इस अध्याय में हम अध्ययन करते हैं कि उपनिवेशवाद (Colonialism) का वनों और उन पर निर्भर समुदायों पर क्या प्रभाव पड़ा। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में वनों का अत्यधिक दोहन हुआ। ब्रिटिश सरकार ने वनों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए कानून बनाए, जिन्होंने वनवासियों, किसानों और चरवाहों के जीवन को गहराई से प्रभावित किया। इन नीतियों के विरुद्ध आदिवासी समुदायों ने विद्रोह किए, जिनमें बस्तर विद्रोह (1910) प्रमुख है। इसी प्रकार, जावा (इंडोनेशिया) में डच उपनिवेशवाद ने वन समुदायों के साथ कठोर व्यवहार किया। इस अध्याय में हम वन कानूनों, वैज्ञानिक वानिकी, उपनिवेशी वन नीतियों के परिणाम, बस्तर विद्रोह तथा जावा में डच वन प्रबंधन का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
19वीं शताब्दी में वनों की कटाई के सबसे बड़े कारणों में रेलवे का विस्तार प्रमुख था। 1850 के दशक से रेलवे का निर्माण शुरू हुआ। रेलवे ट्रैक बिछाने के लिए स्लीपर (सोने वाली लकड़ी) की आवश्यकता थी। रेल इंजन चलाने के लिए कोयले के स्थान पर प्रारंभ में लकड़ी से बने ईंधन का उपयोग किया गया। इसके लिए रेलवे की जरूरतों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। इसके अलावा यात्री कोच बनाने, स्टेशनों के निर्माण और अन्य कार्यों के लिए भी भारी मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता होती थी।
ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति बढ़ाने के लिए जहाज निर्माण उद्योग को प्रोत्साहन दिया गया, जिसके लिए बड़े-बड़े पेड़ों की आवश्यकता थी। इसके अलावा, जनसंख्या वृद्धि और बढ़ती मांग के कारण खेती योग्य भूमि की आवश्यकता बढ़ी। ब्रिटिश सरकार ने किसानों को वन भूमि साफ करके खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया। इस प्रकार वनों को साफ करके खेती के लिए भूमि का विस्तार किया गया, जिससे वनों की कटाई और तेज हो गई। 19वीं शताब्दी के अंत तक भारत में वनों का क्षेत्र तेजी से घटने लगा।
वनों की कटाई को रोकने तथा उनका व्यवस्थित प्रबंधन करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1864 में डायट्रिच ब्रैंडिस (Dietrich Brandis) को भारत का प्रथम महानिरीक्षक (Inspector General) वन नियुक्त किया। ब्रैंडिस ने वनों का सर्वेक्षण करवाया और 1864 में भारतीय वन सेवा (Indian Forest Service) की स्थापना की। उनका लक्ष्य वनों को सरकार के नियंत्रण में लेना और उनका व्यावसायिक दोहन करना था।
1865 में पहला वन अधिनियम (Indian Forest Act) पारित किया गया। इसके बाद 1878 का वन अधिनियम और अधिक कठोर था। 1878 के अधिनियम के अनुसार वनों को तीन श्रेणियों में बांटा गया:
इस अधिनियम ने वनवासियों के वन पर पारंपरिक अधिकारों को नष्ट कर दिया। उन्हें जंगल से चारा, जलाने की लकड़ी, फल, शहद, औषधीय पौधे आदि लेने के लिए सरकार की अनुमति लेनी पड़ती थी। बिना अनुमति के लकड़ी काटने पर उन्हें दंड मिलता था।
वैज्ञानिक वानिकी (Scientific Forestry) के नाम पर वन प्रबंधन की एक नई प्रणाली लागू की गई। इसके तहत पुराने पेड़ों को काटकर नए पौधे लगाए जाते थे। लेकिन इसमें केवल उन प्रजातियों के पेड़ लगाए गए जो व्यावसायिक दृष्टि से लाभदायक थीं, जैसे सागौन (Teak) और साल (Sal)। इस प्रक्रिया में बहु-प्रजाति वाले प्राकृतिक वन (जैव विविधता वाले) को समाप्त कर एक-प्रजाति वाले एकल-वृक्ष वनों (Monoculture) में बदल दिया गया। इससे वनों की जैव विविधता घटी और वनवासियों की आजीविका संकट में आई। कंपनी की नजर में वे पेड़ 'बेकार' थे जिनसे व्यावसायिक लाभ नहीं मिलता था।
