लोकतंत्र में निर्णय केवल व्यक्तियों के हाथों में नहीं होते, बल्कि विभिन्न संस्थाओं (Institutions) के माध्यम से लिए जाते हैं। इन संस्थाओं के सही कामकाज के बिना कोई भी लोकतंत्र कार्य नहीं कर सकता। भारत की प्रमुख राजनीतिक संस्थाएं हैं: विधायिका (Parliament), कार्यपालिका (Executive) और न्यायपालिका (Judiciary)। ये तीनों संस्थाएं सामूहिक रूप से शासन का कार्य करती हैं। इस अध्याय में हम इन संस्थाओं की संरचना, कार्य और कामकाज का अध्ययन करेंगे। साथ ही, हम मंडल आयोग के उदाहरण के माध्यम से समझेंगे कि एक निर्णय किस प्रकार विभिन्न संस्थाओं से होकर गुजरता है।
1980 में जनता पार्टी की सरकार ने मंडल आयोग (Mandal Commission) की स्थापना की थी, जिसकी अध्यक्षता बी.पी. मंडल ने की। इस आयोग को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) की पहचान कर उनके लिए आरक्षण की सिफारिश करनी थी। 1980 में ही आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें सरकारी नौकरियों में OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की गई।
हालांकि, इस सिफारिश को तुरंत लागू नहीं किया गया, क्योंकि सरकार बदल गई और मुद्दा विवादास्पद था। बाद में 1990 में प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार ने कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) जारी कर 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का निर्णय लिया। इस निर्णय के विरोध में देश भर में आंदोलन हुए। कुछ युवाओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। 16 नवंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 27 प्रतिशत आरक्षण को बरकरार रखा, लेकिन कुछ शर्तों के साथ। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि भारत में कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय सरकार, संसद और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं के माध्यम से ही लागू होता है।
भारत की संसद दो सदनों से मिलकर बनी है: लोकसभा और राज्यसभा।
लोकसभा जनता द्वारा सीधे चुनी जाती है। इसके सदस्यों की संख्या अधिकतम 552 हो सकती है (जिसमें से 530 राज्यों से, 20 केंद्र शासित प्रदेशों से तथा 2 राष्ट्रपति द्वारा नामित एंग्लो-इंडियन समुदाय से होते थे; 104वें संवैधानिक संशोधन से एंग्लो-इंडियन आरक्षण समाप्त हो गया)। वर्तमान में लोकसभा में 543 निर्वाचित सदस्य हैं। लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। यह सदन जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करता है।
राज्यसभा का गठन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों से होता है। इसके अधिकतम 250 सदस्य हो सकते हैं, जिनमें से 238 सदस्य राज्य विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं और 12 सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान आदि के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए नामित किया जाता है। राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक 2 वर्ष में अवकाश ग्रहण करते हैं।
संसद कानून बनाती है, सरकार के कार्यों की जांच करती है, वित्त (बजट) पारित करती है और देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करती है। धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही पेश किए जा सकते हैं, जबकि राज्यसभा धन विधेयक पर केवल 14 दिनों तक रोक लगा सकती है।
कोई भी विधेयक (Bill) सांसद या मंत्री द्वारा लोकसभा या राज्यसभा में पेश किया जाता है। विधेयक पर चर्चा होती है, मतदान होता है और यदि दोनों सदनों में पारित हो जाता है, तो उसे राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा जाता है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद विधेयक कानून (Act) बन जाता है।
कार्यपालिका का कार्य सरकार के निर्णयों को लागू करना है। कार्यपालिका दो प्रकार की होती है:
इसमें प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और मंत्री शामिल होते हैं। प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह लोकसभा में बहुमत वाले दल या गठबंधन का नेता होता है। मंत्रिपरिषद संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। मंत्री वे सांसद होते हैं जिन्हें विभिन्न विभागों का प्रभार दिया जाता है।
यह सिविल सेवकों (IAS, IPS, IRS आदि) से बनी होती है। ये अधिकारी सरकार की नीतियों को लागू करते हैं। ये किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं होते और सरकार बदलने पर भी बने रहते हैं। स्थायी कार्यपालिका प्रशासन की रीढ़ है।
राष्ट्रपति भारत का संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) होता है। राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से होता है। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, राज्यपालों आदि की नियुक्ति करता है। वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद में होती है।
न्यायपालिका कानून का निर्वहन करती है और न्याय प्रदान करती है। भारत की न्यायपालिका में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court), उच्च न्यायालय (High Courts) और जिला न्यायालय (District Courts) शामिल हैं।
भारत में न्यायपालिका स्वतंत्र है। न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप कम करने का प्रयास किया जाता है। न्यायपालिका के पास न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति है, जिसके अंतर्गत वह संसद या सरकार के किसी भी कानून को संविधान के विरुद्ध घोषित कर सकती है। न्यायपालिका नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है। यह कार्यपालिका और विधायिका की कार्रवाइयों पर नियंत्रण रखती है।
भारत में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति का संतुलन होता है। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका उनकी संवैधानिकता की जांच करती है। संसद कार्यपालिका के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है, जबकि राष्ट्रपति विधेयक को वापस भेज सकता है (पहली बार)। न्यायपालिका संविधान की रक्षक है। इस प्रकार तीनों संस्थाएं एक-दूसरे को नियंत्रित करती हैं, जिससे लोकतंत्र संतुलित रहता है।
| संस्था | प्रकार | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| संसद | विधायिका | कानून बनाना, बजट पारित करना |
| प्रधानमंत्री + मंत्रिपरिषद | कार्यपालिका | कानून लागू करना |
| सर्वोच्च न्यायालय | न्यायपालिका | न्याय देना, संविधान की रक्षा |
| पहलू | लोकसभा | राज्यसभा |
|---|---|---|
| चुनाव | जनता द्वारा सीधे | राज्य विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष |
| अधिकतम सदस्य | 552 | 250 |
| कार्यकाल | 5 वर्ष | स्थायी (2/3 सदस्य प्रति 2 वर्ष) |
| धन विधेयक | केवल यहीं पेश | केवल 14 दिन रोक |
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 1980 | मंडल आयोग की स्थापना और रिपोर्ट |
| 1990 | कार्यालय ज्ञापन द्वारा 27% आरक्षण |
| 16 नवंबर 1992 | सुप्रीम कोर्ट का फैसला |
भारत के लोकतंत्र में निर्णय व्यक्तिगत इच्छा से नहीं, बल्कि स्थापित संस्थाओं के माध्यम से लिए जाते हैं। संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका उनकी संवैधानिकता की जांच करती है। मंडल आयोग के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि एक निर्णय को किस प्रकार विभिन्न संस्थाओं के अनुमोदन से गुजरना पड़ता है। राष्ट्रपति संवैधानिक प्रमुख और प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यपालिका होते हुए भी सभी संविधान के अधीन कार्य करते हैं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है। इस प्रकार तीनों संस्थाओं के बीच शक्ति का संतुलन ही भारतीय लोकतंत्र की सफलता का आधार है।