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1. परिचय

फ्रांसीसी क्रांति के बाद यूरोप में स्वतंत्रता, समानता और न्याय के विचारों ने नई दिशा ली। 19वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप श्रमिकों और किसानों के जीवन में गंभीर परिवर्तन हुए। इसी पृष्ठभूमि में समाजवाद (Socialism) के विचारों का विकास हुआ, जिसने धन के समान वितरण और सामाजिक न्याय की मांग की। यूरोप में समाजवादी विचारकों, राजनीतिक दलों और श्रमिक संगठनों ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। सबसे बड़ा परिवर्तन 1917 में रूस में हुआ, जहां ज़ार (सम्राट) की निरंकुश व्यवस्था के विरुद्ध बोल्शेविक क्रांति के रूप में विश्व की पहली समाजवादी व्यवस्था स्थापित हुई। इस अध्याय में हम समाजवाद के उदय, रूसी समाज की संरचना, 1905 की क्रांति, फरवरी 1917 की क्रांति और अक्टूबर 1917 की महान समाजवादी क्रांति का अध्ययन करेंगे।

2. यूरोप में राजनीतिक धाराएँ

19वीं शताब्दी के यूरोप में तीन मुख्य राजनीतिक धाराएँ विकसित हुईं। उदारवाद (Liberalism) स्वतंत्रता और बाजार अर्थव्यवस्था का समर्थक था। उदारवादियों के अनुसार, सभी लोगों को मतदान का अधिकार, स्वतंत्र भाषण और प्रेस की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, परंतु उन्होंने जनता को सत्ता में सीमित भूमिका देना चाहा। कट्टरवाद/रेडिकलिज्म (Radicalism) ने यह मांग की कि सरकार जनता के लिए हो, मताधिकार सम्पन्न वर्ग तक सीमित नहीं होना चाहिए। रेडिकलों का मानना था कि जिनके पास संपत्ति नहीं है, उन्हें भी मत देने का अधिकार मिलना चाहिए। रूढ़िवाद (Conservatism) इन दोनों से भिन्न था। रूढ़िवादी परिवर्तन का विरोध करते थे और वे राजा, रानी तथा चर्च की शक्ति को बनाए रखना चाहते थे, हालांकि उन्होंने कुछ लोगों को संगठित परिवर्तन स्वीकार करना भी उचित माना।

3. समाजवाद का उदय और विचारक

औद्योगिक क्रांति ने कुछ लोगों को अत्यधिक धनी और अधिकांश श्रमिकों को अत्यंत गरीब बना दिया। श्रमिकों को लंबे घंटे काम करना पड़ता था, मजदूरी कम थी और उनके पास कोई सुरक्षा नहीं थी। इस असमानता के विरुद्ध समाजवाद के विचार उभरे, जिसके अनुसार समाज के संसाधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व के बजाय सामूहिक अथवा सरकारी स्वामित्व होना चाहिए, ताकि संपत्ति का समान वितरण हो सके।

लुई ब्लां (फ्रांस)

लुई ब्लां ने यह सुझाव दिया कि श्रमिकों को अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए स्वयं संगठित होना चाहिए। उन्होंने सहकारी समितियों (Cooperatives) का विचार प्रस्तुत किया, जो बाजार के स्थान पर सामूहिक आधार पर संगठित हों। उनकी सरकारें श्रमिकों को सहकारी समितियाँ बनाने में मदद कर सकती थीं। वे श्रमिकों और पूंजीपतियों के बीच शांतिपूर्ण सहयोग में विश्वास रखते थे।

रॉबर्ट ओवन (ब्रिटेन)

रॉबर्ट ओवन एक उद्यमी थे, जिन्होंने स्कॉटलैंड में एक सहकारी समुदाय की स्थापना की। उनका लक्ष्य एक ऐसा समाज बनाना था जिसमें समुदाय के सभी सदस्य एक साथ मिलकर काम करें और संसाधनों का उपयोग सामूहिक रूप से हो। वे श्रमिकों के जीवन-स्तर को सुधारने के पक्षधर थे।

कार्ल मार्क्स (जर्मनी) और फ्रेडरिक एंगेल्स

कार्ल मार्क्स सबसे प्रभावशाली समाजवादी विचारक थे। उन्होंने वैज्ञानिक समाजवाद का सिद्धांत दिया। मार्क्स के अनुसार, समाज दो वर्गों में विभाजित है: पूँजीपति (Bourgeoisie), जिनके पास कारखाने, जमीन और मशीनें हैं, तथा मजदूर/श्रमिक वर्ग (Proletariat), जो केवल अपनी मजदूरी पर जीवन-यापन करते हैं। मार्क्स ने 1848 में एंगेल्स के साथ मिलकर कम्युनिस्ट घोषणापत्र (Communist Manifesto) लिखा। उन्होंने कहा कि वर्ग-संघर्ष ही इतिहास की गति निर्धारित करता है और अंततः मजदूरों की क्रांति से पूँजीवादी व्यवस्था ध्वस्त होगी। मार्क्स के अनुसार, अंततः वर्गहीन समाज और साम्यवाद (Communism) की स्थापना होगी।

