19.1 विकासवाद Notes

19.1 विकासवाद

विषय: रेलवे ग्रुप D – जीव विज्ञान (विकास और पर्यावरण) अध्याय: 19.1 विकासवाद विषय-वस्तु: विकासवाद, डार्विन सिद्धांत

1. परिचय

विकासवाद (Evolution) जीव विज्ञान की वह मौलिक अवधारणा है जो यह स्पष्ट करती है कि पृथ्वी पर जीवन आज जैसा दिखाई देता है, उसका निर्माण अचानक नहीं हुआ, बल्कि लाखों-करोड़ों वर्षों में धीरे-धीरे होने वाले क्रमिक परिवर्तनों का परिणाम है। आदिम पृथ्वी पर केवल सरल, एककोशिकीय जीव पाए जाते थे, जिनसे समय के साथ जटिल बहुकोशिकीय जीवों, पौधों, जंतुओं और अंततः मानव का विकास हुआ। विकास की यह प्रक्रिया पीढ़ी दर पीढ़ी वंशानुगत गुणों में होने वाले परिवर्तनों द्वारा संचालित होती है, और इसी क्रमिक परिवर्तन के कारण आज हमें पृथ्वी पर जैव विविधता की विशाल श्रृंखला देखने को मिलती है।

विकासवाद के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण योगदान चार्ल्स डार्विन का रहा। सन् 1859 में प्रकाशित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक "ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीसीज़" ने विकासवाद को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। डार्विन के अनुसार किसी भी जनसंख्या में जीवों में प्राकृतिक भिन्नताएँ पाई जाती हैं, और जो जीव अपने वातावरण के साथ सर्वोत्तम अनुकूलन कर पाते हैं, वे ही जीवित रहते हैं तथा अपनी संतति को आगे बढ़ाते हैं। जीवित रहने और अधिक संतति छोड़ने की इसी प्रक्रिया को प्राकृतिक चयन (Natural Selection) कहा जाता है, जिसे डार्विन का विकासवाद भी कहते हैं।

रेलवे ग्रुप D की जीव विज्ञान परीक्षा में विकासवाद और डार्विन के सिद्धांत से सरल तथा सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं, जैसे पुस्तक का नाम और उसका प्रकाशन वर्ष, सिद्धांत के नाम, महत्वपूर्ण शब्दों के अर्थ, समरूप तथा समानवृत्ति अंगों के उदाहरण आदि। इस अध्याय में हम विकासवाद की मूल अवधारणा, डार्विन के सिद्धांत की प्रमुख विशेषताओं, अन्य प्रमुख सिद्धांतों तथा विकास के साक्ष्यों का विस्तृत अध्ययन करेंगे, ताकि परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों को आसानी से और शीघ्रता से हल किया जा सके।

2. विकासवाद की मूल अवधारणा

विकासवाद वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीवों की पीढ़ियों में वंशानुगत लक्षणों के आधार पर क्रमिक परिवर्तन होते रहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो विकासवाद जीवों के धीरे-धीरे बदलने की प्रक्रिया है, जिसके परिणामस्वरूप समय के साथ नए प्रकार के जीवों का उद्भव होता है। विकासवाद का अध्ययन करने वाली विज्ञान की शाखा को विकास जीव विज्ञान (Evolutionary Biology) कहते हैं।

विकासवाद से जुड़ी मूल अवधारणाएँ:

विकासवाद के प्रमुख सिद्धांत:

  1. लैमार्क का सिद्धांत (प्रयोग-अव्यय का सिद्धांत)।
  2. डार्विन का सिद्धांत (प्राकृतिक चयन का सिद्धांत)।
  3. डी व्रीज़ का उत्परिवर्तन सिद्धांत।
  4. आधुनिक संश्लेषण या नव-डार्विनवाद।

लैमार्क का सिद्धांत: फ्रांसीसी वैज्ञानिक जीन बैप्टिस्ट लैमार्क ने बताया कि जो अंग जितना अधिक उपयोग में आते हैं वे उतने ही अधिक विकसित होते हैं, और जो अंग उपयोग में नहीं आते वे धीरे-धीरे क्षीण हो जाते हैं। इन्हीं अर्जित लक्षणों को जीव अपनी संतति में स्थानांतरित कर देता है। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण जिराफ की लंबी गर्दन है। हालांकि, बाद में यह सिद्धांत स्वीकार नहीं किया गया, क्योंकि अर्जित लक्षण आनुवंशिक रूप से स्थानांतरित नहीं होते।

डी व्रीज़ का उत्परिवर्तन सिद्धांत: ह्यूगो डी व्रीज़ ने बताया कि विकास अचानक होने वाले उत्परिवर्तनों (Mutation) के कारण होता है, न कि धीरे-धीरे होने वाले छोटे परिवर्तनों से। उन्होंने यह अध्ययन प्राइमरोज़ पौधे पर किया। उत्परिवर्तन जीन या गुणसूत्रों में होने वाले अचानक परिवर्तन हैं, जो वंशानुगत होते हैं।

