विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: जीव विज्ञान – विकास और पर्यावरण विषय-वस्तु: 19.3 जीवाश्म और अनुकूलन
जीवाश्म (Fossil) प्राचीन काल के जीवों के संरक्षित अवशेष, छाप या चिह्न हैं जो चट्टानों के भीतर दबे हुए पाए जाते हैं। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में जीवाश्म और अनुकूलन से संबंधित प्रश्न विकास के प्रमाण, अनुकूलन के प्रकार और उदाहरणों पर आधारित होते हैं। जब कोई जीव मर जाता है और उसके शरीर पर मिट्टी, बालू या रेत जमा हो जाती है, तो लंबे समय के बाद उसके अवशेष चट्टानों में बदलकर जीवाश्म बन जाते हैं। जीवाश्मविज्ञान (Paleontology) विज्ञान की वह शाखा है जो जीवाश्मों का अध्ययन करती है। जीवाश्मों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक को जीवाश्म विज्ञानी कहते हैं।
जीवाश्म विकास का सबसे प्रत्यक्ष और ठोस प्रमाण माने जाते हैं। पृथ्वी की चट्टानों में जीवाश्मों की क्रमिक व्यवस्था यह दर्शाती है कि प्राचीन जीव सरल थे और समय के साथ जटिल होते गए। पुरानी चट्टानों में मिलने वाले जीवाश्म सरल जीवों के होते हैं जबकि नई चट्टानों में जटिल जीवों के जीवाश्म मिलते हैं। यह क्रम विकासवाद का प्रमाण है। रेलवे परीक्षा में जीवाश्मों से विकास का प्रमाण, आर्कियोप्टेरिक्स जैसे जीवाश्म और जीवाश्मों की आयु निर्धारण के तरीकों पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
अनुकूलन (Adaptation) जीवों द्वारा अपने पर्यावरण के अनुसार अपनी संरचना, क्रिया या व्यवहार में किया जाने वाला परिवर्तन है। यह जीवों को जीवित रहने और प्रजनन में सहायता करता है। रेलवे परीक्षा में अनुकूलन के प्रकार, जलीय और स्थलीय जीवों के अनुकूलन, मरुस्थलीय पौधों के अनुकूलन तथा छलावरण जैसे विषयों से प्रश्न पूछे जाते हैं। अनुकूलन विकास की प्रक्रिया का ही परिणाम है और इसी अध्याय में जीवाश्म और अनुकूलन के बीच के संबंध को भी समझेंगे।
जीवाश्मों का निर्माण (Fossilization) कुछ विशेष परिस्थितियों में ही संभव होता है। सामान्यतः सभी मृत जीवों के अवशेष विघटित (Decompose) हो जाते हैं, परंतु कुछ जीवों के अवशेष विशेष परिस्थितियों में संरक्षित हो जाते हैं।
जीवाश्म निर्माण की प्रक्रिया: जब कोई जीव जलाशय के निकट या मिट्टी में दबकर मर जाता है, तो उस पर धीरे-धीरे बालू, रेत और मिट्टी की परतें जमा होती जाती हैं। समय के साथ नीचे की परतों पर ऊपर की परतों का दबाव बढ़ता है। खनिज लवण धीरे-धीरे जीव के कठोर भागों में प्रवेश करते हैं और उन्हें पत्थर में बदल देते हैं। इस प्रक्रिया को खनिजीकरण (Mineralization) या पेट्रिफिकेशन कहते हैं। जीवों के मुलायम भाग जैसे मांसपेशियाँ और अंग सामान्यतः नष्ट हो जाते हैं, परंतु कठोर भाग जैसे अस्थियाँ, दाँत, खोल (Shell) और लकड़ी संरक्षित हो सकते हैं।
