विषय: रेलवे NTPC – सामान्य जागरूकता (आधुनिक भारतीय इतिहास) अध्याय: 13.2 ब्रिटिश शासन की स्थापना विषय-वस्तु: प्लासी, बक्सर, कंपनी राज
भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना की नींव बंगाल में पड़ी। 1757 के प्लासी के युद्ध और 1764 के बक्सर के युद्ध की विजय ने ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारी से राजनीतिक शक्ति में बदल दिया। 1765 में दीवानी प्राप्त करने के बाद कंपनी ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा के राजस्व पर नियंत्रण कर लिया, जिससे 'कंपनी राज' का आरंभ हुआ।
इस अध्याय में हम प्लासी और बक्सर युद्धों के कारण, कंपनी द्वारा स्थापित प्रशासनिक ढाँचा, द्वैध शासन, विभिन्न गवर्नर-जनरलों के सुधार तथा 1857 तक कंपनी के विस्तार का अध्ययन करेंगे। यह अध्याय रेलवे NTPC परीक्षा में तिथियों और घटनाओं पर आधारित प्रश्नों का प्रमुख स्रोत है।
ब्रिटिश शासन की स्थापना केवल सैन्य विजय तक सीमित नहीं रही। कंपनी ने कानून, राजस्व, सेना और न्याय प्रणाली को नियंत्रित कर एक पूर्ण राज्य के रूप में अपनी स्थिति सुदृढ़ की। धीरे-धीरे पूरा भारत कंपनी के अधीन आ गया, और 1858 में क्राउन ने सीधे शासन अपने हाथ में ले लिया।
प्लासी का युद्ध (23 जून, 1757): यह युद्ध बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच लड़ा गया। इसके कारण थे: नवाब द्वारा अंग्रेजों के किलेबंदी पर आपत्ति, फोर्ट विलियम पर हमला (ब्लैक होल ट्रैजेडी, 1756), तथा अंग्रेजों द्वारा कलकत्ता पर पुनः कब्जा (1757)।
बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर, 1764): इस युद्ध में अंग्रेजों का सामना बंगाल के नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना से हुआ।
द्वैध शासन (Dual Government, 1765-1772): दीवानी के बाद क्लाइव ने बंगाल में द्वैध शासन लागू किया, जिसमें राजस्व अंग्रेजों के हाथ में और प्रशासन नवाब के हाथ में था। यह व्यवस्था किसानों और शासन के लिए घातक साबित हुई; 1770 में भीषण अकाल (महादुर्भिक्ष) आया। 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन समाप्त कर दिया।
वारेन हेस्टिंग्स (1772-1785): प्रथम गवर्नर-जनरल (1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के बाद)। उसने द्वैध शासन समाप्त किया, न्याय व्यवस्था (दीवानी एवं फौजदारी अदालतें) सुधारी, और 1774 में अभिनव बंगाल का भ्रम नहीं बल्कि पहला अंग्रेजी-अरबी-फारसी संबंधों से जुड़ा कार्य किया। वह रोहिल्ला युद्ध (1774) के कारण विवादास्पद रहा।
लॉर्ड कॉर्नवालिस (1786-1793): 'भारत में ब्रिटिश सिविल सेवा के जनक' कहे जाते हैं।
लॉर्ड वेलेजली (1798-1805): 'सहायक संधि प्रणाली' (Subsidiary Alliance) का प्रवर्तक।
लॉर्ड हेस्टिंग्स (1813-1823): आंग्ल-गोरखा युद्ध (1813-15, सुगौली की संधि 1816), पिण्डारियों का दमन, और आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त किए। ब्रिटिश शक्ति हिमालय से कन्याकुमारी तक फैल गई।
लॉर्ड डलहौजी (1848-1856): 'व्यपगत सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) लागू किया जिससे बिना पुत्र वाले राज्यों को कंपनी में मिला लिया गया (सतारा 1848, झाँसी 1853, नागपुर 1854)।
