विषय: रेलवे NTPC – सामान्य जागरूकता (भारतीय राजव्यवस्था) अध्याय: 15.2 प्रस्तावना विषय-वस्तु: प्रस्तावना, मूल्य
प्रस्तावना संविधान का परिचय है, जिसमें संविधान के मूल आदर्श, लक्ष्य और दर्शन का वर्णन है। इसे 'संविधान की कुंजी', 'संविधान की आत्मा' या 'संविधान का प्रवेश द्वार' कहा जाता है। प्रस्तावना संविधान की विचारधारा को प्रस्तुत करती है तथा यह बताती है कि संविधान का निर्माण भारत के लोगों ने स्वयं अपने लिए किया है। यह 'हम भारत के लोग' शब्दों से प्रारंभ होती है, जो जनता की सर्वोच्चता को दर्शाता है।
प्रस्तावना के मूल स्रोत पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को प्रस्तुत 'उद्देश्य प्रस्ताव' को माना जाता है। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा प्रस्तावना को अंगीकृत किया गया। मूल प्रस्तावना में भारत को 'संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य' कहा गया था, परंतु 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा इसमें 'समाजवादी', 'धर्मनिरपेक्ष' तथा 'अखंडता' शब्द जोड़े गए। प्रस्तावना को अंतिम रूप देने में लगभग 114 दिन लगे थे।
प्रस्तावना केवल एक घोषणा मात्र नहीं है; यह संविधान के प्रत्येक प्रावधान की व्याख्या का आधार है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न वादों में प्रस्तावना की स्थिति स्पष्ट की है। रेलवे NTPC परीक्षा में प्रस्तावना के शब्दों, संशोधन, तथा न्यायिक फैसलों से संबंधित प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं, इसलिए इस अध्याय की संपूर्ण समझ आवश्यक है।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना इस प्रकार है: "हम, भारत के लोग, भारत को एक संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त कराने के लिए; तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुत्व बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर, अपनी इस संविधान सभा में आज तिथि 26 नवंबर 1949 ई. को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"
प्रस्तावना में वर्णित मूल्य: 1. न्याय (जस्टिस): सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय। 2. स्वतंत्रता (लिबर्टी): विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता। 3. समानता (इक्वैलिटी): प्रतिष्ठा की समानता तथा अवसर की समानता। 4. बंधुत्व (फ्रैटर्निटी): व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करना।
प्रस्तावना पर केवल एक बार संशोधन हुआ है। 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा प्रस्तावना में तीन शब्द जोड़े गए: - समाजवादी - 'संप्रभु' के बाद जोड़ा गया। - धर्मनिरपेक्ष - 'समाजवादी' के बाद जोड़ा गया। - अखंडता - 'एकता' के बाद जोड़ा गया, अर्थात 'राष्ट्र की एकता और अखंडता'।
इस संशोधन का उद्देश्य भारत के समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष चरित्र को स्पष्ट करना था। प्रस्तावना में संशोधन संसद अनुच्छेद 368 के तहत कर सकती है, परंतु सर्वोच्च न्यायालय के मूल ढाँचा सिद्धांत के अनुसार प्रस्तावना की मूल विशेषताएँ, जैसे गणतंत्रात्मक सरकार, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक-आर्थिक न्याय आदि को समाप्त नहीं किया जा सकता।
प्रस्तावना पर महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले: 1. बेरुबारी संघ वाद (1960): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है। 2. केशवानंद भारती वाद (1973): न्यायालय ने पूर्व निर्णय बदलते हुए कहा कि प्रस्तावना संविधान का अंग है तथा अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन की जा सकती है। 3. LIC ऑफ इंडिया वाद (1995): न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का भाग है, किंतु इसे लागू करने योग्य प्रावधान नहीं माना जा सकता; इसका महत्व व्याख्या में है।