श्रमिक संगठन और अंतर्राष्ट्रीय समाजवाद

19वीं शताब्दी के अंत में यूरोप में श्रमिक दल बनने लगे। जर्मनी में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी सबसे बड़ा श्रमिक दल बना। विभिन्न देशों के समाजवादियों को एक मंच पर लाने के लिए 1889 में द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय (Second International) की स्थापना की गई, जिसमें श्रमिक दलों के प्रतिनिधियों ने एक साथ काम करने का निर्णय लिया। अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस (1 मई) मनाने का निर्णय भी इसी संगठन से जुड़ा है।

4. रूसी समाज: 1914 से पहले की स्थिति

रूस 1914 में एक विशाल साम्राज्य था, जिसमें कई जातीय समूह, भाषाएँ और धर्म निवास करते थे। इसका शासन ज़ार (सम्राट) के हाथों में था और उसका शासन निरंकुश (Autocratic) था, अर्थात ज़ार की इच्छा ही सर्वोपरि थी। 1914 में ज़ार निकोलस द्वितीय था। रूसी साम्राज्य में अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती थी और मुख्यतः किसान थे। किसान सामूहिक रूप से भूमि पर काम करते थे। उद्योग धीरे-धीरे विकसित हो रहा था। सेंट पीटर्सबर्ग और मॉस्को जैसे नगरों में कारखाने बन रहे थे और उनमें मजदूरों की संख्या बढ़ रही थी। श्रमिकों की स्थिति अत्यंत कठिन थी - काम के घंटे अधिक, मजदूरी कम और जीवन-स्तर निम्न था। अधिकांश कारखानों में काम के घंटों और कार्य-स्थितियों पर कोई कानूनी नियंत्रण नहीं था।

रूस में समाजवादी दल

1900 के दशक की शुरुआत में रूस में विभिन्न समाजवादी दल बने। रूसी सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी (RSDWP) 1898 में गठित हुई। मार्क्सवादी विचारों पर आधारित इस दल में कुछ मुद्दों पर मतभेद हुए। व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व वाला समूह यह मानता था कि दल को छोटे और कड़े अनुशासन वाला होना चाहिए तथा क्रांति में श्रमिकों का नेतृत्व करना चाहिए। इस समूह को बोल्शेविक (बहुमत) कहा गया। विपरीत समूह मेंशेविक (अल्पमत) मानता था कि दल को व्यापक जनाधार वाला होना चाहिए। बोल्शेविकों का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ता गया और लेनिन ने श्रमिकों तथा सैनिकों के बीच अपने विचार फैलाए।

5. 1905 की क्रांति

रूस में क्रांतिकारी स्थिति 1905 में पहली बार स्पष्ट रूप से प्रकट हुई। इस समय रूस जापान के साथ युद्ध में हार का सामना कर रहा था, जिससे देश में असंतोष बढ़ा। जनवरी 1905 में सेंट पीटर्सबर्ग के कारखानों के मजदूरों ने हड़ताल की। पादरी गैपॉन के नेतृत्व में हजारों श्रमिक शांतिपूर्वक ज़ार के महल (विंटर पैलेस) की ओर एक प्रार्थना-पत्र लेकर गए, जिसमें काम के घंटों में कमी, मजदूरी में वृद्धि और निर्वाचित सरकार की मांग की गई थी। ज़ार की सेना ने उन प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं, जिसे खूनी रविवार (Bloody Sunday) कहा जाता है। इस घटना ने पूरे देश में आक्रोश फैला दिया। विरोध के कारण ज़ार को ड्यूमा (निर्वाचित विधानसभा) बनाने के लिए बाध्य होना पड़ा, लेकिन जल्द ही उसने ड्यूमा को भंग कर दिया और अपनी निरंकुश शक्ति बरकरार रखी। 1905 की क्रांति विफल रही, लेकिन उसने बोल्शेविकों को यह सिखाया कि शांतिपूर्ण मांगों से ज़ार नहीं झुकेगा।

