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1. परिचय

लोकतंत्र में निर्णय केवल व्यक्तियों के हाथों में नहीं होते, बल्कि विभिन्न संस्थाओं (Institutions) के माध्यम से लिए जाते हैं। इन संस्थाओं के सही कामकाज के बिना कोई भी लोकतंत्र कार्य नहीं कर सकता। भारत की प्रमुख राजनीतिक संस्थाएं हैं: विधायिका (Parliament), कार्यपालिका (Executive) और न्यायपालिका (Judiciary)। ये तीनों संस्थाएं सामूहिक रूप से शासन का कार्य करती हैं। इस अध्याय में हम इन संस्थाओं की संरचना, कार्य और कामकाज का अध्ययन करेंगे। साथ ही, हम मंडल आयोग के उदाहरण के माध्यम से समझेंगे कि एक निर्णय किस प्रकार विभिन्न संस्थाओं से होकर गुजरता है।

2. निर्णय लेने की प्रक्रिया: मंडल आयोग का उदाहरण

1980 में जनता पार्टी की सरकार ने मंडल आयोग (Mandal Commission) की स्थापना की थी, जिसकी अध्यक्षता बी.पी. मंडल ने की। इस आयोग को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) की पहचान कर उनके लिए आरक्षण की सिफारिश करनी थी। 1980 में ही आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें सरकारी नौकरियों में OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की गई।

हालांकि, इस सिफारिश को तुरंत लागू नहीं किया गया, क्योंकि सरकार बदल गई और मुद्दा विवादास्पद था। बाद में 1990 में प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार ने कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) जारी कर 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का निर्णय लिया। इस निर्णय के विरोध में देश भर में आंदोलन हुए। कुछ युवाओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। 16 नवंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 27 प्रतिशत आरक्षण को बरकरार रखा, लेकिन कुछ शर्तों के साथ। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि भारत में कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय सरकार, संसद और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं के माध्यम से ही लागू होता है।

3. संसद (Parliament) - विधायिका

भारत की संसद दो सदनों से मिलकर बनी है: लोकसभा और राज्यसभा

लोकसभा (निम्न सदन)

लोकसभा जनता द्वारा सीधे चुनी जाती है। इसके सदस्यों की संख्या अधिकतम 552 हो सकती है (जिसमें से 530 राज्यों से, 20 केंद्र शासित प्रदेशों से तथा 2 राष्ट्रपति द्वारा नामित एंग्लो-इंडियन समुदाय से होते थे; 104वें संवैधानिक संशोधन से एंग्लो-इंडियन आरक्षण समाप्त हो गया)। वर्तमान में लोकसभा में 543 निर्वाचित सदस्य हैं। लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। यह सदन जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करता है।

राज्यसभा (उच्च सदन)

राज्यसभा का गठन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों से होता है। इसके अधिकतम 250 सदस्य हो सकते हैं, जिनमें से 238 सदस्य राज्य विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं और 12 सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान आदि के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए नामित किया जाता है। राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक 2 वर्ष में अवकाश ग्रहण करते हैं।

संसद के कार्य

संसद कानून बनाती है, सरकार के कार्यों की जांच करती है, वित्त (बजट) पारित करती है और देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करती है। धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही पेश किए जा सकते हैं, जबकि राज्यसभा धन विधेयक पर केवल 14 दिनों तक रोक लगा सकती है।

कोई कानून कैसे बनता है?

कोई भी विधेयक (Bill) सांसद या मंत्री द्वारा लोकसभा या राज्यसभा में पेश किया जाता है। विधेयक पर चर्चा होती है, मतदान होता है और यदि दोनों सदनों में पारित हो जाता है, तो उसे राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद विधेयक कानून (Act) बन जाता है।

4. कार्यपालिका (Executive)

कार्यपालिका का कार्य सरकार के निर्णयों को लागू करना है। कार्यपालिका दो प्रकार की होती है:

