विषय: रेलवे ग्रुप D – जीव विज्ञान (नियंत्रण जनन और आनुवंशिकता) अध्याय: 18.4 अलैंगिक जनन विषय-वस्तु: विखंडन, मुकुलन, वनस्पति प्रवर्धन
जनन वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपनी ही समानता वाली संतति उत्पन्न करते हैं। जनन के मूलभूत रूप से दो प्रकार होते हैं — अलैंगिक जनन और लैंगिक जनन। अलैंगिक जनन में केवल एक जीव भाग लेता है और कोई युग्मक (gamete) निर्मित नहीं होता। इसमें उत्पन्न संतति माता-पिता के समान ही होती है तथा इनमें आनुवंशिक विभिन्नता बहुत कम या नहीं होती। यह प्रक्रिया एकल-कोशिकीय जीवों तथा कई पादपों में प्रचलित है। अलैंगिक जनन के मुख्य प्रकार हैं — विखंडन, मुकुलन, बीजाणु निर्माण, पुनर्जनन और वनस्पति प्रवर्धन।
अलैंगिक जनन का मुख्य लाभ यह है कि यह तीव्र गति से होता है तथा अनुकूल परिस्थितियों में कम समय में बहुत अधिक संतति उत्पन्न हो जाती है। इसके लिए साथी की आवश्यकता नहीं होती। किंतु इसका एक प्रमुख दोष यह है कि इससे उत्पन्न संतति में आनुवंशिक विभिन्नता नहीं होती, इसलिए परिस्थितियों के बदलने पर पूरी आबादी एक साथ समाप्त हो सकती है। यही कारण है कि विकास की दृष्टि से लैंगिक जनन अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। अलैंगिक जनन विधियों का अध्ययन न केवल जीव विज्ञान की दृष्टि से आवश्यक है, बल्कि कृषि एवं बागवानी में भी इनका विशेष महत्व है।
अलैंगिक जनन की विधियों को समझने से जनन की बुनियादी अवधारणाएँ स्पष्ट होती हैं। अमीबा का द्विखंडन, यीस्ट और हाइड्रा का मुकुलन, ब्रायोफाइलम की पत्तियों पर कलिकाएँ, आलू के कंदों द्वारा प्रवर्धन तथा प्लैनेरिया का पुनर्जनन — ये सभी परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले प्रमुख उदाहरण हैं। आगे के अनुच्छेदों में प्रत्येक विधि का विस्तार से अध्ययन किया जाएगा, जिससे रेलवे ग्रुप D परीक्षा के लिए प्रश्नों का त्वरित उत्तर देना संभव हो सकेगा।
विखंडन अलैंगिक जनन की वह विधि है जिसमें एक जीव दो या दो से अधिक भागों में विभाजित होकर नए जीवों को जन्म देता है। विखंडन दो प्रकार का होता है:
विखंडन में जनन तीव्र होता है, जैसे जीवाणु अनुकूल परिस्थितियों में हर 20 मिनट में द्विखंडन कर सकते हैं। इसी कारण जीवाणुओं की संख्या में अत्यंत तीव्र वृद्धि होती है। अमीबा में विखंडन की प्रक्रिया में केन्द्रक का विभाजन कोशिका विभाजन से पहले होता है।
मुकुलन (Budding) वह विधि है जिसमें जनक जीव के शरीर पर एक छोटा सा उभार या कली (bud) बनता है। यह कली बढ़कर आकार में बड़ी होती जाती है और अंततः मूल जीव से अलग होकर एक नया जीव बन जाती है। मुकुलन के प्रमुख उदाहरण हैं — यीस्ट (खमीर) तथा हाइड्रा। यीस्ट में कली बनकर मूल कोशिका से अलग हो जाती है, जबकि हाइड्रा में कली धीरे-धीरे विकसित होकर पूर्ण हाइड्रा बनती है और तब अलग होती है। यदि कली अलग न होकर जुड़ी रहे तो कालोनी बन सकती है। उदाहरण के लिए:
इस प्रकार मुकुलन में भी केवल एक जीव भाग लेता है और संतति जनक के समान होती है।
