वर्षण। इन्हीं कारकों के आधार पर भारत की वनस्पति को कई प्रकारों में विभाजित किया गया है। इस अध्याय में हम वनों के प्रकार, वन्य जीवन, वनों की कटाई के कारण और संरक्षण के उपायों का अध्ययन करेंगे।
भूमि की प्रकृति वनस्पति को प्रभावित करती है। उपजाऊ मिट्टी वाले मैदानों में खेती अधिक होती है, जबकि पहाड़ी ढलानों पर अलग प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। मरुस्थलीय मिट्टी में कंटीली वनस्पति तथा जलोढ़ मिट्टी के मैदानों में घनी वनस्पति उगती है।
तापमान वनस्पति के विकास को प्रभावित करता है। हिमालय जैसे ठंडे क्षेत्रों में शीतोष्ण वनस्पति तथा गर्म मैदानों में उष्ण कटिबंधीय वनस्पति पाई जाती है। तापमान में वृद्धि के साथ-साथ पहाड़ों पर ऊंचाई बढ़ने पर वनस्पति का प्रकार बदलता जाता है।
पौधों की वृद्धि और विकास के लिए सूर्य का प्रकाश अनिवार्य है। दिन की लंबाई अर्थात फोटोपीरियड पौधों की फूलने-फलने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।
वर्षा की मात्रा वनस्पति के प्रकार को सबसे अधिक निर्धारित करती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सघन वन, मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में पर्णपाती वन तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कंटीली वनस्पति पाई जाती है।
भारत की वनस्पति को मुख्यतः निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किया जाता है:
ये वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहां वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है। इन वनों के पेड़ कभी अपने पत्ते नहीं गिराते, इसलिए इन्हें सदाबहार वन कहते हैं। ये वन पश्चिमी घाट, उत्तर-पूर्वी भारत और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के ऊंचे क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इन वनों में आबनूस (Ebony), महोगनी (Mahogany) और शीशम (Rosewood) जैसे महत्वपूर्ण वृक्ष पाए जाते हैं। ये वन अत्यंत सघन होते हैं और इनकी लकड़ी बहुत मूल्यवान होती है।
ये भारत के सबसे व्यापक (विस्तृत) वन हैं, जो देश के लगभग 65 प्रतिशत वन क्षेत्र में फैले हैं। इन्हें 'मानसूनी वन' भी कहा जाता है। इन वनों में शुष्क मौसम में पेड़ अपने पत्ते गिरा देते हैं। इन्हें दो भागों में बांटा जाता है:
पर्णपाती वन उत्तरी मैदान, मध्य भारत, पश्चिमी घाट के पूर्वी ढाल और दक्कन के अधिकांश भाग में पाए जाते हैं।
ये वन ऐसे क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहां वर्षा 70 सेंटीमीटर से कम होती है। ये मुख्यतः राजस्थान, गुजरात और दक्कन के शुष्क भागों में पाए जाते हैं। इन वनों में किकर, बबूल (Acacia), खैर, बेर जैसे कांटेदार पेड़ और झाड़ियां पाई जाती हैं। ये पेड़ रसीले तने वाले और कांटों वाले होते हैं, जो शुष्क जलवायु में जीवित रहने के लिए अनुकूलित हैं।
ये वन हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में ऊंचाई के अनुसार बदलते हैं। लगभग 1,000 से 2,000 मीटर की ऊंचाई पर आर्द्र समशीतोष्ण वन पाए जाते हैं, जिनमें ओक, चेस्टनट जैसे पेड़ हैं। इससे ऊपर शुष्क समशीतोष्ण वन (डियोडार, चिलगोजा, ओक, सिल्वर फर) और अल्पाइन वनस्पति (जूनिपर, बर्च) पाई जाती है। उच्च ऊंचाई पर घास के मैदान (जैसे बुग्याल) मिलते हैं।
ये वन तटीय क्षेत्रों में जहां ज्वार-भाटा आता है, वहां पाए जाते हैं। सुंदरबन (गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा) विश्व के सबसे बड़े मैंग्रोव वनों में से है। इनमें सुंदरी वृक्ष प्रमुख है। यहां रॉयल बंगाल टाइगर (शाही बंगाल बाघ) पाया जाता है। मैंग्रोव वन तटों को कटाव से बचाते हैं और समुद्री जीवों का घर होते हैं।