राजनीतिक कार्यपालिका

इसमें प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और मंत्री शामिल होते हैं। प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह लोकसभा में बहुमत वाले दल या गठबंधन का नेता होता है। मंत्रिपरिषद संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। मंत्री वे सांसद होते हैं जिन्हें विभिन्न विभागों का प्रभार दिया जाता है।

स्थायी कार्यपालिका (सिविल सेवा/नौकरशाही)

यह सिविल सेवकों (IAS, IPS, IRS आदि) से बनी होती है। ये अधिकारी सरकार की नीतियों को लागू करते हैं। ये किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं होते और सरकार बदलने पर भी बने रहते हैं। स्थायी कार्यपालिका प्रशासन की रीढ़ है।

राष्ट्रपति

राष्ट्रपति भारत का संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) होता है। राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से होता है। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, राज्यपालों आदि की नियुक्ति करता है। वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद में होती है।

5. न्यायपालिका (Judiciary)

न्यायपालिका कानून का निर्वहन करती है और न्याय प्रदान करती है। भारत की न्यायपालिका में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court), उच्च न्यायालय (High Courts) और जिला न्यायालय (District Courts) शामिल हैं।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता और शक्तियां

भारत में न्यायपालिका स्वतंत्र है। न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप कम करने का प्रयास किया जाता है। न्यायपालिका के पास न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति है, जिसके अंतर्गत वह संसद या सरकार के किसी भी कानून को संविधान के विरुद्ध घोषित कर सकती है। न्यायपालिका नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है। यह कार्यपालिका और विधायिका की कार्रवाइयों पर नियंत्रण रखती है।

6. शक्ति का संतुलन (Checks and Balances)

भारत में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति का संतुलन होता है। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका उनकी संवैधानिकता की जांच करती है। संसद कार्यपालिका के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है, जबकि राष्ट्रपति विधेयक को वापस भेज सकता है (पहली बार)। न्यायपालिका संविधान की रक्षक है। इस प्रकार तीनों संस्थाएं एक-दूसरे को नियंत्रित करती हैं, जिससे लोकतंत्र संतुलित रहता है।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: तीन प्रमुख संस्थाएं

संस्था प्रकार मुख्य कार्य
संसद विधायिका कानून बनाना, बजट पारित करना
प्रधानमंत्री + मंत्रिपरिषद कार्यपालिका कानून लागू करना
सर्वोच्च न्यायालय न्यायपालिका न्याय देना, संविधान की रक्षा

तालिका 2: लोकसभा और राज्यसभा की तुलना

पहलू लोकसभा राज्यसभा
चुनाव जनता द्वारा सीधे राज्य विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष
अधिकतम सदस्य 552 250
कार्यकाल 5 वर्ष स्थायी (2/3 सदस्य प्रति 2 वर्ष)
धन विधेयक केवल यहीं पेश केवल 14 दिन रोक

तालिका 3: मंडल आयोग से जुड़ी तिथियां

तिथि घटना
1980 मंडल आयोग की स्थापना और रिपोर्ट
1990 कार्यालय ज्ञापन द्वारा 27% आरक्षण
16 नवंबर 1992 सुप्रीम कोर्ट का फैसला

माइंड मैप

graph TD A["संस्थाओं का कामकाज"] --> B["निर्णय प्रक्रिया: मंडल आयोग उदाहरण"] B --> C["1980: आयोग, 1990: ज्ञापन, 1992: सुप्रीम कोर्ट"] A --> D["विधायिका: संसद"] D --> E["लोकसभा (जनता द्वारा)"] D --> F["राज्यसभा (राज्यों द्वारा)"] A --> G["कार्यपालिका"] G --> H["राजनीतिक: प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद"] G --> I["स्थायी: सिविल सेवक"] G --> J["राष्ट्रपति: संवैधानिक प्रमुख"] A --> K["न्यायपालिका"] K --> L["सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, जिला न्यायालय"] K --> M["न्यायिक समीक्षा"] A --> N["शक्ति का संतुलन"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

