विषय: रेलवे NTPC – सामान्य जागरूकता (भारतीय राजव्यवस्था) अध्याय: 15.3 मौलिक अधिकार विषय-वस्तु: अनुच्छेद 12-35, अधिकार
मौलिक अधिकार संविधान के भाग 3 (अनुच्छेद 12 से 35) में वर्णित हैं। ये अधिकार नागरिकों के व्यक्तिगत विकास, गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं तथा राज्य की मनमानी सत्ता पर रोक लगाते हैं। मौलिक अधिकार न्यायालय द्वारा लागू किए जा सकते हैं, अर्थात इनके उल्लंघन पर नागरिक सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय में जा सकता है। मौलिक अधिकारों को संविधान का 'मैग्ना कार्टा' कहा जाता है।
मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, जिसमें संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31) भी शामिल था। परंतु 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया और इसे संविधान के भाग 12 में अनुच्छेद 300क के तहत एक विधिक अधिकार बना दिया गया। वर्तमान में छह मौलिक अधिकार प्रचलन में हैं। रेलवे NTPC परीक्षा में अनुच्छेदों के नंबर, अधिकारों के विवरण, रिटों तथा प्रमुख वादों पर आधारित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
मौलिक अधिकार राज्य और व्यक्ति दोनों के बीच संबंध स्थापित करते हैं। अनुच्छेद 12 में 'राज्य' की परिभाषा दी गई है, जिसमें भारत की सरकार, संसद, राज्य सरकारें, विधानमंडल, स्थानीय निकाय तथा भारत में कार्यरत स्थानीय या अन्य प्राधिकारी शामिल हैं। मौलिक अधिकारों का अध्ययन अनुच्छेद क्रम में करना अत्यंत लाभदायक होता है, क्योंकि प्रश्न प्रायः सीधे अनुच्छेद संख्या से जुड़े होते हैं।
मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, परंतु वर्तमान में छह हैं। उनका विवरण इस प्रकार है:
त्वरित तथ्य: 1. मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे; 44वें संशोधन से संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31) हटाया गया। 2. संपत्ति का अधिकार अब अनुच्छेद 300क के तहत विधिक अधिकार है। 3. अनुच्छेद 21क के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा का अधिकार है (86वाँ संशोधन, 2002)। 4. अस्पृश्यता को समाप्त करने वाला अनुच्छेद 17 है। 5. समानता का अधिकार अनुच्छेद 14 से 18 तक है।
समानता का अधिकार: - अनुच्छेद 14 में 'विधि के समक्ष समानता' और 'विधियों का समान संरक्षण' दोनों शामिल हैं। 'विधि के समक्ष समानता' ब्रिटिश अवधारणा है जबकि 'समान संरक्षण' अमेरिकी संविधान से ली गई है। - अनुच्छेद 15 में राज्य द्वारा धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध है। खंड (3) महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान की अनुमति देता है; खंड (4) पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करता है तथा खंड (5) शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश हेतु आरक्षण की अनुमति देता है। - अनुच्छेद 16 में सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता है, जिसमें निवास-संबंधी आवश्यकताओं पर भी प्रतिबंध है। - अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है और इसे किसी भी रूप में प्रचलित करना दंडनीय है। - अनुच्छेद 18 सैन्य तथा शैक्षिक उपाधियों के अपवाद के साथ उपाधियों को समाप्त करता है।
स्वतंत्रता का अधिकार: - अनुच्छेद 19 के अंतर्गत छह स्वतंत्रताएँ हैं: वाक् और अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण बिना हथियार सभा, संघ या समिति बनाना, देश में कहीं भी आने-जाने, भारत के किसी भी भाग में निवास, तथा कोई भी व्यवसाय या पेशा अपनाना। मूल संविधान में सातवीं स्वतंत्रता (संपत्ति रखना) थी जो 44वें संशोधन से हटा दी गई। - अनुच्छेद 20 में तीन संरक्षण हैं: पूर्वव्यापी कानून (एक्स पोस्ट फैक्टो) के आधार पर दोषसिद्धि नहीं; एक ही अपराध के लिए दो बार दंड नहीं (दोहरा संकट); तथा आत्म-दोषारोपण नहीं। - अनुच्छेद 21 कहता है कि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी भी व्यक्ति को जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। मनका गांधी वाद (1978) में 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' की 'उचित प्रक्रिया' के रूप में व्यापक व्याख्या हुई। - अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी, हिरासत तथा निवारक नजरबंदी से संरक्षण देता है।
अन्य अधिकार: - अनुच्छेद 23 बेगार तथा मानव तस्करी का निषेध करता है; अनुच्छेद 24 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों या खतरनाक उद्योगों में काम पर लगाने का निषेध करता है। - अनुच्छेद 25 अंत:करण की स्वतंत्रता तथा धर्म का स्वतंत्र रूप से प्रचार करने का अधिकार देता है। - अनुच्छेद 26 प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार देता है। - अनुच्छेद 27 कहता है कि किसी विशेष धर्म के प्रचार हेतु कर नहीं लगाया जाएगा। - अनुच्छेद 28 राज्य से वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थाओं में धार्मिक निर्देशों का निषेध करता है। - अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपनी शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित करने और उनका प्रशासन चलाने का अधिकार देता है। - अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय रिट जारी कर सकता है। प्रमुख रिटें हैं: बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस), परमादेश (मैंडेमस), प्रतिषेध (प्रोहिबिशन), उत्प्रेषण (सर्टियोरेरी) तथा अधिकार पृच्छा (क्वो वारंटो)।