6. प्रथम विश्व युद्ध और फरवरी 1917 की क्रांति

1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ और रूस जर्मनी के विरुद्ध मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़ा। युद्ध में रूस को भारी नुकसान हुआ। लाखों सैनिक मारे गए, अर्थव्यवस्था चरमरा गई, रेलवे व्यवस्था टूट गई और शहरों में खाद्यान्न की कमी हो गई। मजदूरों और किसानों का असंतोष चरम पर पहुंच गया। फरवरी 1917 में पेत्रोग्राद (सेंट पीटर्सबर्ग) में रोटी की कमी के कारण महिलाओं सहित हज़ारों मजदूर सड़कों पर उतर आए। सेना के सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया। परिणामस्वरूप ज़ार निकोलस द्वितीय को मार्च 1917 में गद्दी छोड़नी पड़ी। इस घटना को फरवरी 1917 की क्रांति कहा जाता है।

ज़ार के पतन के बाद रूस में एक अंतरिम (प्रोविज़नल) सरकार बनी, जिसका नेतृत्व प्रारंभ में राजकुमार ल्वोव और बाद में केरेन्स्की ने किया। इस सरकार ने आम चुनावों का वादा किया, लेकिन युद्ध जारी रखा। समानांतर रूप से श्रमिकों, सैनिकों और किसानों के प्रतिनिधियों की सोवियत (Soviets) नामक परिषदें बनीं, जो प्रोविज़नल सरकार के अधिकार को चुनौती दे रही थीं। अप्रैल 1917 में लेनिन निर्वासन से रूस लौटे और उन्होंने अप्रैल थीसिस प्रस्तुत की, जिसमें सत्ता सोवियतों को सौंपने, भूमि का राष्ट्रीयकरण और युद्ध तुरंत समाप्त करने की मांग की गई।

7. अक्टूबर 1917 की महान समाजवादी क्रांति

सितंबर 1917 में बोल्शेविकों ने पेत्रोग्राद की सोवियत में बहुमत प्राप्त कर लिया। लेनिन ने सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाई। 24-25 अक्टूबर 1917 (नवंबर 1917 नई तिथि के अनुसार) को बोल्शेविकों ने पेत्रोग्राद के प्रमुख सरकारी भवनों पर कब्जा कर लिया। अक्टूबर क्रांति में रेड गार्ड (बोल्शेविक समर्थक श्रमिक-सैनिक) सैनिकों के सहयोग से विंटर पैलेस पर कब्जा किया और प्रोविज़नल सरकार को सत्ता से हटा दिया। बोल्शेविकों ने सत्ता संभाली और पहला समाजवादी सरकारी ढांचा बनाया।

बोल्शेविक सरकार के प्रमुख कदम

नई सोवियत सरकार ने तुरंत महत्वपूर्ण कदम उठाए। डिक्री ऑन पीस जारी किया, जिसमें युद्ध तुरंत समाप्त करने की घोषणा की गई। डिक्री ऑन लैंड के द्वारा भूमि का राष्ट्रीयकरण कर उसे किसानों में बांट दिया गया। बैंकों और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया गया। सभी राष्ट्रीयताओं को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया गया। रूस ने जर्मनी के साथ ब्रेस्ट-लिटोव्स्क की संधि (1918) करके युद्ध से बाहर निकल गया। सोवियत सरकार ने काम के घंटे घटाकर आठ घंटे करने, महिला श्रमिकों को समान वेतन देने तथा साक्षरता फैलाने के कदम उठाए।

रूसी गृह युद्ध

क्रांति के बाद रूस में गृह युद्ध (1918-1920) छिड़ गया। ज़ार के समर्थकों का समूह श्वेत सेना और बोल्शेविकों की लाल सेना आपस में लड़ीं। गृह युद्ध के दौरान बोल्शेविकों ने कड़ा नियंत्रण लागू किया और चेका (गुप्त पुलिस) की स्थापना की। 1922 में रूस सहित कई गणराज्यों को मिलाकर सोवियत संघ (USSR) का गठन किया गया। लेनिन की मृत्यु (1924) के बाद स्टालिन ने नेतृत्व संभाला और सामूहिक खेती (कोलखोज़) तथा औद्योगीकरण के कठोर कार्यक्रम शुरू किए।

8. रूसी क्रांति का वैश्विक प्रभाव

रूसी क्रांति ने पूरे विश्व में गहरा प्रभाव डाला। इसने साबित किया कि श्रमिक वर्ग और किसान संगठित प्रयास से सत्ता प्राप्त कर सकते हैं। क्रांति के विचारों ने विश्व के कई देशों में कम्युनिस्ट दलों के गठन को प्रेरित किया। भारत जैसे उपनिवेशों में भी रूसी क्रांति ने राष्ट्रवादियों को प्रभावित किया; भारतीय कम्युनिस्ट दल और समाजवादी आंदोलनों ने इससे प्रेरणा ली। सोवियत संघ का उदय विश्व में द्विध्रुवीय व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। हालांकि बाद में सोवियत संघ का साम्यवादी प्रयोग आलोचना का विषय भी बना, फिर भी रूसी क्रांति ने विश्व इतिहास में समाजवाद के लिए एक नई संभावना खोली।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: समाजवादी विचारक और उनके योगदान