जीवाश्मों के प्रकार: जीवाश्म कई प्रकार के होते हैं। सबसे सामान्य प्रकार के जीवाश्म में जीव का शरीर अपनी मूल स्थिति में संरक्षित रहता है, इसे अवशेषी जीवाश्म कहते हैं। कुछ जीवाश्म केवल छाप (Imprint) के रूप में होते हैं जिनमें जीव के शरीर का निशान पत्थर पर बना होता है। जब जीव का शरीर सड़ जाता है और उसके स्थान पर खनिजों का ढाँचा बन जाता है तो उसे निविदल (Cast) कहते हैं। अंबर (Amber) में फंसे कीड़ों के जीवाश्म भी बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे पूर्ण रूप से संरक्षित रहते हैं।
जीवाश्मों की आयु निर्धारण: जीवाश्मों की आयु निर्धारण के लिए कार्बन-14 डेटिंग (Carbon-14 Dating) विधि का प्रयोग किया जाता है। कार्बन-14 एक रेडियोधर्मी समस्थानिक है जिसकी अर्ध-आयु लगभग 5730 वर्ष होती है। जीव की मृत्यु के बाद उसके शरीर में कार्बन-14 की मात्रा घटती जाती है। कार्बन-14 की बची मात्रा से जीवाश्म की आयु ज्ञात की जाती है। यह विधि लगभग 50 हजार वर्ष पुराने जीवाश्मों के लिए उपयुक्त है। अधिक पुराने जीवाश्मों के लिए यूरेनियम-लेड या पोटैशियम-आर्गन डेटिंग जैसी विधियाँ प्रयोग की जाती हैं।
जीवाश्म विकासवाद का सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। चट्टानों में जीवाश्मों की व्यवस्था एक स्पष्ट क्रम दर्शाती है।
आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx): यह सबसे महत्वपूर्ण जीवाश्म है जो सरीसृप और पक्षी के बीच की कड़ी को दर्शाता है। आर्कियोप्टेरिक्स में सरीसृपों के लक्षण जैसे दाँत और लंबी पूँछ तथा पक्षियों के लक्षण जैसे पंख और उड़ने की क्षमता दोनों पाए जाते हैं। यह जीवाश्म प्रमाणित करता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों से हुआ है।
हार्स टेल (Horse Series): घोड़े का विकास जीवाश्मों के द्वारा सबसे अच्छी तरह प्रमाणित होता है। इओहिप्पस (Eohippus) घोड़े का प्रारंभिक पूर्वज था जो कुत्ते के आकार का था और उसके चार अंगुलियाँ होती थीं। क्रमिक विकास में घोड़े का आकार बढ़ता गया, अंगुलियों की संख्या घटकर एक हो गई और दाँत अधिक विकसित होते गए। आधुनिक घोड़ा (Equus) विकास की अंतिम अवस्था है जिसके पैर में केवल एक अंगुली (खुर) होती है।
जीवाश्मों का क्रम: पुरानी चट्टानों में सरल जीवों जैसे जीवाणु, शैवाल और अकशेरुकी जीवों के जीवाश्म मिलते हैं। मध्यम आयु की चट्टानों में मछली, उभयचर और सरीसृपों के जीवाश्म मिलते हैं। नई चट्टानों में पक्षियों और स्तनधारियों के जीवाश्म पाए जाते हैं। यह क्रमिक व्यवस्था यह सिद्ध करती है कि सरल जीवों से जटिल जीवों की ओर विकास हुआ है।
अनुकूलन जीवों द्वारा पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार किए जाने वाले परिवर्तन हैं। अनुकूलन मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं।
संरचनात्मक अनुकूलन (Structural Adaptation): ये जीवों के शरीर की संरचना में होने वाले परिवर्तन हैं। जलीय जीवों का धारा रेखीय (Streamlined) शरीर, मछली की गलफड़े (Gills), पक्षी के खोखली अस्थियाँ और ऊँट का कूबड़ संरचनात्मक अनुकूलन के उदाहरण हैं। मरुस्थलीय पौधों में पत्तियाँ काँटों में बदल जाती हैं और तना मोटा होकर जल संचय करता है, यह भी संरचनात्मक अनुकूलन है।
