किसी भी देश की सबसे महत्वपूर्ण संपदा उसके लोग हैं। जब जनसंख्या शिक्षित, स्वस्थ और कुशल होती है, तो वह देश की मानवीय पूँजी (Human Capital) बन जाती है और देश के विकास में योगदान करती है। 'संसाधन के रूप में लोग' का अर्थ है कि जनसंख्या को केवल बोझ नहीं, बल्कि एक संपत्ति (Asset) माना जाना चाहिए। लोगों में शिक्षा, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से निवेश करना मानव पूँजी निर्माण (Human Capital Formation) कहलाता है। इस अध्याय में हम आर्थिक गतिविधियों के प्रकार, मानव पूँजी का महत्व, शिक्षा और स्वास्थ्य का महत्व तथा बेरोजगारी के प्रकारों का अध्ययन करेंगे।
लोग तब एक संसाधन बनते हैं जब उनमें कौशल, ज्ञान और स्वास्थ्य का विकास होता है। शिक्षा, प्रशिक्षण और चिकित्सा सेवाओं पर किया गया निवेश व्यक्ति की उत्पादकता बढ़ाता है। शिक्षित और स्वस्थ व्यक्ति नई तकनीकों का उपयोग कर सकता है, बेहतर निर्णय ले सकता है और अधिक उत्पादन कर सकता है। इस प्रकार मानव पूँजी निर्माण न केवल व्यक्ति के लिए बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए लाभदायक होता है। भारत की विशाल जनसंख्या, यदि सही शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से सुसज्जित हो, तो 'जनसांख्यिकीय लाभांश' (Demographic Dividend) प्रदान कर सकती है।
आर्थिक गतिविधियों को तीन मुख्य क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है:
इसमें प्राकृतिक संसाधनों से सीधे जुड़ी गतिविधियां शामिल हैं, जैसे कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वानिकी और खनन। भारत की अधिकांश जनसंख्या इसी क्षेत्र पर निर्भर है।
इसमें विनिर्माण और औद्योगिक गतिविधियां शामिल हैं, जैसे कारखानों में वस्तुओं का उत्पादन। कच्चे माल को तैयार वस्तुओं में बदलने का कार्य इसी क्षेत्र में होता है।
इसे सेवा क्षेत्र (Service Sector) भी कहते हैं। इसमें वे गतिविधियां शामिल हैं जो वस्तुएं उत्पन्न नहीं करतीं बल्कि सेवाएं प्रदान करती हैं, जैसे परिवहन, बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और पर्यटन।
जो गतिविधियां बाजार में बिक्री के लिए होती हैं (जैसे कारखाने में काम) उन्हें बाजार गतिविधियां कहते हैं, जबकि जो स्वयं के उपभोग के लिए होती हैं (जैसे घर पर खाना पकाना) उन्हें गैर-बाजार गतिविधियां कहते हैं। गैर-बाजार गतिविधियों का उत्पादन गिनती में नहीं आता।
शिक्षा मानव पूँजी निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। शिक्षित जनसंख्या नई तकनीकों को अपनाने, रोजगार प्राप्त करने और देश की उत्पादकता बढ़ाने में सक्षम होती है। भारत सरकार ने शिक्षा के विस्तार के लिए कई कदम उठाए हैं:
स्वस्थ जनसंख्या ही उत्पादक हो सकती है। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार से जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) बढ़ी है और शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate - IMR) घटी है। बीमार व्यक्ति काम नहीं कर सकता, इसलिए स्वास्थ्य देखभाल मानव पूँजी निर्माण का अनिवार्य अंग है। सरकार ने स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से टीकाकरण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और पोषण पर ध्यान दिया है।
बेरोजगारी वह स्थिति है जब सक्षम और इच्छुक व्यक्ति को काम नहीं मिलता। भारत में बेरोजगारी के मुख्य प्रकार हैं:
यह ग्रामीण क्षेत्रों में पाई जाती है, जब कृषि के सीमित महीनों में ही काम मिलता है। बाकी महीनों में किसान और मजदूर बेरोजगार रहते हैं।
यह वह स्थिति है जब काम पर लगे लोगों की संख्या वास्तविक आवश्यकता से अधिक होती है। उदाहरण के लिए, यदि एक खेत पर केवल 2 मजदूरों की आवश्यकता है, लेकिन 5 मजदूर काम कर रहे हैं, तो 3 मजदूरों का उत्पादन में योगदान लगभग शून्य होता है। इसे अदृश्य/प्रच्छन्न बेरोजगारी भी कहते हैं।
शहरी क्षेत्रों में शिक्षित युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं मिलती। डिग्री प्राप्त युवाओं की बेरोजगारी शिक्षित बेरोजगारी कहलाती है।
यह तब होती है जब उपलब्ध रोजगार के प्रकार और लोगों के कौशल में बेमेल होता है।
बेरोजगारी के कारण गरीबी, अपराध और सामाजिक अशांति बढ़ती है। बेरोजगारी घटाने के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने, कौशल विकास, कृषि से परे विविधीकरण और उद्योगों के विस्तार की आवश्यकता है।
भारत की युवा जनसंख्या विश्व की सबसे बड़ी मानवीय संपत्ति है। यदि इस जनसंख्या को शिक्षा, कौशल और स्वास्थ्य से सुसज्जित किया जाए, तो यह देश की आर्थिक वृद्धि को तेज कर सकती है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी विकास पर निवेश से बढ़ता है। 'संसाधन के रूप में लोग' की अवधारणा का उद्देश्य जनसंख्या के आकार और गुणवत्ता दोनों पर ध्यान देना है, ताकि जनसंख्या एक बोझ के बजाय विकास का इंजन बने।
| क्षेत्र | प्रकार | उदाहरण |
|---|---|---|
| प्राथमिक | प्राकृतिक संसाधन | कृषि, पशुपालन, खनन |
| द्वितीयक | विनिर्माण | कारखानों में उत्पादन |
| तृतीयक | सेवाएं | बैंकिंग, परिवहन, शिक्षा |
| प्रकार | विशेषता | क्षेत्र |
|---|---|---|
| मौसमी | कृषि के महीनों में ही काम | ग्रामीण |
| छिपी हुई | आवश्यकता से अधिक श्रमिक | ग्रामीण |
| शिक्षित | योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं | शहरी |
| संरचनात्मक | कौशल और रोजगार में बेमेल | सभी क्षेत्र |
| घटक | महत्व |
|---|---|
| शिक्षा | कौशल और ज्ञान का विकास |
| प्रशिक्षण | विशेष योग्यता |
| स्वास्थ्य | उत्पादकता के लिए आवश्यक |
'संसाधन के रूप में लोग' अवधारणा यह सिखाती है कि जनसंख्या कोई बोझ नहीं, बल्कि एक मूल्यवान संसाधन है। जब लोग शिक्षित, स्वस्थ और कुशल होते हैं, तो वे मानव पूँजी बनकर देश के विकास को गति देते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश, सरकारी योजनाओं के माध्यम से, देश की उत्पादकता को बढ़ाता है। बेरोजगारी मानव संसाधन की बर्बादी है, जिसे रोजगार के अवसर बढ़ाकर और कौशल विकास द्वारा घटाया जा सकता है। भारत की युवा जनसंख्या जनसांख्यिकीय लाभांश का अवसर देती है, जिसे शिक्षा और रोजगार की सही नीतियों से भुनाया जा सकता है। यह अध्याय निर्धनता और खाद्य सुरक्षा जैसे आगे के अध्यायों की समझ को मजबूत करता है।