भारत के अनेक आदिवासी क्षेत्रों में स्थानांतरित कृषि (Shifting Cultivation) प्रचलित थी, जिसे विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता था, जैसे मध्य भारत में 'झूम', उत्तर-पूर्व में 'झूम/जूम', झारखंड में 'कुरुवा' आदि। इस पद्धति में किसान एक भूखंड पर खेती करते थे, कुछ वर्षों के बाद उसे छोड़ देते थे और नई भूमि पर चले जाते थे। ब्रिटिश अधिकारी इसे वनों के लिए विनाशकारी मानते थे, इसलिए उन्होंने स्थानांतरित कृषि पर प्रतिबंध लगा दिया। वनवासियों को बसने के लिए निश्चित स्थान दिए गए, लेकिन वे नई व्यवस्था के अनुकूल नहीं हो सके। इससे उनकी पारंपरिक आजीविका नष्ट हो गई।
ब्रिटिश शासन में शिकार पर भी कठोर नियम लागू किए गए। वन अधिनियमों के अनुसार शिकार करना अवैध कर दिया गया, केवल ब्रिटिश अधिकारियों और कुलीनों को ही शिकार की अनुमति थी। शिकार ब्रिटिश शासकों का प्रिय मनोरंजन था। इससे शिकार-पर-निर्भर आदिवासी समुदायों का जीवन और कठिन हो गया।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में चाय, कॉफी और रबर के बागानों (Plantations) का विस्तार किया गया। बागानों के लिए बड़े क्षेत्रों में वन साफ किए गए। श्रमिकों को दूर-दूर से लाकर बागानों में काम कराया जाता था। वनवासियों को बागानों में सस्ते श्रमिक के रूप में काम करने के लिए बाध्य किया गया।
वन कानूनों के विरोध का सबसे बड़ा रूप बस्तर विद्रोह (1910) में सामने आया। बस्तर मध्य भारत (अब छत्तीसगढ़) में स्थित एक बड़ा जिला था, जहां बड़ी संख्या में आदिवासी निवास करते थे। 1905 में वन अधिनियमों में संशोधन किए गए, जिससे वनवासियों के अधिकार और भी सीमित हो गए। वनवासियों को फल, शहद, चारा लेने से वंचित कर दिया गया और सागौन एवं साल के वनों में लकड़ी काटने पर कठोर दंड लागू किए गए। ग्रामीणों की शिकायतें बढ़ने लगीं।
1910 में बस्तर में विद्रोह फूट पड़ा। विद्रोह के नेतृत्व में गुंडा धुर और सूरजगंज (सूरजलाल) जैसे प्रमुख आदिवासी नेता थे। विद्रोही किसानों ने वन अधिकारियों, थानों और सरकारी भवनों पर हमला किया। सैकड़ों आदिवासियों को पकड़कर सजा दी गई। ब्रिटिश सेना ने विद्रोह को क्रूरता से दबाया। हालांकि विद्रोह विफल रहा, लेकिन इसने दिखाया कि वनवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं। बाद में भी 1910 के दशक में बस्तर में किसान और आदिवासी आंदोलन जारी रहे।
जावा (अब इंडोनेशिया का भाग) में डच उपनिवेशवाद के दौरान वन प्रबंधन की नई प्रणाली लागू की गई। जावा में सागौन (Kalian) के वन विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे। डच सरकार ने 1600 के दशक से लकड़ी का व्यापार शुरू किया, लेकिन 19वीं शताब्दी में वन प्रबंधन की औपचारिक व्यवस्था की। डचों ने वनों को 'सरकारी भूमि' घोषित कर दिया और गांवों को वनों से वंचित कर दिया।
डच प्रशासन ने गांवों को ब्लांडोंगडिएंस्टेन (Blandongdiensten) प्रणाली के तहत लकड़ी काटने का काम सौंपा। इस प्रणाली में ग्रामीणों को कुछ करों के बदले सागौन काटने की जिम्मेदारी दी जाती थी। वन ग्रामों (Forest Villages) की स्थापना की गई, जहां श्रमिकों को रखा जाता था। सरकार ने वनों की सुरक्षा के लिए 'सेरात सेलिरारा' (Serat Selirara) नामक पुस्तक लिखी, जिसमें वन प्रबंधन के नियम समझाए गए।