भारतीय लोकतंत्र की तीन संस्थाएं विधायिका संसद लोकसभा + राज्यसभा कानून बनाती है कार्यपालिका प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद सिविल सेवक कानून लागू करती है न्यायपालिका सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय न्याय प्रदान करती है शक्ति का संतुलन (Checks and Balances) संसद → कानून | कार्यपालिका → क्रियान्वयन | न्यायपालिका → संवैधानिकता की जांच Golden Rule विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका के बीच शक्ति का संतुलन लोकतंत्र को स्थिर रखता है।
कानून बनने की प्रक्रिया विधेयक का पेश होना चर्चा और मतदान दूसरा सदन दोनों सदनों में पारित राष्ट्रपति की स्वीकृति कानून (Act) बनना स्वर्ण नियम धन विधेयक केवल लोकसभा में पेश होता है, राज्यसभा केवल 14 दिन रोक सकती है।

सामान्य गलतियाँ

  1. लोकसभा की सदस्य संख्या: लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 552 है (530+20+2), जबकि वर्तमान में निर्वाचित सदस्य 543 हैं। '545' अब गलत है (104वें संशोधन से एंग्लो-इंडियन नामांकन समाप्त)।
  2. राज्यसभा की सदस्य संख्या: राज्यसभा के अधिकतम 250 सदस्य हैं (238 चुने + 12 नामित), न कि 250 चुने गए।
  3. राष्ट्रपति की भूमिका: राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख है; वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद में होती है। राष्ट्रपति को 'वास्तविक कार्यपालिका' न कहें।
  4. मंडल आयोग की सिफारिश: मंडल आयोग ने OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी, 50 प्रतिशत नहीं।
  5. न्यायिक समीक्षा: न्यायिक समीक्षा का अर्थ है कानून की संवैधानिकता की जांच, न कि सरकार को चलाना।
  6. विधेयक का मार्ग: विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही कानून बनता है; संसद में पारित होने मात्र से कानून नहीं बन जाता।
  7. स्थायी कार्यपालिका: सिविल सेवक राजनीतिक दलों से जुड़े नहीं होते और सरकार बदलने पर भी बने रहते हैं। ये 'अस्थायी' नहीं, बल्कि 'स्थायी' कार्यपालिका हैं।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. संस्थाओं के कार्य: विधायिका (कानून), कार्यपालिका (क्रियान्वयन), न्यायपालिका (न्याय) - तीनों के कार्य अलग-अलग लिखें।
  2. लोकसभा-राज्यसभा तुलना: चुनाव, सदस्य संख्या, कार्यकाल और धन विधेयक के अधिकार की तुलना तालिका में करें।
  3. कानून बनने की प्रक्रिया: विधेयक के चरण (पेश होना → चर्चा → मतदान → दूसरा सदन → राष्ट्रपति की स्वीकृति → कानून) क्रम से लिखें।
  4. मंडल आयोग: 1980 (आयोग), 1990 (ज्ञापन), 1992 (सुप्रीम कोर्ट) की तिथियां और घटनाएं याद रखें।
  5. राष्ट्रपति बनाम प्रधानमंत्री: राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख, प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका - यह अंतर स्पष्ट लिखें।
  6. शक्ति संतुलन: 'संस्थाएं एक-दूसरे को कैसे नियंत्रित करती हैं' में अविश्वास प्रस्ताव, न्यायिक समीक्षा, विधेयक वापसी का उल्लेख करें।
  7. न्यायपालिका: सर्वोच्च न्यायालय की स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा पर विस्तार से प्रश्न तैयार रखें।

निष्कर्ष

भारत के लोकतंत्र में निर्णय व्यक्तिगत इच्छा से नहीं, बल्कि स्थापित संस्थाओं के माध्यम से लिए जाते हैं। संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका उनकी संवैधानिकता की जांच करती है। मंडल आयोग के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि एक निर्णय को किस प्रकार विभिन्न संस्थाओं के अनुमोदन से गुजरना पड़ता है। राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख और प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका होते हुए भी सभी संविधान के अधीन कार्य करते हैं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है। इस प्रकार तीनों संस्थाओं के बीच शक्ति का संतुलन ही भारतीय लोकतंत्र की सफलता का आधार है।