विचारक देश मुख्य विचार/योगदान
लुई ब्लां फ्रांस सहकारी समितियों (Cooperatives) का विचार
रॉबर्ट ओवन ब्रिटेन सहकारी समुदाय की स्थापना
कार्ल मार्क्स जर्मनी वैज्ञानिक समाजवाद, कम्युनिस्ट घोषणापत्र
फ्रेडरिक एंगेल्स जर्मनी मार्क्स के साथ घोषणापत्र का सह-लेखक
व्लादिमीर लेनिन रूस बोल्शेविक दल का नेता

तालिका 2: रूसी क्रांति की प्रमुख घटनाएँ

वर्ष/तिथि घटना परिणाम
1898 RSDWP का गठन समाजवादी दलों की शुरुआत
जनवरी 1905 खूनी रविवार ज़ार विरोध में आक्रोश
1905 1905 की क्रांति ड्यूमा का गठन, पर बाद में भंग
1914 प्रथम विश्व युद्ध रूस को भारी क्षति
फरवरी 1917 फरवरी क्रांति ज़ार का पतन, अंतरिम सरकार
अप्रैल 1917 लेनिन का आगमन, अप्रैल थीसिस सत्ता सोवियतों को
अक्टूबर 1917 अक्टूबर क्रांति बोल्शेविकों ने सत्ता संभाली
1918 ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि रूस युद्ध से बाहर
1918-20 रूसी गृह युद्ध लाल सेना की विजय
1922 सोवियत संघ (USSR) का गठन समाजवादी संघीय राज्य

तालिका 3: बोल्शेविक और मेंशेविक की तुलना

मुद्दा बोल्शेविक मेंशेविक
नेता लेनिन मार्तोव
दल का आकार छोटा, कड़ा अनुशासित व्यापक जनाधार
क्रांति का तरीका श्रमिकों का नेतृत्व, सशस्त्र विद्रोह व्यापक सुधार, सहयोग
अर्थ बहुमत अल्पमत

माइंड मैप

graph TD A["समाजवाद एवं रूसी क्रांति"] --> B["यूरोप में राजनीतिक धाराएँ: उदारवाद, कट्टरवाद, रूढ़िवाद"] A --> C["समाजवादी विचारक: ब्लां, ओवन, मार्क्स, एंगेल्स"] C --> D["1889: द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय"] A --> E["रूस: ज़ार निकोलस द्वितीय की निरंकुशता"] E --> F["RSDWP: बोल्शेविक बनाम मेंशेविक"] F --> G["1905: खूनी रविवार, ड्यूमा"] E --> H["1914: प्रथम विश्व युद्ध, संकट"] H --> I["फरवरी 1917: ज़ार का पतन"] I --> J["अक्टूबर 1917: बोल्शेविक क्रांति"] J --> K["डिक्री ऑन पीस, लैंड; ब्रेस्ट-लिटोव्स्क"] K --> L["1918-20: गृह युद्ध"] L --> M["1922: सोवियत संघ का गठन"] M --> N["वैश्विक प्रभाव: विश्व भर में कम्युनिज़्म"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

मार्क्स का वर्ग-संघर्ष सिद्धांत पूँजीपति वर्ग कारखाने, मशीनें, भूमि धन के स्वामी मजदूर वर्ग केवल मजदूरी पर जीवन शोषित वर्ग वर्ग-संघर्ष परिणाम: मजदूरों की क्रांति → पूँजीवाद का अंत → वर्गहीन समाज कम्युनिस्ट घोषणापत्र (1848) कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स Golden Rule मार्क्स के अनुसार वर्ग-संघर्ष ही इतिहास की गति निर्धारित करता है।
1917 की रूसी क्रांतियाँ फरवरी 1917 रोटी की कमी, हड़तालें सेना का विद्रोह ज़ार का पतन अंतरिम सरकार अक्टूबर 1917 बोल्शेविकों का विद्रोह विंटर पैलेस पर कब्जा प्रोविज़नल सरकार हटी सोवियत सत्ता बोल्शेविकों के प्रमुख निर्णय डिक्री ऑन पीस युद्ध समाप्त डिक्री ऑन लैंड भूमि किसानों को बैंकों का राष्ट्रीयकरण समाजवादी अर्थव्यवस्था स्वर्ण नियम फरवरी में राजतंत्र गिरा, अक्टूबर में बोल्शेविकों ने सत्ता ली।