जावा में वनों को दो प्रकारों में बांटा गया: सरकारी वन (बंदर-उमम) और ग्राम वन (त्लुकु/गुनुंग-उमम)। इसके अलावा 'बंजर' (Banjar) भूमि का वर्गीकरण किया गया, जो ऐसी भूमि थी जो कुछ समय से बिना खेती पड़ी थी। डच प्रशासन ऐसी भूमि को सरकारी मानता था और उसे वन क्षेत्र में जोड़ देता था, जिससे ग्रामीण अपनी पारंपरिक भूमि से वंचित हो गए।
1890 में सुरोंतिको सामिन (Surontiko Samin) नामक किसान ने डच वन नीतियों के विरोध में एक आंदोलन शुरू किया। सामिन ने यह दावा किया कि वनों पर गांवों का अधिकार है, सरकार का नहीं। उसके अनुयायियों ने कर देना बंद कर दिया और वनों में चराई शुरू कर दी। 1907 के बाद सामिन के आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया और इसे 'वनों का युद्ध' (War of the Forests) कहा गया। इस विद्रोह को भी डच सरकार ने दबा दिया।
भारतीय स्वतंत्रता के बाद वनवासियों के अधिकारों की मांग उठती रही। 1980 के बाद से जैव विविधता और पारिस्थितिकी के प्रति चेतना बढ़ी। 2006 में भारत सरकार ने अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम (Forest Rights Act, 2006) पारित किया। इस अधिनियम के तहत वनवासियों और आदिवासियों को वनों पर उनके पारंपरिक अधिकारों की कानूनी मान्यता दी गई। इससे यह संदेश मिलता है कि वन और वनवासी एक-दूसरे से अविभाज्य हैं, और वन संरक्षण केवल सरकारी वानिकी से नहीं, बल्कि वन समुदायों की भागीदारी से संभव है।
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1850 का दशक | भारत में रेलवे का विस्तार शुरू |
| 1864 | डायट्रिच ब्रैंडिस प्रथम वन महानिरीक्षक |
| 1864 | भारतीय वन सेवा की स्थापना |
| 1865 | पहला वन अधिनियम |
| 1878 | कठोर वन अधिनियम, वनों का वर्गीकरण |
| 1910 | बस्तर विद्रोह |
| 1890 | सामिन का आंदोलन शुरू (जावा) |
| 2006 | भारत में वन अधिकार अधिनियम |
| वन का प्रकार | विशेषता | ग्रामीणों के अधिकार |
|---|---|---|
| आरक्षित वन | सर्वोत्तम वन | कोई अधिकार नहीं |
| संरक्षित वन | मध्यम श्रेणी | सीमित अधिकार |
| ग्राम वन | सामान्य | ग्रामीणों के उपयोग हेतु |
| मुद्दा | भारत | जावा |
|---|---|---|
| उपनिवेशी शक्ति | ब्रिटिश | डच |
| मुख्य वृक्ष | सागौन, साल | सागौन (Kalian) |
| श्रम व्यवस्था | बागान श्रमिक | ब्लांडोंगडिएंस्टेन |
| प्रमुख विद्रोह | बस्तर विद्रोह 1910 | सामिन का विरोध, वनों का युद्ध |
वन्य समाज एवं उपनिवेशवाद अध्याय यह बताता है कि उपनिवेशी शासन ने वनों को केवल संसाधनों का स्रोत माना, न कि समुदायों का निवास स्थान। वन कानूनों, वैज्ञानिक वानिकी और वन प्रबंधन के दमनकारी तरीकों ने आदिवासियों, किसानों और चरवाहों की पारंपरिक आजीविका को नष्ट कर दिया। बस्तर विद्रोह और सामिन का आंदोलन इस बात का प्रमाण हैं कि वनवासियों ने कभी भी अपने अधिकारों को खत्म नहीं होने दिया। आधुनिक भारत में 2006 का वन अधिकार अधिनियम इसी संघर्ष की जीत है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि वन संरक्षण तभी सफल हो सकता है जब उसमें वन पर निर्भर समुदायों की भागीदारी और उनके अधिकारों का सम्मान हो।