विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: जीव विज्ञान – नियंत्रण जनन और आनुवंशिकता विषय-वस्तु: 18.9 गुणसूत्र और मेंडल के नियम
आनुवंशिकी के अध्ययन में गुणसूत्रों की संरचना तथा मेंडल के नियमों का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में गुणसूत्रों की संख्या, लिंग निर्धारण तथा मेंडल के वर्गीकरण के नियमों से संबंधित प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं। गुणसूत्र (chromosome) कोशिका के केंद्रक में उपस्थित सूत्र जैसी संरचनाएँ हैं, जिन पर जीन व्यवस्थित रूप से स्थित होते हैं। प्रत्येक प्रजाति में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित होती है। मानव में 46 गुणसूत्र होते हैं, जो 23 जोड़ों में व्यवस्थित होते हैं। इन जोड़ों में से 22 जोड़े ऑटोसोम तथा 1 जोड़ा लिंग गुणसूत्र होता है।
मेंडल के नियम आनुवंशिकी के मूलभूत नियम हैं, जो गुणों के संचरण की व्याख्या करते हैं। ग्रेगोर मेंडल ने मटर के पौधे पर सात विपरीत लक्षणों के साथ क्रॉस (संकरण) करके तीन मुख्य नियम प्रतिपादित किए — प्रभाविता का नियम, पृथक्करण का नियम तथा स्वतंत्र अपवंटन का नियम। मेंडल को आनुवंशिकी का जनक कहा जाता है। उन्होंने एक जीन वाले क्रॉस (monohybrid cross) और दो जीन वाले क्रॉस (dihybrid cross) के माध्यम से इन नियमों की स्थापना की। रेलवे परीक्षा में मेंडल के नियमों के नाम तथा अनुपात (जैसे 3:1 और 9:3:3:1) प्रायः पूछे जाते हैं।
इस अध्याय में हम गुणसूत्रों की संरचना, प्रकार तथा संख्या, लिंग निर्धारण की प्रक्रिया, मेंडल के तीन नियमों की विस्तृत व्याख्या तथा मेंडल के प्रयोगों की विधि का अध्ययन करेंगे। साथ ही मोनोहाइब्रिड तथा डायहाइब्रिड क्रॉस के अनुपातों को समझेंगे। ये अवधारणाएँ आनुवंशिकता के पूर्ण अध्ययन का आधार हैं। इन तथ्यों की पकड़ परीक्षा में निश्चित अंक दिलाती है।
गुणसूत्र की संरचना: गुणसूत्र केंद्रक में उपस्थित धागे जैसी संरचना है जो डीएनए तथा प्रोटीन (हिस्टोन) से बनी होती है। विभाजन के समय गुणसूत्र स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र का एक संकुचित बिंदु होता है, जिसे सेंट्रोमियर (centromere) कहते हैं। सेंट्रोमियर गुणसूत्र को दो भुजाओं में विभाजित करता है। सेंट्रोमियर की स्थिति के आधार पर गुणसूत्र मेटासेंट्रिक, सबमेटासेंट्रिक, एक्रोसेंट्रिक तथा टेलोसेंट्रिक प्रकार के होते हैं। गुणसूत्र की स्थिति जीन का स्थान (locus) कहलाती है।
गुणसूत्रों के प्रकार: मानव में 23 जोड़े गुणसूत्र होते हैं। इनमें 22 जोड़े ऑटोसोम (autosomes) होते हैं, जो नर तथा मादा दोनों में समान होते हैं। एक जोड़ा लिंग गुणसूत्र (sex chromosomes) होता है, जो लिंग का निर्धारण करता है। स्त्रियों में दोनों लिंग गुणसूत्र समान (XX) होते हैं, जबकि पुरुषों में दो अलग-अलग (XY) होते हैं। गुणसूत्रों की पूर्ण संख्या को द्विगुणित (2n) कहते हैं, जो मनुष्य में 46 है। युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या आधी (अगुणित, n = 23) होती है।
