विषय: रेलवे ग्रुप D – जीव विज्ञान (नियंत्रण जनन और आनुवंशिकता) अध्याय: 18.10 विविधता और वंशागति विषय-वस्तु: जैव विविधता, वंशागति
जैव विविधता (Biodiversity) से तात्पर्य पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों की विभिन्नता से है। इसमें एक ही जाति के जीवों के बीच, विभिन्न जातियों के बीच तथा पारिस्थितिकी तंत्रों के बीच पाई जाने वाली समस्त विभिन्नताएँ शामिल हैं। जैव विविधता के तीन मुख्य स्तर हैं — आनुवंशिक विविधता, जाति विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र विविधता। आनुवंशिक विविधता एक ही जाति के सदस्यों में जीन स्तर पर विभिन्नता को दर्शाती है, जो वंशागति एवं उत्परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती है। यह विविधता ही जीवों की उत्तरजीविता का आधार है।
वंशागति वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीवों के लक्षण पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होते हैं। वंशागति के साथ-साथ विभिन्नता (variation) भी उत्पन्न होती है, अर्थात संतति में जनक से भिन्नता दिखती है। यह विभिन्नता लैंगिक जनन, युग्मकों के स्वतंत्र वितरण तथा उत्परिवर्तन (mutation) के कारण होती है। विभिन्नता ही प्राकृतिक चयन और विकास का आधार है। डार्विन के अनुसार, प्राकृतिक चयन के द्वारा पर्यावरण के लिए सर्वोत्तम अनुकूल जीव जीवित रहते हैं और अपने लक्षण संतति में संचारित करते हैं। इस प्रकार विविधता और वंशागति आपस में गहराई से जुड़े हैं।
यह अध्याय जैव विविधता के प्रकार, इसके महत्व, विलुप्ति के खतरों, संरक्षण के उपाय तथा वंशागति में विभिन्नता के स्रोतों पर केंद्रित है। जैव विविधता का संरक्षण पर्यावरण संतुलन और मानव कल्याण के लिए अनिवार्य है, इसलिए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर CBD (कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी) जैसे प्रयास किए जाते हैं। परीक्षा की दृष्टि से जैव विविधता के स्तर, विकास की प्रक्रिया, अनुकूलन के उदाहरण तथा संरक्षण के उपायों से संबंधित प्रश्न महत्वपूर्ण हैं।
जैव विविधता के तीन मुख्य स्तर निम्न हैं:
जैव विविधता का महत्व निम्न कारणों से है:
उदाहरण के लिए:
इस प्रकार जैव विविधता का प्रत्येक स्तर प्रकृति की स्थिरता के लिए आवश्यक है।
वंशागति में विभिन्नता उत्पन्न करने वाले मुख्य स्रोत निम्न हैं:
अनुकूलन (Adaptation) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपने पर्यावरण में उत्तरजीविता के लिए विशेष लक्षण विकसित करते हैं। उदाहरण के लिए:
प्राकृतिक चयन के अनुसार जो जीव पर्यावरण के लिए सर्वोत्तम अनुकूल होते हैं, वे अधिक संख्या में जीवित रहते हैं और अधिक संतति उत्पन्न करते हैं, जिससे उनके लक्षण धीरे-धीरे जाति में प्रचलित हो जाते हैं। यही विकास की प्रक्रिया है। जीवित जीवों का उद्भव उनके पूर्वजों में होने वाले क्रमिक परिवर्तनों से होता है। इस प्रकार विभिन्नता और वंशागति मिलकर विकास को संचालित करते हैं।
जाति निर्माण (Speciation) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा नई जातियाँ उत्पन्न होती हैं। यह तब होता है जब किसी जाति की आबादी भौगोलिक या प्रजनन रूप से अलग हो जाती है और दोनों समूह अलग-अलग परिस्थितियों में क्रमिक रूप से परिवर्तित होते हैं। भौगोलिक अलगाव (जैसे नदी, पहाड़) प्रजनन अलगाव का कारण बनता है, जिससे आनुवंशिक भिन्नता बढ़ती है और अंततः नई जाति बनती है। दार्शनिक गैलापागोस द्वीपों के फिंच पक्षियों में यह प्रक्रिया स्पष्ट दिखती है।
जैव विविधता पर मुख्य खतरे निम्न हैं:
जैव विविधता के संरक्षण के उपाय:
उदाहरण के लिए:
इस प्रकार जाति निर्माण से विविधता बढ़ती है, जबकि मानवीय क्रियाओं से यह घटती है, इसलिए संरक्षण अनिवार्य है।
| स्तर | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| आनुवंशिक विविधता | एक जाति के जीन भिन्नता | गेहूँ की अनेक किस्में |
| जाति विविधता | क्षेत्र की जातियों की संख्या | वन में अनेक वृक्ष-पक्षी |
| पारिस्थितिकी तंत्र विविधता | विभिन्न तंत्र | वन, मरुस्थल, नदी |
| स्रोत | प्रभाव |
|---|---|
| लैंगिक जनन | नए जीन संयोजन |
| स्वतंत्र अपव्यूहन | लक्षणों का स्वतंत्र वितरण |
| विनिमय (Crossing over) | गुणसूत्र खंडों का आदान-प्रदान |
| उत्परिवर्तन | नए लक्षणों का उद्भव |
flowchart TD
A[18.10 विविधता और वंशागति] --> B[जैव विविधता]
A --> C[वंशागति और विभिन्नता]
A --> D[विकास]
A --> E[संरक्षण]
B --> B1[आनुवंशिक विविधता]
B --> B2[जाति विविधता]
B --> B3[पारिस्थितिकी तंत्र विविधता]
C --> C1[लैंगिक जनन]
C --> C2[उत्परिवर्तन]
C --> C3[स्वतंत्र अपव्यूहन]
D --> D1[प्राकृतिक चयन]
D --> D2[अनुकूलन]
