विषय: रेलवे ग्रुप D – जीव विज्ञान (विकास और पर्यावरण) अध्याय: 19.6 ऊर्जा प्रवाह विषय-वस्तु: ऊर्जा प्रवाह, 10 प्रतिशत नियम
ऊर्जा प्रवाह (Energy Flow) पारितंत्र में सूर्य की ऊर्जा के उत्पादकों से शुरू होकर विभिन्न पोषी स्तरों के उपभोक्ताओं तक स्थानांतरित होने की वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा जीवों का जीवन और पारितंत्र की सारी क्रियाएं संचालित होती हैं। पारितंत्र में ऊर्जा का मूल स्रोत सूर्य है। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा को प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से भोजन की रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं, और यही ऊर्जा खाद्य श्रृंखला के माध्यम से विभिन्न जीवों में प्रवाहित होती रहती है। पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह हमेशा एक दिशीय होता है, अर्थात उत्पादक से उपभोक्ताओं की ओर।
ऊर्जा प्रवाह के साथ जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत दस प्रतिशत नियम (10 Percent Law) है, जिसे लिंडमैन ने प्रतिपादित किया था। इस नियम के अनुसार खाद्य श्रृंखला में एक पोषी स्तर से अगले पोषी स्तर तक पहुंचने वाली ऊर्जा की मात्रा लगभग दस प्रतिशत ही होती है, शेष नब्बे प्रतिशत ऊर्जा श्वसन, उत्सर्जन और अपच के रूप में नष्ट हो जाती है। यही कारण है कि खाद्य श्रृंखला में पोषी स्तरों की संख्या चार से पांच से अधिक नहीं हो पाती।
रेलवे ग्रुप D की जीव विज्ञान परीक्षा में ऊर्जा प्रवाह की दिशा, दस प्रतिशत नियम, ऊर्जा के स्रोत, ऊर्जा पिरामिड और ऊर्जा प्रवाह के प्रतिरूपों से प्रश्न पूछे जाते हैं। इस अध्याय में हम ऊर्जा प्रवाह की अवधारणा, दस प्रतिशत नियम की गणना, ऊर्जा पिरामिड तथा ऊर्जा प्रवाह के विभिन्न मॉडलों का अध्ययन करेंगे।
पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह सूर्य से प्रारंभ होकर उत्पादकों, फिर उपभोक्ताओं तक और अंत में अपघटकों तक एक निश्चित दिशा में होता है। यह प्रवाह कभी उल्टी दिशा में नहीं होता, इसलिए इसे एक दिशीय ऊर्जा प्रवाह (Unidirectional Energy Flow) कहते हैं।
ऊर्जा प्रवाह की मूल प्रक्रिया:
ऊर्जा प्रवाह की विशेषताएँ:
ऊर्जा प्रवाह के मॉडल: पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह को दर्शाने के लिए मुख्यतः तीन प्रतिरूप बनाए गए हैं – एक दिशीय प्रतिरूप, चक्रीय प्रतिरूप तथा वाई-आकार का प्रतिरूप (Y-Shaped Model)। वाई-आकार के प्रतिरूप में चारण श्रृंखला और अपरदी श्रृंखला दोनों से ऊर्जा प्रवाह दर्शाया जाता है।
दस प्रतिशत नियम के अनुसार खाद्य श्रृंखला में एक पोषी स्तर की कुल ऊर्जा का केवल लगभग दस प्रतिशत भाग ही अगले पोषी स्तर तक स्थानांतरित होता है। शेष नब्बे प्रतिशत ऊर्जा श्वसन, पाचन, उत्सर्जन, गति और शरीर की अन्य क्रियाओं में व्यय हो जाती है। इस नियम का प्रतिपादन रेमंड लिंडमैन ने 1942 में किया था।
दस प्रतिशत नियम की गणना:
दस प्रतिशत नियम के परिणाम:
ऊर्जा पिरामिड: पोषी स्तरों पर उपलब्ध ऊर्जा की मात्रा को क्रमबद्ध रूप से दर्शाने वाले चित्र को ऊर्जा पिरामिड कहते हैं। ऊर्जा पिरामिड सदैव सीधा (उल्टा कभी नहीं) होता है, क्योंकि प्रत्येक स्तर पर ऊर्जा घटती है। इसका आधार उत्पादक होता है और शीर्ष पर शीर्ष शिकारी स्थित होता है।
पारितंत्र की उत्पादकता सीधे तौर पर ऊर्जा प्रवाह से जुड़ी होती है। सूर्य की ऊर्जा जितनी अधिक मात्रा में उत्पादकों द्वारा अवशोषित होगी, पारितंत्र की प्राथमिक उत्पादकता उतनी ही अधिक होगी।
उत्पादकता के प्रकार:
ऊर्जा प्रवाह को प्रभावित करने वाले कारक:
ऊर्जा और पदार्थ चक्र में अंतर: पारितंत्र में ऊर्जा एक दिशा में बहती है और अंततः ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है, जबकि पदार्थ (जैसे कार्बन, नाइट्रोजन, जल) चक्रीय रूप में पुनः उपयोग होते हैं। यही मूल अंतर ऊर्जा प्रवाह और पदार्थ चक्र में है।
| पोषी स्तर | जीव | प्राप्त ऊर्जा (किलो कैलोरी) |
|---|---|---|
| प्रथम | उत्पादक | 10000 |
| द्वितीय | प्राथमिक उपभोक्ता | 1000 |
| तृतीय | द्वितीयक उपभोक्ता | 100 |
| चतुर्थ | तृतीयक उपभोक्ता | 10 |
| विशेषता | ऊर्जा प्रवाह | पदार्थ चक्र |
|---|---|---|
| प्रवाह की दिशा | एक दिशीय | चक्रीय |
| अंतिम अवस्था | ऊष्मा के रूप में हानि | पुनः उपयोग |
| मूल स्रोत | सूर्य | पृथ्वी के भंडार |
| प्रतिपादन | लिंडमैन का दस प्रतिशत नियम | विभिन्न जैव-भूरासायनिक चक्र |
flowchart TD
A[19.6 ऊर्जा प्रवाह] --> B[मूल स्रोत सूर्य]
A --> C[एक दिशीय प्रवाह]
A --> D[दस प्रतिशत नियम]
A --> E[ऊर्जा पिरामिड]
B --> F[प्रकाश संश्लेषण]
F --> G[उत्पादक]
G --> H[प्राथमिक उपभोक्ता]
H --> I[द्वितीयक उपभोक्ता]
I --> J[तृतीयक उपभोक्ता]
D --> K[श्वसन में हानि]
D --> L[उत्सर्जन में हानि]
E --> M[सीधा पिरामिड]
E --> N[आधार उत्पादक]
पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह सूर्य से प्रारंभ होकर उत्पादकों और फिर उपभोक्ताओं के विभिन्न पोषी स्तरों से होता हुआ ऊष्मा के रूप में समाप्त होता है, और यह प्रवाह हमेशा एक दिशीय होता है। दस प्रतिशत नियम यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक स्तर पर ऊर्जा घटती जाती है, जिसके कारण पोषी स्तर सीमित रहते हैं और ऊर्जा पिरामिड सीधा बनता है। रेलवे ग्रुप D की परीक्षा के लिए ऊर्जा प्रवाह की दिशा, दस प्रतिशत नियम की गणना और ऊर्जा पिरामिड के लक्षणों को स्पष्ट रूप से समझना ही इस अध्याय से अधिकतम अंक प्राप्त करने की कुंजी है।