गुणसूत्रों की भूमिका: गुणसूत्र आनुवंशिक सूचना को ले जाते हैं। ये कोशिका विभाजन के समय समान रूप से विभाजित होते हैं, जिससे संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या समान रहती है। माइटोसिस में गुणसूत्र संख्या समान रहती है, जबकि अर्धसूत्री विभाजन में आधी हो जाती है। गुणसूत्रों की संख्या निश्चित होना ही प्रजाति की पहचान का आधार है। रेलवे परीक्षा में मनुष्य में गुणसूत्रों की संख्या 46 प्रायः पूछी जाती है।
लिंग निर्धारण (Sex Determination): मनुष्य में लिंग का निर्धारण लिंग गुणसूत्रों द्वारा होता है। स्त्री में दोनों लिंग गुणसूत्र X होते हैं (XX), इसलिए स्त्री के सभी अंडाणुओं में X गुणसूत्र होता है। पुरुष में एक X तथा एक Y गुणसूत्र होता है (XY), इसलिए पुरुष के शुक्राणुओं में आधे X तथा आधे Y गुणसूत्र होते हैं। यदि अंडाणु का निषेचन X वाले शुक्राणु से होता है तो संतान स्त्री (XX) होती है, तथा यदि Y वाले शुक्राणु से होता है तो संतान पुरुष (XY) होती है। अतः लिंग का निर्धारण पिता के शुक्राणु द्वारा होता है। रेलवे परीक्षा में यह तथ्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
प्रभाविता का नियम (Law of Dominance): इस नियम के अनुसार, जब विपरीत लक्षणों वाले दो शुद्ध जीवों के बीच संकरण कराया जाता है, तो पहली पीढ़ी (F1) में केवल एक ही लक्षण (प्रमुख लक्षण) प्रकट होता है। उदाहरण के लिए, लंबे (TT) और बौने (tt) मटर के पौधों के बीच संकरण कराने पर F1 पीढ़ी के सभी पौधे लंबे (Tt) होते हैं। यहाँ लंबा लक्षण प्रमुख है तथा बौना लक्षण अप्रमुख है। प्रमुख लक्षण F1 पीढ़ी में व्यक्त होता है, जबकि अप्रमुख लक्षण दबा रहता है।
पृथक्करण का नियम (Law of Segregation): इस नियम के अनुसार, युग्मक निर्माण के समय जीनों की जोड़ी (एलील) अलग-अलग हो जाती है, तथा प्रत्येक युग्मक में केवल एक ही एलील जाता है। इस प्रकार F1 पीढ़ी के पौधे (Tt) युग्मक बनाते समय T और t को अलग कर देते हैं। इनके आत्म-परागण से F2 पीढ़ी में लंबे और बौने पौधों का अनुपात 3:1 होता है। पृथक्करण का नियम यह बताता है कि लक्षण युग्मकों में मिश्रित नहीं होते, बल्कि अलग-अलग रहते हैं।
स्वतंत्र अपवंटन का नियम (Law of Independent Assortment): इस नियम के अनुसार, दो या दो से अधिक लक्षणों के जीनों का वितरण एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से होता है। अर्थात, एक लक्षण के जीन का युग्मक में प्रवेश दूसरे लक्षण के जीन के प्रवेश को प्रभावित नहीं करता। डायहाइब्रिड क्रॉस में यह नियम लागू होता है, जिसमें F2 पीढ़ी में फेनोटाइप का अनुपात 9:3:3:1 होता है। रेलवे परीक्षा में डायहाइब्रिड क्रॉस का अनुपात 9:3:3:1 प्रायः पूछा जाता है।
मेंडल की विधि: मेंडल ने मटर का पौधा क्यों चुना, इसके कारण हैं — मटर की खेती सरल है, इसमें जीवनकाल छोटा होता है, पर-परागण से बचने के लिए स्व-परागण होता है, तथा इसमें स्पष्ट विपरीत लक्षण होते हैं। मेंडल ने अपने प्रयोग में एक समय में एक ही लक्षण (monohybrid) तथा फिर दो लक्षणों (dihybrid) के क्रॉस किए। उनके प्रयोगों में नियमित अनुपात मिलने से नियमों की स्थापना हुई।
मेंडल के नियम आनुवंशिकी की नींव हैं। इनके आधार पर ही आधुनिक आनुवंशिकी विकसित हुई। पृथक्करण तथा स्वतंत्र अपवंटन के नियम युग्मक निर्माण के समय गुणसूत्रों के व्यवहार से सीधे संबंधित हैं। आधुनिक अवधारणा के अनुसार, ये नियम गुणसूत्र सिद्धांत का आधार हैं, जिसके अनुसार जीन गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं तथा युग्मक निर्माण में गुणसूत्रों के व्यवहार से ही जीनों का वितरण होता है।