D --> D3[जाति निर्माण]
E --> E1[राष्ट्रीय उद्यान]
E --> E2[जैव विविधता अधिनियम]
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<text x="400" y="40" text-anchor="middle" font-size="26" font-weight="bold" fill="#1a237e">जैव विविधता के स्तर</text>
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<text x="400" y="125" text-anchor="middle" font-size="16" fill="#000">आनुवंशिक विविधता</text>
<text x="400" y="145" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#555">एक जाति के जीन</text>
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<text x="400" y="215" text-anchor="middle" font-size="16" fill="#000">जाति विविधता</text>
<text x="400" y="235" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#555">अनेक जातियाँ</text>
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<text x="400" y="305" text-anchor="middle" font-size="16" fill="#000">पारिस्थितिकी तंत्र विविधता</text>
<text x="400" y="325" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#555">वन, मरुस्थल, नदी</text>
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<text x="240" y="423" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">भोजन एवं औषधि</text>
<text x="240" y="441" text-anchor="middle" font-size="11" fill="#555">मूल्य</text>
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<text x="430" y="423" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">पारिस्थितिक संतुलन</text>
<text x="430" y="441" text-anchor="middle" font-size="11" fill="#555">स्थिरता</text>
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<text x="630" y="423" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">आनुवंशिक भंडार</text>
<text x="630" y="441" text-anchor="middle" font-size="11" fill="#555">रोग प्रतिरोध</text>
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<text x="70" y="566" font-size="15" fill="#000">स्वर्ण नियम: जैव विविधता आनुवंशिक, जाति और पारिस्थितिकी तंत्र तीन स्तरों पर होती है।</text>
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<text x="400" y="40" text-anchor="middle" font-size="26" font-weight="bold" fill="#1a237e">विकास और जाति निर्माण</text>
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<text x="160" y="145" text-anchor="middle" font-size="14" fill="#000">पूर्वज आबादी</text>
<text x="160" y="163" text-anchor="middle" font-size="11" fill="#555">विभिन्नता</text>
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<text x="300" y="90" text-anchor="middle" font-size="12" fill="#000">भौगोलिक अलगाव</text>
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<text x="440" y="105" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">समूह A</text>
<text x="440" y="123" text-anchor="middle" font-size="11" fill="#555">अनुकूलन</text>
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<text x="440" y="200" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">समूह B</text>
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<text x="695" y="105" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">नई जाति 1</text>
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<text x="695" y="200" text-anchor="middle" font-size="13" fill="#000">नई जाति 2</text>
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<text x="70" y="566" font-size="15" fill="#000">स्वर्ण नियम: भौगोलिक अलगाव और क्रमिक अनुकूलन से नई जातियों का निर्माण होता है।</text>
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जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन की समृद्धि का आधार है, जो आनुवंशिक, जाति और पारिस्थितिकी तंत्र तीन स्तरों पर प्रकट होती है। वंशागति लक्षणों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचारित करती है, जबकि लैंगिक जनन, उत्परिवर्तन और स्वतंत्र अपव्यूहन विभिन्नता उत्पन्न करते हैं। यह विभिन्नता प्राकृतिक चयन और अनुकूलन के द्वारा विकास तथा जाति निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती है। जैव विविधता पर वास विनाश और प्रदूषण जैसे खतरे हैं, इसलिए संरक्षण के लिए संरक्षित क्षेत्र और विधि निर्माण आवश्यक हैं। इस प्रकार विविधता और वंशागति का समग्र ज्ञान प्रकृति के संतुलन को समझने में सहायक है।