त्वरित तथ्य: 1. प्रस्तावना में प्रयुक्त शब्दों की मौलिकता उद्देश्य प्रस्ताव से ली गई है। 2. प्रस्तावना में 'ईश्वर के नाम पर' अथवा 'भगवान के नाम पर' शब्द अनुपस्थित हैं। 3. प्रस्तावना में मित्रों और दुश्मनों का कोई उल्लेख नहीं है। 4. प्रस्तावना की तिथि 26 नवंबर 1949 दर्शाई गई है। 5. प्रस्तावना न्यायालय में वाद-योग्य (जस्टिसिएबल) नहीं है।
प्रस्तावना संविधान की व्याख्या में सहायक है। जब किसी अनुच्छेद का अर्थ अस्पष्ट हो, तो न्यायालय प्रस्तावना की सहायता से उसकी व्याख्या करता है। प्रस्तावना निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण है: - यह संविधान के स्रोत (जनता) को स्पष्ट करती है। - यह संविधान के अधीन सरकार की प्रकृति (लोकतांत्रिक, गणतांत्रिक, संसदीय) बताती है। - यह राज्य के उद्देश्यों तथा नागरिकों के अधिकारों का संकेत देती है। - यह संविधान निर्माताओं की मानसिकता (उद्देश्य प्रस्ताव) को प्रकट करती है।
प्रस्तावना में वर्णित चार मूल्यों का वर्णन निम्न प्रकार से समझा जा सकता है: 1. सामाजिक न्याय: सभी को समाज में समान स्थान तथा सामाजिक असमानताओं का अंत। 2. आर्थिक न्याय: आय, संपत्ति तथा आर्थिक अवसरों में समानता। 3. राजनीतिक न्याय: सभी को समान राजनीतिक अधिकार तथा राजनीति में भागीदारी। 4. व्यक्ति की गरिमा: प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार।
प्रस्तावना का 'गणराज्य' शब्द बताता है कि भारत में राष्ट्रपति पद वंशानुगत नहीं है। 'लोकतांत्रिक' शब्द राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक लोकतंत्र की ओर भी संकेत करता है। प्रस्तावना 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द के माध्यम से यह सुनिश्चित करती है कि राज्य किसी धर्म से जुड़ा नहीं है, बल्कि सभी धर्मों को संरक्षण देता है। रेलवे परीक्षाओं में प्रस्तावना के किसी शब्द का अर्थ, संशोधन से जुड़ा प्रश्न तथा न्यायिक फैसलों पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए इनका क्रमबद्ध अध्ययन आवश्यक है।
| मूल्य | अर्थ / विवरण |
|---|---|
| न्याय | सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक |
| स्वतंत्रता | विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना |
| समानता | प्रतिष्ठा और अवसर की समानता |
| बंधुत्व | व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता और अखंडता |
| संप्रभु | बाह्य नियंत्रण से स्वतंत्र |
| समाजवादी | सामाजिक-आर्थिक समानता |
| धर्मनिरपेक्ष | राज्य और धर्म का पृथक्करण |
| लोकतांत्रिक | जनता द्वारा चुनी सरकार |
| गणराज्य | निर्वाचित राष्ट्रप्रमुख |
| वाद | वर्ष | निर्णय |
|---|---|---|
| बेरुबारी संघ वाद | 1960 | प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है |
| केशवानंद भारती वाद | 1973 | प्रस्तावना संविधान का अंग है, संशोधन योग्य |
| LIC ऑफ इंडिया वाद | 1995 | प्रस्तावना व्याख्या में सहायक है, वाद-योग्य नहीं |
flowchart TD
A[प्रस्तावना] --> B[स्रोत: उद्देश्य प्रस्ताव 1946]
A --> C[42वाँ संशोधन 1976]
A --> D[चार मूल्य]
A --> E[न्यायिक स्थिति]
C --> C1[समाजवादी]
C --> C2[धर्मनिरपेक्ष]
C --> C3[अखंडता]
D --> D1[न्याय]
D --> D2[स्वतंत्रता]
D --> D3[समानता]
D --> D4[बंधुत्व]
E --> E1[बेरुबारी 1960]
E --> E2[केशवानंद 1973]
E --> E3[LIC वाद 1995]
प्रस्तावना भारतीय संविधान की आत्मा है, जो देश के मूल आदर्शों और उद्देश्यों को प्रस्तुत करती है। इसमें निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य संविधान के प्रत्येक प्रावधान का आधार हैं। 42वें संशोधन से जोड़े गए समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता शब्दों के साथ विभिन्न न्यायिक वादों की समझ रेलवे NTPC परीक्षा के प्रश्नों को सटीक हल करने में सहायक है, अतः इस अध्याय का गहन अध्ययन आवश्यक है।