मेंडल के नियमों के अपवाद: कुछ लक्षण ऐसे होते हैं जिनमें मेंडल के नियम पूर्ण रूप से लागू नहीं होते। इनमें अधूरी प्रभाविता (incomplete dominance), सहप्रभाविता (codominance) तथा बहु-एलीलिज्म शामिल हैं। अधूरी प्रभाविता में F1 पीढ़ी का लक्षण दोनों जनकों के मध्यवर्ती होता है, जैसे गुलाब के फूल में लाल और सफेद के संकरण से गुलाबी फूल। सहप्रभाविता में दोनों लक्षण साथ-साथ व्यक्त होते हैं, जैसे रक्त समूह AB में A और B दोनों एंटीजन। मानव रक्त समूह (A, B, AB, O) बहु-एलीलिज्म का उदाहरण है। ये अपवाद परीक्षा में प्रायः पूछे जाते हैं।
रक्त समूह की आनुवंशिकता: मानव रक्त समूह A, B, AB तथा O के रूप में होते हैं। रक्त समूह का निर्धारण तीन एलील्स — IA, IB तथा i — द्वारा होता है। IA तथा IB सहप्रभावी होते हैं तथा i अप्रमुख होता है। यह बहु-एलीलिज्म का सर्वोत्तम उदाहरण है। रक्त समूह की आनुवंशिकता समझने से रक्त आधान की सुरक्षा भी समझ में आती है। रेलवे परीक्षा में रक्त समूह A, B, AB, O तथा बहु-एलीलिज्म से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।
| नियम | मुख्य कथन | अनुपात |
|---|---|---|
| प्रभाविता का नियम | F1 पीढ़ी में केवल प्रमुख लक्षण व्यक्त | F1 सभी समरूप |
| पृथक्करण का नियम | युग्मक में एक एलील जाता है | F2 में 3:1 |
| स्वतंत्र अपवंटन | जीनों का वितरण स्वतंत्र | डायहाइब्रिड में 9:3:3:1 |
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| मानव गुणसूत्र | 46 (23 जोड़े) |
| ऑटोसोम जोड़े | 22 जोड़े |
| लिंग गुणसूत्र | स्त्री XX, पुरुष XY |
| युग्मक में गुणसूत्र | 23 (अगुणित) |
| गुणसूत्र का संकुचन | सेंट्रोमियर |
flowchart TD
A[गुणसूत्र और मेंडल के नियम] --> B[गुणसूत्र]
A --> C[लिंग निर्धारण]
A --> D[मेंडल के नियम]
A --> E[मेंडल के अपवाद]
B --> B1[46 गुणसूत्र मनुष्य]
B --> B2[डीएनए + प्रोटीन]
B --> B3[सेंट्रोमियर]
C --> C1[स्त्री XX]
C --> C2[पुरुष XY]
C --> C3[लिंग पिता के शुक्राणु से]
D --> D1[प्रभाविता का नियम]
D --> D2[पृथक्करण का नियम]
D --> D3[स्वतंत्र अपवंटन]
D1 --> D11[F1 सभी लंबे]
D2 --> D21[F2 में 3:1]
D3 --> D31[F2 में 9:3:3:1]
E --> E1[अधूरी प्रभाविता - गुलाबी फूल]
E --> E2[सहप्रभाविता - AB रक्त]
E --> E3[बहु-एलीलिज्म - रक्त समूह]
गुणसूत्र और मेंडल के नियम आनुवंशिकी के अध्ययन का केंद्रीय विषय हैं। इस अध्याय में हमने गुणसूत्रों की संरचना, मनुष्य में 46 गुणसूत्रों की व्यवस्था, लिंग निर्धारण की प्रक्रिया तथा मेंडल के तीन नियमों — प्रभाविता, पृथक्करण और स्वतंत्र अपवंटन — का विस्तार से अध्ययन किया। मोनोहाइब्रिड क्रॉस में F2 अनुपात 3:1 तथा डायहाइब्रिड क्रॉस में 9:3:3:1 होता है। लिंग का निर्धारण पिता के शुक्राणु के X या Y गुणसूत्र द्वारा होता है। मेंडल के नियमों के अपवाद — अधूरी प्रभाविता, सहप्रभाविता तथा बहु-एलीलिज्म — भी हमने समझे। ये अवधारणाएँ आनुवंशिकता के पूर्ण ज्ञान की नींव हैं। रेलवे टेक्नीशियन परीक्षा में इन नियमों तथा अनुपातों से प्रश्न अवश्य पूछे जाते हैं, अतः इनका नियमित अभ्यास आवश्यक है।