भारत का वन्य जीवन अत्यंत समृद्ध है। भारत में विश्व के बाघों, हाथियों, गैंडों और बड़ी संख्या में अन्य स्तनधारी, पक्षी, सरीसृप और जलचर प्राणी पाए जाते हैं। भारत के प्रसिद्ध वन्य जीवों में बंगाल टाइगर, एशियाई शेर (गुजरात के गिर वन), एशियाई हाथी, एक सींग वाला गैंडा (असम के काजीरंगा), नीलगाय, बारहसिंघा, भारतीय गौर, तेंदुआ, बंदर, मोर (राष्ट्रीय पक्षी), हिमालयी काले भालू, हिम तेंदुआ, स्नोकॉक आदि शामिल हैं। वन्य जीवन पारिस्थितिकी संतुलन और खाद्य श्रृंखला का आवश्यक अंग है।
भारत में वनों की कटाई के मुख्य कारण हैं: खेती के लिए वन भूमि का विस्तार, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण, सड़कों और बांधों का निर्माण, बढ़ती जनसंख्या के लिए चराई, जलावन और लकड़ी की मांग, तथा खनन गतिविधियां। वनों की कटाई से मिट्टी का क्षरण, बाढ़, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि और वन्य जीवों के आवासों का विनाश होता है।
भारत सरकार और राज्य सरकारों ने वनस्पति और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए अनेक कदम उठाए हैं। भारतीय वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत राष्ट्रीय उद्यानों और वन्य जीव अभयारण्यों की स्थापना की गई। प्रोजेक्ट टाइगर (1973) शुरू किया गया, जिससे बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है। भारत में आज 100 से अधिक राष्ट्रीय उद्यान, 500 से अधिक वन्य जीव अभयारण्य और 18 से अधिक जैव मंडल आरक्षित क्षेत्र हैं। सुंदरबन, काजीरंगा, कॉर्बेट, गिर, कान्हा, बांधवगढ़ आदि प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान हैं। वन संरक्षण के लिए जैव विविधता अधिनियम (2002) भी लागू किया गया है। सामुदायिक भागीदारी, वृक्षारोपण और जन-जागरूकता ही संरक्षण का स्थायी मार्ग है।
| वन का प्रकार | वर्षा | प्रमुख वृक्ष | क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| सदाबहार वन | 200 सेमी से अधिक | आबनूस, महोगनी, शीशम | पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर |
| पर्णपाती वन | 70-200 सेमी | साल, सागौन, चंदन, नीम | मध्य भारत, दक्कन |
| कंटीले वन | 70 सेमी से कम | किकर, बबूल, खैर | राजस्थान, गुजरात |
| पर्वतीय वन | ऊंचाई पर निर्भर | ओक, डियोडार, बर्च | हिमालय |
| मैंग्रोव वन | तटीय ज्वारीय क्षेत्र | सुंदरी | सुंदरबन |
| जीव | स्थान/विशेषता |
|---|---|
| शाही बंगाल बाघ | सुंदरबन |
| एशियाई शेर | गुजरात का गिर वन |
| एक सींग वाला गैंडा | असम का काजीरंगा |
| एशियाई हाथी | केरल, कर्नाटक, पूर्वोत्तर |
| मोर | राष्ट्रीय पक्षी |
| हिम तेंदुआ | हिमालय |
| उपाय | वर्ष |
|---|---|
| भारतीय वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम | 1972 |
| प्रोजेक्ट टाइगर | 1973 |
| जैव विविधता अधिनियम | 2002 |
भारत की प्राकृतिक वनस्पति और वन्य जीवन देश की अमूल्य संपदा है। वर्षा, मिट्टी, तापमान और भू-आकृति के आधार पर भारत में सदाबहार, पर्णपाती, कंटीले, पर्वतीय और मैंग्रोव वन पाए जाते हैं। ये वन वन्य जीवन का आवास और पारिस्थितिकी संतुलन का आधार हैं। लेकिन वनों की कटाई, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने जैव विविधता को गंभीर खतरे में डाल दिया है। वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम, प्रोजेक्ट टाइगर और राष्ट्रीय उद्यानों के माध्यम से भारत ने संरक्षण के महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग और जन-जागरूकता के बिना यह विरासत सुरक्षित नहीं रह सकती। इस अध्याय से विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझ आता है।