विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: सामान्य जागरूकता – भूगोल और राजव्यवस्था विषय-वस्तु: 21.9 न्यायपालिका और संवैधानिक निकाय
भारत में न्यायपालिका एक स्वतंत्र और एकीकृत संरचना है, जिसका शिखर सर्वोच्च न्यायालय है। भारतीय संविधान ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया है ताकि न्यायाधीश किसी राजनीतिक या कार्यकारी दबाव के बिना न्याय कर सकें। भारतीय न्यायपालिका का मुख्य कार्य संविधान की व्याख्या, कानूनों की वैधता की जाँच (न्यायिक पुनर्विलोकन), विवादों का समाधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है। संविधान के अनुच्छेद 124 से 147 तक सर्वोच्च न्यायालय की संरचना, अनुच्छेद 214 से 231 तक उच्च न्यायालयों तथा अनुच्छेद 233 से 237 तक अधीनस्थ न्यायालयों की व्यवस्था वर्णित है। भारत में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय का एकीकृत पदानुक्रम है, जिसके शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय स्थित है।
सर्वोच्च न्यायालय भारत का सर्वोच्च न्यायालय है, जो देश का 'अंतिम न्यायालय' तथा 'संविधान का संरक्षक' कहलाता है। सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना 26 जनवरी 1950 को हुई थी। इसका प्रथम मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति हरिलाल जेकिसुनदास कानिया थे। सर्वोच्च न्यायालय की मूल अधिकारिता, अपीलीय अधिकारिता, परामर्शदात्री अधिकारिता तथा रिट अधिकारिता होती है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है और उनकी सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश सहित 34 है।
संवैधानिक निकाय वे निकाय हैं जिनकी स्थापना और शक्तियाँ सीधे संविधान द्वारा निर्धारित होती हैं। इनमें चुनाव आयोग, संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी), नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी), वित्त आयोग, अटॉर्नी जनरल, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग तथा भारत के महाधिवक्ता शामिल हैं। रेलवे परीक्षा में न्यायालयों की संरचना, न्यायिक पुनर्विलोकन, जनहित याचिका, संवैधानिक निकायों के नाम और उनके प्रमुख कार्यों से संबंधित प्रश्न प्रमुख रूप से पूछे जाते हैं। इस अध्याय में हम इन सभी का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सर्वोच्च न्यायालय भारतीय न्यायपालिका का शीर्ष है और इसकी स्थापना अनुच्छेद 124 के तहत की गई है। सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सहित अधिकतम 34 न्यायाधीश होते हैं। मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है तथा वरिष्ठता के आधार पर उसे चुना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद की जाती है। न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए आवश्यक योग्यताएँ हैं – भारतीय नागरिक होना, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश कम से कम पाँच वर्ष रहना, या सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय का अधिवक्ता कम से कम दस वर्ष रहना, या राष्ट्रपति की राय में विधि का विख्यात विद्वान होना। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (कुल सदस्यों का बहुमत और उपस्थित-मतदान करने वालों का दो-तिहाई) आवश्यक है।
सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता कई प्रकार की है। मूल अधिकारिता (अनुच्छेद 131) में केंद्र-राज्य या राज्य-राज्य के बीच विवाद सीधे सर्वोच्च न्यायालय में दायर होते हैं। मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 के तहत रिट जारी कर सकता है। अपीलीय अधिकारिता में उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनी जाती है, जिसमें संवैधानिक प्रश्नों से जुड़े मामले विशेष रूप से शामिल हैं। अनुच्छेद 131 की मूल अधिकारिता में भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच, या भारत सरकार और एक ओर तथा एक या अधिक राज्यों के बीच के विवाद शामिल हैं। परामर्शदात्री अधिकारिता (अनुच्छेद 143) में राष्ट्रपति