बीजाणु निर्माण (Spore formation) में जीव छोटे-छोटे सूक्ष्म बीजाणु (spores) बनाता है, जो अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होकर नए जीव बनते हैं। ये बीजाणु कठोर आवरण से ढके होते हैं, इसलिए प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवित रह सकते हैं। उदाहरण — कवक (फफूँद), मॉस, फर्न तथा कुछ जीवाणु। राइज़ोपस (ब्रेड पर उगने वाला फफूँद) में स्पोरैन्जियम के अंदर बीजाणु बनते हैं। बीजाणु सूखने, उच्च ताप तथा कीटाणुनाशकों के प्रति अत्यंत प्रतिरोधी होते हैं।
पुनर्जनन (Regeneration) वह विधि है जिसमें किसी जीव का कोई कटा हुआ भाग अपनी खोई हुई संरचना को पुनः विकसित कर लेता है और संपूर्ण नया जीव बन जाता है। प्लैनेरिया और हाइड्रा इसके प्रमुख उदाहरण हैं। प्लैनेरिया को दो भागों में काटने पर प्रत्येक भाग से पूर्ण प्लैनेरिया विकसित होता है। यह क्षमता विशेष कोशिकाओं के तीव्र विभाजन के कारण होती है। हाइड्रा में भी कटे भाग से नया हाइड्रा बन जाता है। उदाहरण के लिए:
वनस्पति प्रवर्धन (Vegetative propagation) में पौधों के पुष्प रहित भागों — जड़, तना, पत्ती आदि — से नए पौधे उत्पन्न होते हैं। इसके प्रमुख उदाहरण हैं — आलू के कंद (tubers) से नए पौधे, गन्ने की कलमों से, प्याज के बल्ब से, ब्रायोफिलम की पत्ती के किनारों पर बनने वाली कलिकाओं से तथा स्ट्रॉबेरी के रनर (runner) द्वारा। वनस्पति प्रवर्धन कृषि में बहुत उपयोगी है क्योंकि इससे तीव्रता से तथा जनक के गुणों जैसी ही संतति प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए:
वनस्पति प्रवर्धन का उपयोग केले, अंगूर, गन्ना, गुलाब जैसे पौधों के उत्पादन में होता है, जिनके बीज व्यवहार्य नहीं होते या जिनमें बीज द्वारा जनन में देरी होती है।
अलैंगिक जनन की विभिन्न विधियों को उनके उदाहरणों के साथ समझना अत्यंत आवश्यक है। द्विखंडन अमीबा और जीवाणुओं में, बहुखंडन प्लाज़्मोडियम में, मुकुलन यीस्ट और हाइड्रा में, बीजाणु निर्माण कवक-फर्न में, पुनर्जनन प्लैनेरिया में तथा वनस्पति प्रवर्धन आलू-गन्ना-ब्रायोफिलम में पाया जाता है। परीक्षा में प्रायः ये प्रश्न पूछे जाते हैं कि किस जीव में कौन सी विधि होती है, इसलिए जीव और विधि का सही मिलान करना चाहिए।
अलैंगिक जनन की संतति को क्लोन कहा जाता है, क्योंकि वे जनक के सर्वथा समान होते हैं। इसमें युग्मकों का संलयन नहीं होता, इसलिए अनुवांशिक सामग्री में परिवर्तन नहीं आता। अपवाद स्वरूप कभी-कभी उत्परिवर्तन (mutation) के कारण परिवर्तन दिख सकता है, किंतु सामान्यतः अलैंगिक जनन आनुवंशिक रूप से एकरूप संतति देता है। उदाहरण के लिए:
इस प्रकार अलैंगिक जनन एकल-कोशिकीय जीवों से लेकर उच्च पादपों तक व्यापक रूप से पाया जाता है। इन विधियों का सही ज्ञान कृषि, चिकित्सा तथा जैव तकनीकी में भी महत्वपूर्ण है, जैसे जीवाणुओं के द्विखंडन की दर को समझकर संक्रमण नियंत्रण किया जाता है।
| विधि | प्रक्रिया | जीव/पौधा |
|---|---|---|
| द्विखंडन | एक कोशिका दो भागों में बँटती है | अमीबा, जीवाणु, पैरामीशियम |
| बहुखंडन | एक कोशिका अनेक भागों में बँटती है | प्लाज़्मोडियम |
| मुकुलन | शरीर पर कली बनती है | यीस्ट, हाइड्रा |
| बीजाणु निर्माण | सूक्ष्म बीजाणुओं से | कवक, फर्न, मॉस |
| पुनर्जनन | कटे भाग से नया जीव | प्लैनेरिया, हाइड्रा |
| वनस्पति प्रवर्धन | जड़/तना/पत्ती से | आलू, गन्ना, ब्रायोफिलम |