उदाहरण: 1. हैबियस कॉर्पस से अवैध हिरासत में बंद व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। 2. मैंडेमस से लोक प्राधिकारी को अपना कर्तव्य पालन करने का आदेश दिया जाता है। 3. प्रोहिबिशन अधीनस्थ न्यायालय को कार्यवाही रोकने का आदेश है। 4. सर्टियोरेरी उच्च न्यायालय द्वारा निम्न न्यायालय के मामले को स्थानांतरित करने का आदेश है। 5. क्वो वारंटो से अवैध रूप से पद पर बैठे व्यक्ति की पदावधि के आधार पर जाँच होती है।
मौलिक अधिकारों की प्रकृति की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं: - ये न्यायालय द्वारा लागू करने योग्य (जस्टिसिएबल) हैं। - कुछ अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त हैं (अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30), जबकि कुछ सभी व्यक्तियों को प्राप्त हैं (अनुच्छेद 14, 20, 21, 22, 23, 25)। - अनुच्छेद 13 के अनुसार मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई भी कानून शून्य (वॉयड) होगा। - मौलिक अधिकार पूर्ण नहीं हैं; इन पर विधि द्वारा उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। - संसद इनमें संशोधन कर सकती है, परंतु मूल ढाँचे को नुकसान नहीं पहुँचा सकती।
आपातकालीन प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएँ स्वतः निलंबित हो जाती हैं। अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रपति मौलिक अधिकारों को लागू करने वाली न्यायालय की शक्ति निलंबित कर सकता है। परंतु 44वें संशोधन के बाद अनुच्छेद 20 और 21 को किसी भी परिस्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता।
मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्वों में अंतर समझना आवश्यक है: मौलिक अधिकार ऋणात्मक अधिकार हैं (राज्य की ओर से बाध्यता), न्यायिक हैं, अनुच्छेद 12-35 में हैं, सर्वोच्च न्यायालय लागू करता है; जबकि नीति-निदेशक तत्व धनात्मक निर्देश हैं, गैर-न्यायिक हैं, अनुच्छेद 36-51 में हैं। कुछ मामलों में (मिनर्वा मिल्स वाद 1980) न्यायालय ने कहा कि अधिकारों और निदेशक तत्वों के बीच सामंजस्य होना चाहिए।
महत्वपूर्ण वाद: 1. मनका गांधी वाद (1978): अनुच्छेद 21 में 'उचित प्रक्रिया' का समावेश हुआ। 2. ए.के. गोपालन वाद (1950): अनुच्छेद 21 की संकीर्ण व्याख्या। 3. के.एस. पुट्टास्वामी वाद (2017): निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 का मूल अंग घोषित। 4. मिनर्वा मिल्स वाद (1980): मूल ढाँचा सिद्धांत की पुष्टि। 5. गोलकनाथ वाद (1967): मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं किया जा सकता (बाद में बदला गया)।
| मौलिक अधिकार | अनुच्छेद |
|---|---|
| समानता का अधिकार | 14-18 |
| स्वतंत्रता का अधिकार | 19-22 |
| शोषण के विरुद्ध अधिकार | 23-24 |
| धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार | 25-28 |
| सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार | 29-30 |
| संवैधानिक उपचारों का अधिकार | 32 |
| रिट | अर्थ |
|---|---|
| बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) | अवैध हिरासत से मुक्ति |
| परमादेश (मैंडेमस) | लोक अधिकारी को कर्तव्य पालन का आदेश |
| प्रतिषेध (प्रोहिबिशन) | अधीनस्थ न्यायालय को कार्यवाही रोकना |
| उत्प्रेषण (सर्टियोरेरी) | निम्न न्यायालय का मामला स्थानांतरित करना |
| अधिकार पृच्छा (क्वो वारंटो) | पद की वैधता की जाँच |
flowchart TD
A[मौलिक अधिकार 12-35] --> B[समानता 14-18]
A --> C[स्वतंत्रता 19-22]
A --> D[शोषण विरोधी 23-24]
A --> E[धार्मिक 25-28]
A --> F[सांस्कृतिक 29-30]
A --> G[संवैधानिक उपचार 32]
B --> B1[विधि के समक्ष समानता]
B --> B2[अस्पृश्यता उन्मूलन]
C --> C1[छह स्वतंत्रताएँ]
C --> C2[जीवन और स्वतंत्रता 21]
D --> D1[बेगार का निषेध 23]
E --> E1[अंत:करण की स्वतंत्रता 25]
G --> G1[पाँच रिटें]
G --> G2[संविधान की आत्मा]
मौलिक अधिकार भारतीय संविधान के भाग 3 (अनुच्छेद 12-35) में निहित हैं, जो नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा प्रदान करते हैं तथा राज्य की मनमानी पर अंकुश लगाते हैं। इन अधिकारों की अनुच्छेद संख्या, रिटों, प्रमुख न्यायिक वादों तथा आपातकालीन प्रावधानों की सटीक समझ रेलवे NTPC परीक्षा में निश्चित सफलता दिलाती है, अतः इनकी नियमित पुनरावृत्ति अत्यंत आवश्यक है।