किसी महत्वपूर्ण विधि या तथ्य के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय का परामर्श ले सकता है। सर्वोच्च न्यायालय को 'सभी न्यायालयों का सर्वोच्च' और 'संविधान का अंतिम व्याख्याता' कहा जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक पुनर्विलोकन (ज्यूडिशियल रिव्यू) शक्ति यह है कि वह संसद और विधानसभाओं द्वारा बनाए गए कानूनों की संवैधानिकता की जाँच कर सकता है। यदि कोई कानून संविधान के मूल ढाँचे या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तो सर्वोच्च न्यायालय उसे रद्द कर सकता है। मूल संरचना सिद्धांत (बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन) केशवानंद भारती मामले (1973) में स्थापित हुआ था, जिसके अनुसार संसद संविधान के मूल ढाँचे में परिवर्तन नहीं कर सकती। जनहित याचिका (पीआईएल) की अवधारणा भारत में 1980 के दशक में विकसित हुई, जिससे न्यायालय में किसी भी नागरिक के द्वारा जनता के हित में याचिका दायर की जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय में 'न्यायाधीशों के नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार' कोलिजियम प्रणाली कहलाती है।
उच्च न्यायालय राज्य स्तर का सर्वोच्च न्यायालय है और भारत के प्रत्येक राज्य में एक उच्च न्यायालय होता है। कुछ राज्यों में एक ही उच्च न्यायालय कई राज्यों के लिए कार्य करता है, जैसे पंजाब और हरियाणा का संयुक्त उच्च न्यायालय चंडीगढ़ में स्थित है। मुंबई उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार महाराष्ट्र, गोवा और केंद्र शासित प्रदेश दादरा नगर हवेली एवं दमन-दीव पर है। गुवाहाटी उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार असम, नागालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश पर है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है और उनकी सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श किया जाता है। उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी कर सकता है, जिससे मौलिक अधिकारों के साथ-साथ कानूनी अधिकारों की भी रक्षा होती है।
भारत में कुल 25 उच्च न्यायालय हैं। सबसे पुराना उच्च न्यायालय कलकत्ता उच्च न्यायालय (1862) है, जिसे देश का सबसे पुराना उच्च न्यायालय माना जाता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय उत्तर प्रदेश में स्थित है, जिसमें सर्वाधिक न्यायाधीशों की संख्या है। मद्रास उच्च न्यायालय (चेन्नई) और बॉम्बे उच्च न्यायालय (मुंबई) भी 1862 में ही स्थापित हुए थे। अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना में जिला न्यायालय, सत्र न्यायालय, मुंसिफ न्यायालय और कार्यकारी मजिस्ट्रेट के न्यायालय शामिल हैं। अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है। राज्यों में न्यायिक सेवाओं का नियंत्रण उच्च न्यायालय के अधीन होता है।
भारत में न्यायपालिका की एकीकृत प्रणाली है, अर्थात देशभर में न्यायालयों का एक ही पदानुक्रम है जिसके शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संविधान में न्यायाधीशों के वेतन का संसद द्वारा निर्धारण, कार्यकाल की सुरक्षा, सेवानिवृत्ति के बाद वकालत पर प्रतिबंध जैसे प्रावधान हैं। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की स्थापना विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत की गई है, जो गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करता है। न्यायिक मामलों में 'लोक अदालत' समझौता-आधारित न्याय के लिए महत्वपूर्ण हैं।
चुनाव आयोग (Election Commission) सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना अनुच्छेद 324 के तहत की गई है। भारत का चुनाव आयोग 25 जनवरी 1950 को स्थापित हुआ और इसी दिन को 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस' मनाया जाता है। चुनाव आयोग भारत में लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के चुनावों का स्वतंत्र और निष्पक्ष संचालन सुनिश्चित करता है। मूल रूप से चुनाव आयोग एक सदस्यीय था, किंतु 1989 में इसे तीन सदस्यीय बना दिया गया। मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल संसद के विशेष बहुमत से ही पद से हटाया जा सकता है, जबकि अन्य आयुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटाए जा सकते हैं। सुखदेव सिंह कंग (श्रीकुमार राव?) का नाम भारत का पहला मुख्य चुनाव आयुक्त है – सही उत्तर सुकुमार सेन है।