व्यवहारिक अनुकूलन (Behavioural Adaptation): ये जीवों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तन हैं। पक्षियों का प्रवासन (Migration), कीड़ों का शीतनिद्रा (Hibernation), जानवरों का सामूहिक रूप से रहना और छलावरण (Camouflage) व्यवहारिक अनुकूलन के उदाहरण हैं। छलावरण में जीव अपना रंग पर्यावरण के अनुसार बदलकर स्वयं को शत्रु से छिपाता है, जैसे गिरगिट।
जलीय जीवों के अनुकूलन: जलीय जीवों में धारा रेखीय शरीर जल में घर्षण कम करता है। मछलियों में गलफड़े जल में घुली ऑक्सीजन को ग्रहण करते हैं। व्हेल और डॉल्फिन जैसे स्तनधारी नियमित रूप से सतह पर आकर श्वास लेते हैं। व्हेल का शरीर बहुत मोटी चर्बी की परत से ढका होता है जो ठंडे जल में उसे सुरक्षा देती है।
स्थलीय और मरुस्थलीय जीवों के अनुकूलन: मरुस्थलीय जीवों में जल की कमी से बचने के लिए विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं। ऊँट अपने कूबड़ में चर्बी संचय करता है जिससे लंबे समय तक भूखा रह सकता है। मरुस्थलीय पौधों की पत्तियाँ काँटों में बदल जाती हैं जिससे वाष्पोत्सर्जन कम होता है। इन पौधों को रसीले पौधे (Succulents) कहते हैं। मरुस्थलीय पौधे अपने मोटे तने में जल संचय करते हैं।
| विषय | विवरण |
|---|---|
| जीवाश्म किसे कहते हैं | प्राचीन जीवों के संरक्षित अवशेष या चिह्न |
| अध्ययन की शाखा | जीवाश्मविज्ञान (Paleontology) |
| आयु निर्धारण विधि | कार्बन-14 डेटिंग |
| कार्बन-14 की अर्ध-आयु | लगभग 5730 वर्ष |
| महत्वपूर्ण जीवाश्म | आर्कियोप्टेरिक्स (सरीसृप-पक्षी कड़ी) |
| घोड़े का प्रारंभिक पूर्वज | इओहिप्पस |
| अनुकूलन का प्रकार | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|
| संरचनात्मक अनुकूलन | शरीर की संरचना में परिवर्तन | धारा रेखीय शरीर, गलफड़े, कूबड़, काँटेदार पत्तियाँ |
| व्यवहारिक अनुकूलन | व्यवहार में परिवर्तन | प्रवासन, शीतनिद्रा, छलावरण |
| शारीरिक अनुकूलन | शरीर की क्रियाओं में परिवर्तन | रेगिस्तान में न्यूनतम पसीना आना |
flowchart TD
A[जीवाश्म और अनुकूलन] --> B[जीवाश्म]
A --> C[विकास के प्रमाण]
A --> D[अनुकूलन]
B --> B1[निर्माण प्रक्रिया]
B --> B2[प्रकार]
B --> B3[आयु निर्धारण - कार्बन 14]
C --> C1[आर्कियोप्टेरिक्स]
C --> C2[घोड़े का विकास - इओहिप्पस]
C --> C3[चट्टानों में क्रमिक व्यवस्था]
D --> D1[संरचनात्मक अनुकूलन]
D --> D2[व्यवहारिक अनुकूलन]
D --> D3[जलीय जीवों का अनुकूलन]
D --> D4[मरुस्थलीय अनुकूलन]
जीवाश्म और अनुकूलन विकासवाद के दो पक्ष हैं जो परस्पर जुड़े हैं। जीवाश्म विकास के प्रत्यक्ष प्रमाण देते हैं, जैसे आर्कियोप्टेरिक्स और घोड़े के विकास की श्रृंखला। कार्बन-14 डेटिंग से जीवाश्मों की आयु ज्ञात की जाती है। दूसरी ओर अनुकूलन जीवों को पर्यावरण के अनुसार ढलने की क्षमता देता है, जो विकास का ही परिणाम है। संरचनात्मक अनुकूलन जैसे गलफड़े, कूबड़ और काँटेदार पत्तियाँ तथा व्यवहारिक अनुकूलन जैसे प्रवासन और छलावरण सभी जीवों की उत्तरजीविता में सहायक हैं। जीवाश्मों के अध्ययन से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि आज के जीव किस प्रकार विकसित हुए। इस अध्याय का ज्ञान आगे के पारितंत्र और जैव विविधता के अध्यायों को समझने में सहायक होगा।