| लाभ | दोष |
|---|---|
| तीव्र गति से जनन | आनुवंशिक विभिन्नता का अभाव |
| साथी की आवश्यकता नहीं | बदलती परिस्थितियों में पूरी आबादी का खतरा |
| सरल प्रक्रिया | संतति में विकास की दर धीमी |
| अनुकूल परिस्थितियों में तेज़ वृद्धि | रोगों के प्रति समान संवेदनशीलता |
flowchart TD
A[18.4 अलैंगिक जनन] --> B[विखंडन]
A --> C[मुकुलन]
A --> D[बीजाणु निर्माण]
A --> E[पुनर्जनन]
A --> F[वनस्पति प्रवर्धन]
B --> B1[द्विखंडन - अमीबा]
B --> B2[बहुखंडन - प्लाज़्मोडियम]
C --> C1[यीस्ट]
C --> C2[हाइड्रा]
D --> D1[कवक]
D --> D2[फर्न]
E --> E1[प्लैनेरिया]
E --> E2[हाइड्रा]
F --> F1[आलू - कंद]
F --> F2[गन्ना - कलम]
F --> F3[ब्रायोफिलम - पत्ती]
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<text x="400" y="40" text-anchor="middle" font-size="26" font-weight="bold" fill="#1a237e">अमीबा में द्विखंडन</text>
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<text x="130" y="355" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">अमीबा</text>
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<text x="330" y="330" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">केन्द्रक द्विभाजन</text>
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<text x="615" y="380" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">दो नए अमीबा</text>
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<text x="70" y="566" font-size="15" fill="#000">स्वर्ण नियम: अमीबा में द्विखंडन किसी भी तल में तथा पैरामीशियम में अनुप्रस्थ तल में होता है।</text>
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<text x="400" y="40" text-anchor="middle" font-size="26" font-weight="bold" fill="#1a237e">हाइड्रा में मुकुलन</text>
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<text x="400" y="245" text-anchor="middle" font-size="14" fill="#000">मूल हाइड्रा</text>
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<text x="520" y="310" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">विकसित कली</text>
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<text x="70" y="566" font-size="15" fill="#000">स्वर्ण नियम: हाइड्रा में मुकुलन तथा पुनर्जनन दोनों अलैंगिक जनन विधियाँ हैं।</text>
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अलैंगिक जनन जनन की वह प्राचीन एवं सरल विधि है जिसमें एक जीव बिना युग्मकों के अपनी एकरूप संतति उत्पन्न करता है। विखंडन, मुकुलन, बीजाणु निर्माण, पुनर्जनन और वनस्पति प्रवर्धन इसकी प्रमुख विधियाँ हैं, जिनके जीव-उदाहरणों को याद रखना अत्यंत आवश्यक है। यह विधि तीव्र एवं सरल होते हुए भी आनुवंशिक विभिन्नता नहीं उत्पन्न करती, जिससे संतति पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील रहती है। वनस्पति प्रवर्धन कृषि में व्यापक उपयोगी है। इस अध्याय की समझ लैंगिक जनन के अगले अध्याय में जनन की अधिक उन्नत प्रक्रियाओं को समझने का आधार बनाती है।