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) अनुच्छेद 315 के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है, जो केंद्रीय सिविल सेवाओं की भर्ती के लिए परीक्षाएँ आयोजित करता है। यूपीएससी के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है। राज्य स्तर पर राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) कार्य करते हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) अनुच्छेद 148 के तहत स्थापित है, जो भारत की 'सार्वजनिक वित्त व्यवस्था का संरक्षक' कहलाता है। सीएजी सरकार के खातों की लेखापरीक्षा (ऑडिट) करता है और संसद के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत करता है। सीएजी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है और उसे केवल संसद के विशेष बहुमत से ही हटाया जा सकता है।
वित्त आयोग (Finance Commission) अनुच्छेद 280 के तहत हर पाँच वर्ष में राष्ट्रपति द्वारा गठित होता है। इसका मुख्य कार्य केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व का वितरण निर्धारित करना है। अटॉर्नी जनरल (महान्यायवादी) भारत का सर्वोच्च विधि अधिकारी है, जिसकी नियुक्ति अनुच्छेद 76 के तहत राष्ट्रपति द्वारा होती है। वह संसद के दोनों सदनों में बोल सकता है, किंतु मतदान नहीं कर सकता। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (अनुच्छेद 338), राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (अनुच्छेद 338-क), राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (अनुच्छेद 338-ख) और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग भी महत्वपूर्ण संवैधानिक निकाय हैं। इन आयोगों का मुख्य कार्य इन वर्गों के अधिकारों की रक्षा और कल्याण सुनिश्चित करना है।
| न्यायालय | संवैधानिक प्रावधान | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| सर्वोच्च न्यायालय | अनुच्छेद 124 | अधिकतम 34 न्यायाधीश, सेवानिवृत्ति 65 वर्ष |
| उच्च न्यायालय | अनुच्छेद 214 | कुल 25, सेवानिवृत्ति 62 वर्ष |
| अधीनस्थ न्यायालय | अनुच्छेद 233 | जिला-सत्र न्यायालय, राज्यपाल द्वारा नियुक्ति |
| निकाय | अनुच्छेद | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| चुनाव आयोग | 324 | चुनावों का निष्पक्ष संचालन |
| संघ लोक सेवा आयोग | 315 | सिविल सेवा भर्ती |
| सीएजी (महालेखा परीक्षक) | 148 | सरकारी खातों की ऑडिट |
| वित्त आयोग | 280 | कर राजस्व का केंद्र-राज्य वितरण |
| अटॉर्नी जनरल | 76 | भारत का सर्वोच्च विधि अधिकारी |
flowchart TD
A[न्यायपालिका और संवैधानिक निकाय] --> B[न्यायपालिका]
A --> C[संवैधानिक निकाय]
B --> B1[सर्वोच्च न्यायालय]
B --> B2[उच्च न्यायालय]
B --> B3[अधीनस्थ न्यायालय]
B1 --> B1a[अनुच्छेद 124]
B1 --> B1b[34 न्यायाधीश, 65 वर्ष]
B2 --> B2a[25 उच्च न्यायालय]
B2 --> B2b[62 वर्ष सेवानिवृत्ति]
C --> C1[चुनाव आयोग - 324]
C --> C2[यूपीएससी - 315]
C --> C3[सीएजी - 148]
C --> C4[वित्त आयोग - 280]
भारत की न्यायपालिका और संवैधानिक निकाय संविधान के प्रभावी क्रियान्वयन का आधार हैं। इस अध्याय में हमने सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना तथा चुनाव आयोग, यूपीएससी, सीएजी, वित्त आयोग और अटॉर्नी जनरल जैसे प्रमुख संवैधानिक निकायों के कार्यों का अध्ययन किया। न्यायिक पुनर्विलोकन, मूल ढाँचा सिद्धांत और जनहित याचिका जैसी अवधारणाएँ आधुनिक न्यायिक व्यवस्था की पहचान हैं। अनुच्छेदों और सेवानिवृत्ति आयु की सटीक जानकारी परीक्षा में निर्णायक साबित होती है। तालिकाओं और माइंड मैप के माध्यम से नियमित पुनरावलोकन करने से इन तथ्यों में दृढ़ता आती है।