विस्तृत सिद्धांत, सूत्र, आरेख और स्मृति सहायक।
आधुनिक जीवन में विद्युत (Electricity) के बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। हमारे घरों में प्रकाश से लेकर मोबाइल फोन चार्ज करने और बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों को चलाने तक, हर जगह विद्युत का उपयोग होता है। यह ऊर्जा का सबसे सुविधाजनक और आसानी से नियंत्रित किया जा सकने वाला रूप है। आइए विद्युत के मूल सिद्धांतों को समझें।
विद्युत की कहानी 'आवेश' (Charge) से शुरू होती है। पदार्थ परमाणुओं से बना है, और परमाणुओं के भीतर तीन मुख्य कण होते हैं: इलेक्ट्रॉन (ऋणावेशित), प्रोटॉन (धनावेशित) और न्यूट्रॉन (उदासीन)। * प्रकार: आवेश दो प्रकार के होते हैं: 1. धनात्मक आवेश (Positive Charge) - प्रोटॉनों के कारण। 2. ऋणात्मक आवेश (Negative Charge) - इलेक्ट्रॉनों के कारण। * मूलभूत गुण: समान आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित (Repel) करते हैं (जैसे धन-धन या ऋण-ऋण), जबकि विपरीत आवेश एक-दूसरे को आकर्षित (Attract) करते हैं (जैसे धन और ऋण)। * मात्रक: विद्युत आवेश का SI मात्रक कूलॉम (Coulomb - C) है। (एक इलेक्ट्रॉन पर $-1.6 \times 10^{-19}\ C$ आवेश होता है)।
जब आवेश (विशेषकर इलेक्ट्रॉन) किसी चालक (Conductor, जैसे तांबे का तार) में से प्रवाहित होते हैं, तो उसे विद्युत धारा कहते हैं। * परिभाषा: किसी अनुप्रस्थ काट (cross-section) से प्रति एकांक समय में प्रवाहित होने वाले आवेश की मात्रा को विद्युत धारा कहते हैं। अर्थात्, आवेश के प्रवाह की दर को विद्युत धारा कहते हैं। * सूत्र: $I = \frac{Q}{t}$ (जहाँ $I$ = विद्युत धारा, $Q$ = प्रवाहित आवेश, $t$ = समय) * मात्रक: इसका SI मात्रक एम्पीयर (Ampere - A) है। (यदि किसी तार से 1 सेकंड में 1 कूलॉम आवेश प्रवाहित हो, तो धारा 1 एम्पीयर कहलाती है)। * दिशा: परिपाटी (Convention) के अनुसार, विद्युत धारा की दिशा धनावेश के प्रवाह की दिशा मानी जाती है। चूँकि तारों में वास्तव में इलेक्ट्रॉन (ऋणावेश) बहते हैं, इसलिए विद्युत धारा की दिशा इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह की दिशा के विपरीत मानी जाती है (अर्थात बैटरी के धनात्मक सिरे से ऋणात्मक सिरे की ओर)। * मापक यंत्र: विद्युत धारा को ऐमीटर (Ammeter) नामक यंत्र से मापा जाता है। इसे परिपथ में हमेशा श्रेणीक्रम (Series) में जोड़ा जाता है।
पानी हमेशा ऊँचे स्तर से नीचे की ओर बहता है। इसी प्रकार, चालक तार में इलेक्ट्रॉन तब तक प्रवाहित नहीं होते, जब तक कि तार के सिरों के बीच विद्युत दाब का कोई अंतर न हो। इस अंतर को विभवांतर (Potential Difference) कहते हैं। यह विभवांतर बैटरी या सेल द्वारा उत्पन्न किया जाता है।
जर्मन भौतिकविद् जॉर्ज साइमन ओम ने 1827 में विद्युत धारा और विभवांतर के बीच एक बहुत महत्वपूर्ण संबंध स्थापित किया। नियम: यदि किसी चालक की भौतिक अवस्थाएँ (जैसे तापमान, लंबाई, मोटाई) अपरिवर्तित रहें, तो उसके सिरों के बीच उत्पन्न विभवांतर ($V$), उसमें प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा ($I$) के अनुक्रमानुपाती (directly proportional) होता है।
$$ V \propto I $$ $$ V = IR $$
प्रतिरोधों का संयोजन (Combination of Resistors): 1. श्रेणीक्रम (Series): $R_{total} = R_1 + R_2 + R_3$ (कुल प्रतिरोध बढ़ जाता है)। 2. पार्श्वक्रम/समानांतर (Parallel): $\frac{1}{R_{total}} = \frac{1}{R_1} + \frac{1}{R_2} + \frac{1}{R_3}$ (कुल प्रतिरोध सबसे छोटे प्रतिरोध से भी कम हो जाता है)। घरों की वायरिंग समानांतर क्रम में की जाती है ताकि एक उपकरण बंद होने पर बाकी चलते रहें।
जब उच्च प्रतिरोध वाले तार (जैसे नाइक्रोम) से विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो तार गर्म हो जाता है और ऊष्मा उत्पन्न करता है। इसे विद्युत धारा का तापीय प्रभाव कहते हैं। * जूल का तापन नियम (Joule's Law of Heating): उत्पन्न ऊष्मा ($H$) धारा के वर्ग ($I^2$), प्रतिरोध ($R$) और समय ($t$) के गुणनफल के बराबर होती है। $$ H = I^2Rt $$ * अनुप्रयोग: इलेक्ट्रिक हीटर, इलेक्ट्रिक आयरन (प्रेस), टोस्टर, गीजर, और इलेक्ट्रिक फ्यूज (जो अधिक धारा आने पर पिघल कर परिपथ को टूटने से बचाता है)।
विद्युत, इलेक्ट्रॉनों (आवेश) का प्रवाह है जिसे हम विद्युत धारा कहते हैं (एम्पीयर में)। इन इलेक्ट्रॉनों को धक्का देने का काम विभवांतर (वोल्टेज) करता है, जो बैटरी द्वारा प्रदान किया जाता है। प्रवाहित होते समय इलेक्ट्रॉनों को जो रुकावट मिलती है, उसे प्रतिरोध (ओम) कहते हैं। ओम का नियम ($V=IR$) इन तीनों के बीच का मूलभूत संबंध है। जब प्रतिरोध अधिक होता है, तो विद्युत ऊर्जा ऊष्मा में बदल जाती है (तापीय प्रभाव), जिससे हीटर और प्रेस काम करते हैं। अंततः, कोई उपकरण कितनी तेजी से इस ऊर्जा का उपयोग करता है, वह उसकी शक्ति (वाट) कहलाती है।