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साखियाँ एवं सबद (कबीर) — Notes

कवि परिचय: कबीरदास (Poet Introduction)

कबीरदास भक्तिकाल की निर्गुण काव्यधारा (ज्ञानाश्रयी शाखा) के प्रमुख कवि थे। उनका जन्म 1398 ई. में काशी में माना जाता है। वे बाह्य आडंबरों के घोर विरोधी थे और ईश्वर को घट-घट वासी मानते थे।

साखियों का भावार्थ (Meaning of Sakhis)

साखी 1: मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।
मुकताफल मुकता चुगैं, अब उड़ि अनत न जाहिं।

भावार्थ: हृदय रूपी मानसरोवर भक्ति जल से भरा हुआ है, जिसमें जीवात्मा रूपी हंस क्रीड़ा कर रहे हैं। वे आनंद रूपी मोती चुग रहे हैं और इस आनंद को छोड़कर अन्यत्र नहीं जाना चाहते।

साखी 2: प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरौं, प्रेमी मिले न कोय।
प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होय।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि मैं सच्चे ईश्वर प्रेमी को ढूँढ़ता फिर रहा हूँ, पर कोई नहीं मिलता। जब दो सच्चे प्रेमी (भक्त) मिलते हैं, तो मन की सारी बुराइयाँ (विष) अच्छाइयों (अमृत) में बदल जाती हैं।