अन्य गवर्नर-जनरल (संक्षेप): 1. सर जॉन शोर (1793-98) – अधिक हस्तक्षेप नहीं 2. लॉर्ड मिंटो प्रथम (1807-13) – सिख संधि (1809) 3. लॉर्ड अम्हर्स्ट (1823-28) – बर्मा का प्रथम युद्ध (1824-26, यांडाबू की संधि) 4. विलियम बेंटिंक (1828-35) – सती प्रथा उन्मूलन (1829), मैकॉले का शिक्षा घोषणापत्र (1835) 5. लॉर्ड ऑकलैंड (1836-42) – प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1838-42) 6. लॉर्ड एलनबरो (1842-44) – अफगानों से सिंध पर विजय (1843) 7. लॉर्ड हार्डिंग प्रथम (1844-48) – प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845-46, लाहौर की संधि) 8. लॉर्ड कैनिंग (1856-62) – 1857 का विद्रोह, भारत का प्रथम वायसराय
कंपनी राज के दौरान कंपनी ने विभिन्न अधिनियमों के माध्यम से अपने शासन को वैधानिक रूप दिया।
आर्थिक प्रभाव (शोषण के रूप): 1. राजस्व वसूली: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी (मद्रास, बंबई – थॉमस मुनरो) और महालवाड़ी (उत्तर पश्चिम – हॉल्ट मैकेंज़ी) प्रणालियाँ लागू की गईं। 2. किसानों की दुर्दशा: नील, सूती वस्त्र और अफीम की बागान अर्थव्यवस्था; 1770 का बंगाल अकाल जिसमें करोड़ों की मृत्यु हुई। 3. हस्तशिल्प का पतन: अंग्रेजी मशीनी वस्त्रों ने भारतीय हस्तशिल्प उद्योग को नष्ट किया। 4. व्यापार नीति: कंपनी के अधिकारियों की निजी व्यापार से भरमार, और देशी शासकों से 'महत्वपूर्ण वार्षिकी' माँगना।
सैन्य विस्तार: कंपनी ने सिपाहियों की बड़ी सेना खड़ी की, जो कंपनी राज की रीढ़ बनी। बंगाल सेना, बंबई सेना, मद्रास सेना तीन प्रेसीडेंसी सेनाएँ थीं। विदेशी युद्धों (अफगान, सिख, बर्मा) में भी कंपनी सफल रही। अंततः इन्हीं सिपाहियों का असंतोष 1857 के विद्रोह में बदल गया।
| तत्व | प्लासी (1757) | बक्सर (1764) |
|---|---|---|
| विरोधी | सिराजुद्दौला | मीर कासिम, शुजाउद्दौला, शाह आलम द्वितीय |
| अंग्रेज नेतृत्व | रॉबर्ट क्लाइव | हेक्टर मुनरो |
| निर्णायक कारक | मीर जाफर का विश्वासघात | सैनिक श्रेष्ठता |
| संधि/परिणाम | मीर जाफर नवाब, 24 परगना | इलाहाबाद की संधि 1765, दीवानी |
| गवर्नर-जनरल | काल | प्रमुख कार्य/घटना |
|---|---|---|
| वारेन हेस्टिंग्स | 1772-85 | द्वैध शासन अंत, रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 |
| कॉर्नवालिस | 1786-93 | स्थायी बंदोबस्त 1793 |
| वेलेजली | 1798-1805 | सहायक संधि प्रणाली, टीपू की मृत्यु 1799 |
| विलियम बेंटिंक | 1828-35 | सती प्रथा उन्मूलन 1829, शिक्षा घोषणापत्र 1835 |
| डलहौजी | 1848-56 | व्यपगत सिद्धांत, रेलवे 1853, अवध विलय 1856 |
flowchart TD
A[ब्रिटिश शासन की स्थापना] --> B[प्लासी 1757]
A --> C[बक्सर 1764]
B --> B1[सिराजुद्दौला पराजित]
B --> B2[मीर जाफर नवाब]
C --> C1[इलाहाबाद संधि 1765]
C --> C2[दीवानी बंगाल बिहार उड़ीसा]
C2 --> D[द्वैध शासन 1765-72]
D --> E[वारेन हेस्टिंग्स 1772]
A --> F[गवर्नर-जनरल सुधार]
F --> G[रेग्युलेटिंग एक्ट 1773]
F --> H[स्थायी बंदोबस्त 1793]
F --> I[सहायक संधि प्रणाली]
F --> J[व्यपगत सिद्धांत]
J --> K[1857 विद्रोह की ओर]
ब्रिटिश शासन की स्थापना प्लासी की कूटनीतिक विजय, बक्सर की सैन्य विजय और दीवानी के माध्यम से राजस्व नियंत्रण की त्रिवेणी से संपन्न हुई। द्वैध शासन से लेकर रेग्युलेटिंग एक्ट तक कंपनी ने अपने प्रशासनिक तंत्र को मजबूत किया और विभिन्न गवर्नर-जनरलों के कार्यकाल में पूरे भारत को अपने अधीन कर लिया। राजस्व प्रणालियों, विधायी अधिनियमों और सैन्य विस्तार ने कंपनी राज को सुदृढ़ किया, पर साथ ही सामाजिक-आर्थिक असंतोष की जड़ें भी गहरी होती गईं, जो अंततः 1857 के विद्रोह में फूटीं। इन तिथियों और घटनाओं की सटीक पुनरावृत्ति ही NTPC परीक्षा में सफलता दिला सकती है।