संविधान (Constitution) किसी देश की सर्वोच्च कानूनी व्यवस्था है, जो शासन के मूलभूत सिद्धांतों, अधिकारों और नियमों को निर्धारित करता है। लोकतंत्र में संविधान का विशेष महत्व होता है, क्योंकि यह सरकार की शक्तियों को सीमित करता है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है। इस अध्याय में हम अध्ययन करेंगे कि विभिन्न देशों ने संविधान कैसे बनाया, विशेषकर दक्षिण अफ्रीका और भारत में। भारत का संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है, जिसे 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया। भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया, संविधान सभा, प्रस्तावना और संविधान की विशेषताएं इस अध्याय के मुख्य विषय हैं।
किसी देश को संविधान की आवश्यकता क्यों होती है? संविधान निम्नलिखित कार्य करता है:
संविधान एक ऐसा दस्तावेज है जो समाज को एकता और व्यवस्था का सूत्र प्रदान करता है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने संविधान का सही पालन किया, वहां लोकतंत्र मजबूत हुआ।
भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए दक्षिण अफ्रीका के अनुभव का अध्ययन करना आवश्यक है। दक्षिण अफ्रीका में अनेक वर्षों तक रंगभेद (Apartheid) की नीति लागू रही, जिसके तहत गोरे अल्पसंख्यक शासक थे और काले बहुसंख्यकों के साथ अत्यधिक भेदभाव होता था। काले लोगों को वोट देने, शिक्षा प्राप्त करने, अच्छे क्षेत्रों में रहने तथा अच्छे कार्य करने के अधिकार से वंचित किया गया।
रंगभेद के विरुद्ध अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (ANC) और उसके नेता नेल्सन मंडेला ने लंबा संघर्ष किया। मंडेला को 1964 में आजीवन कारावास की सजा दी गई, लेकिन देश-विदेश के दबाव के कारण 1990 में उन्हें रिहा किया गया। 1994 में दक्षिण अफ्रीका में पहले बहुजातीय चुनाव हुए, जिसमें नेल्सन मंडेला राष्ट्रपति बने। दक्षिण अफ्रीका के नेताओं ने एक ऐसा संविधान बनाया जो सभी नागरिकों को समान अधिकार देता था। इस अनुभव से यह शिक्षा मिली कि संविधान ऐसा होना चाहिए जो विभिन्न समूहों के बीच सहयोग और न्याय स्थापित करे। दक्षिण अफ्रीका का अनुभव भारतीय संविधान सभा के सदस्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत था।
भारत की संविधान सभा (Constituent Assembly) का गठन 1946 में हुआ था। इसके सदस्यों का चुनाव प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा हुआ। संविधान सभा में विभिन्न वर्गों, धर्मों, क्षेत्रों और समुदायों का प्रतिनिधित्व था। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे। सभा के सामने यह चुनौती थी कि एक विविधतापूर्ण और अलग-अलग विचारों वाले देश के लिए एक सर्वमान्य संविधान बनाया जाए।
13 दिसंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसमें भारत के संविधान के मूल उद्देश्यों को स्पष्ट किया गया। इस प्रस्ताव में संप्रभुता, लोकतंत्र, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्यों को अपनाने का संकल्प किया गया। यह प्रस्ताव भारतीय संविधान की प्रस्तावना का आधार बना।
संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए प्रारूप समिति बनाई गई, जिसके अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर थे। अंबेडकर को भारतीय संविधान का 'निर्माता' (Architect of Indian Constitution) कहा जाता है। संविधान सभा ने लगभग 3 वर्षों तक विचार-विमर्श कर 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकृत (Adopt) किया। संविधान 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ, जिस दिन को हम 'गणतंत्र दिवस' के रूप में मनाते हैं।
संविधान की प्रस्तावना (Preamble) उसके उद्देश्यों और मूल्यों का परिचय है। प्रस्तावना के अनुसार, "हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी संविधान सभा में इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"
प्रस्तावना की मुख्य विशेषताएं: - संप्रभुता: भारत अपने आंतरिक और बाह्य मामलों में स्वतंत्र है। - समाजवाद: सामाजिक और आर्थिक समानता का लक्ष्य। - पंथनिरपेक्षता: राज्य किसी धर्म का पक्ष नहीं लेता, सभी धर्मों का सम्मान करता है। - लोकतांत्रिक: सत्ता जनता की इच्छा पर आधारित है। - गणराज्य: राज्य का प्रमुख चुना जाता है, वंशानुगत नहीं होता। - न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व: ये चार मूल्य संविधान की आत्मा हैं।
भारतीय संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
भारतीय संविधान में दुनिया के कई संविधानों से अच्छे तत्व लिए गए हैं:
| देश | भारतीय संविधान में लिया गया तत्व |
|---|---|
| ब्रिटेन | संसदीय प्रणाली, कानून का शासन, एकल नागरिकता |
| अमेरिका | मौलिक अधिकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा |
| आयरलैंड | राज्य के नीति-निर्देशक तत्व |
| कनाडा | सशक्त केंद्र वाला संघ |
| दक्षिण अफ्रीका | संविधान संशोधन की प्रक्रिया |
| फ्रांस | स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व के आदर्श |
| रूस | मौलिक कर्तव्य |
| जर्मनी | आपातकाल में मौलिक अधिकारों का निलंबन |
| जापान | कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया |
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 1946 | संविधान सभा का गठन |
| 13 दिसंबर 1946 | उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत |
| 26 नवंबर 1949 | संविधान अंगीकृत |
| 26 जनवरी 1950 | संविधान लागू (गणतंत्र दिवस) |
| व्यक्ति | भूमिका |
|---|---|
| डॉ. राजेंद्र प्रसाद | संविधान सभा के अध्यक्ष |
| जवाहरलाल नेहरू | उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुतकर्ता |
| डॉ. भीमराव अंबेडकर | प्रारूप समिति के अध्यक्ष |
| मूल्य | अर्थ |
|---|---|
| न्याय | सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक |
| स्वतंत्रता | विचार, अभिव्यक्ति, धर्म की |
| समानता | प्रतिष्ठा और अवसर की |
| बंधुत्व | व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता |
संविधान किसी भी लोकतंत्र की आधारशिला है। दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद-विरोधी संघर्ष ने यह दिखाया कि संविधान किस प्रकार न्याय और समानता का दस्तावेज बन सकता है। भारत की संविधान सभा ने लंबे विमर्श के बाद एक विस्तृत, संतुलित और सर्वमान्य संविधान बनाया, जो दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है। प्रस्तावना में व्यक्त संप्रभुता, समाजवाद, पंथनिरपेक्षता, लोकतंत्र, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य आज भी भारतीय लोकतंत्र का मार्गदर्शन करते हैं। विभिन्न देशों के सर्वोत्तम तत्वों को अपनाकर भारतीय संविधान ने एक अद्वितीय संतुलन स्थापित किया है। यह अध्याय भारतीय शासन प्रणाली, चुनाव और संस्थाओं को समझने की नींव है।