सामान्य गलतियाँ

  1. मेंशेविक और बोल्शेविक में भ्रम: विद्यार्थी अक्सर यह भूल जाते हैं कि 'बोल्शेविक' का अर्थ 'बहुमत' और 'मेंशेविक' का अर्थ 'अल्पमत' होता है; लेनिन बोल्शेविकों के नेता थे।
  2. फरवरी और अक्टूबर क्रांति का क्रम: कई विद्यार्थी अक्टूबर क्रांति को फरवरी से पहले मान लेते हैं। पहले फरवरी क्रांति (ज़ार का पतन) हुई, फिर अक्टूबर क्रांति (बोल्शेविक सत्ता)।
  3. 1905 की क्रांति और खूनी रविवार: विद्यार्थी खूनी रविवार को अक्टूबर 1917 की घटना समझ लेते हैं, जबकि यह जनवरी 1905 में गैपॉन के नेतृत्व में हुई थी।
  4. सहकारी समितियों को गलत विचारक से जोड़ना: लुई ब्लां सहकारी समितियों के समर्थक थे, रॉबर्ट ओवन नहीं। इसी प्रकार ओवन स्कॉटलैंड के उद्यमी थे, ब्लां फ्रांस के समाजवादी।
  5. 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र' के लेखक: विद्यार्थी इसे केवल मार्क्स से जोड़ते हैं, जबकि इसे मार्क्स और एंगेल्स ने मिलकर 1848 में लिखा था।
  6. सोवियत और अंतरिम सरकार का संबंध: कई विद्यार्थी सोवियतों को अंतरिम सरकार का अंग समझते हैं, जबकि वे अलग समानांतर परिषदें थीं जिन्होंने अंतरिम सरकार को चुनौती दी।
  7. ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि: इसे प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति वाली संधि समझ लेना भूल है; यह 1918 में जर्मनी के साथ रूस की अलग संधि थी।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. तिथियों के जोड़े बनाएं: 1905 (क्रांति), 1917 (फरवरी-अक्टूबर), 1918 (गृह युद्ध/संधि), 1922 (USSR) को जोड़े में याद रखें।
  2. दोनों क्रांतियों की तुलना लिखें: फरवरी और अक्टूबर क्रांति के कारण, नेता, परिणाम की तुलना करने वाले प्रश्नों का उत्तर तालिका बनाकर लिखें।
  3. शब्दावली स्पष्ट रखें: ज़ार, ड्यूमा, सोवियत, बोल्शेविक, मेंशेविक, चेका, साम्यवाद की परिभाषाएं रटें।
  4. मार्क्सवाद के सिद्धांत: वर्ग-संघर्ष, पूँजीपति बनाम मजदूर, वर्गहीन समाज - इन अवधारणाओं को उदाहरण सहित समझें।
  5. वैश्विक प्रभाव के प्रश्न: 'रूसी क्रांति का विश्व पर प्रभाव' में सोवियत संघ का गठन, कम्युनिस्ट दलों का उदय और उपनिवेशों में प्रभाव लिखें।
  6. मानचित्र: रूस के प्रमुख नगर (पेत्रोग्राद/सेंट पीटर्सबर्ग, मॉस्को) का स्थान जानें।
  7. प्रश्न को ध्यान से पढ़ें: 'क्रांति के बाद रूस में परिवर्तन' में डिक्री ऑन लैंड/पीस, राष्ट्रीयकरण, श्रम सुधार सभी बिंदु लिखें।

निष्कर्ष

यूरोप में समाजवाद और रूसी क्रांति का अध्ययन हमें सिखाता है कि आर्थिक असमानता और निरंकुश शासन जनता के संगठित संघर्ष से बदले जा सकते हैं। मार्क्स के वैज्ञानिक समाजवाद ने श्रमिक वर्ग को एक नई राजनीतिक चेतना दी। रूस में ज़ार की निरंकुशता, किसानों-मजदूरों का शोषण और प्रथम विश्व युद्ध की विपत्ति ने फरवरी और अक्टूबर 1917 की क्रांतियों को जन्म दिया। बोल्शेविकों की सफलता ने साबित किया कि समाजवादी सरकार भी संभव है। सोवियत संघ का उदय विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने पूँजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं के बीच विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा की नींव रखी। यह अध्याय केवल इतिहास नहीं, बल्कि विचारों की शक्ति का प्रमाण है।