3. डार्विन का सिद्धांत

चार्ल्स डार्विन ने अपने सिद्धांत को प्राकृतिक चयन का सिद्धांत कहा, जिसे "वंशानुगत परिवर्तन के साथ जीवों की उत्पत्ति" के नाम से भी जाना जाता है। डार्विन ने गैलापागोस द्वीप समूह में पाए जाने वाले फिंच पक्षियों के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला कि जीव अपने भोजन तथा वातावरण के अनुसार अपनी चोंच और शरीर का अनुकूलन कर लेते हैं।

डार्विन के सिद्धांत के प्रमुख चरण:

  1. अधिक उत्पादन (Overproduction): जीवों में अपनी जरूरत से अधिक संतति उत्पन्न करने की प्रवृत्ति होती है, जिसे ज्यामितीय वृद्धि कहते हैं।
  2. सीमित संसाधन और संघर्ष (Struggle for Existence): भोजन, स्थान और साथी जैसे सीमित साधनों के कारण जीवों के बीच संघर्ष होता है।
  3. भिन्नताएँ (Variation): जनसंख्या के सभी जीव समान नहीं होते, उनमें कुछ लाभदायक और कुछ हानिकारक भिन्नताएँ पाई जाती हैं।
  4. प्राकृतिक चयन (Natural Selection): जो जीव अपने वातावरण के साथ सर्वोत्तम अनुकूलन करते हैं, वे ही जीवित रहते हैं। इसी को "योग्यतम की उत्तरजीविता" (Survival of the Fittest) कहते हैं, यह शब्द हर्बर्ट स्पेंसर ने दिया।
  5. नई जातियों का निर्माण (Formation of New Species): लाभदायक भिन्नताओं की पीढ़ी दर पीढ़ी संचय से नई जातियों का विकास होता है।

उदाहरण:

  1. जिराफ की लंबी गर्दन – लैमार्क के अनुसार यह अभ्यास से आई, जबकि डार्विन के अनुसार यह प्राकृतिक चयन से विकसित हुई।
  2. बर्फीले इलाकों में सफेद फर वाले खरगोश शिकारियों से बच जाते हैं, इसलिए प्राकृतिक चयन उनका पक्ष लेता है।
  3. फिंच पक्षियों की विभिन्न चोंचें – अनुकूली विकिरण का उदाहरण।

डार्विन ने ही 'यौन चयन' (Sexual Selection) की अवधारणा भी दी, जिसमें जीव साथी चुनते समय कुछ विशेष गुणों को प्राथमिकता देते हैं। अल्फ्रेड वालेस ने भी स्वतंत्र रूप से प्राकृतिक चयन का सिद्धांत दिया, जिसके बाद डार्विन ने अपनी पुस्तक प्रकाशित की।

4. विकास के प्रमाण और साक्ष्य

विकास के प्रमाण विभिन्न विज्ञानों के माध्यम से प्राप्त होते हैं। इन साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि सभी जीवों का सामान्य पूर्वज रहा है तथा वे आपस में संबंधित हैं।

विकास के प्रमुख साक्ष्य:

मानव विकास की श्रृंखला: ड्रायोपिथेकस → रामापिथेकस → ऑस्ट्रेलोपिथेकस → होमो हैबिलिस → होमो इरेक्टस → होमो सेपियंस। पहली बार आग का उपयोग होमो इरेक्टस ने किया, जबकि होमो हैबिलिस ने सबसे पहले औजार बनाए।

5. त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: विकासवाद से जुड़े वैज्ञानिक और उनके योगदान

वैज्ञानिक योगदान
चार्ल्स डार्विन प्राकृतिक चयन का सिद्धांत, पुस्तक ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीसीज़ (1859)
जीन बैप्टिस्ट लैमार्क प्रयोग-अव्यय (उपयोग-अनुपयोग) का सिद्धांत
ह्यूगो डी व्रीज़ उत्परिवर्तन सिद्धांत
मिलर एवं उरे विद्युत स्पार्क द्वारा अमीनो अम्ल का निर्माण
हर्बर्ट स्पेंसर योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the Fittest) शब्द
अल्फ्रेड वालेस प्राकृतिक चयन का स्वतंत्र प्रतिपादन
ओपेरिन एवं हेल्डेन आदिम सूप सिद्धांत

तालिका 2: महत्वपूर्ण शब्द और उनके अर्थ

शब्द अर्थ
जीवाश्म मृत जीवों के चट्टानों में दबे कठोर अवशेष
समरूप (होमोलॉगस) अंग समान उत्पत्ति, भिन्न कार्य
समानवृत्ति (एनालॉगस) अंग भिन्न उत्पत्ति, समान कार्य
जीन पूल जनसंख्या के सभी जीनों का कुल समूह
अनुकूली विकिरण एक पूर्वज से अनेक जातियों का विकास
मध्यवर्ती जीवाश्म दो समूहों के बीच के लक्षण दिखाने वाला जीवाश्म

6. माइंड मैप

flowchart TD
    A[19.1 विकासवाद] --> B[परिचय]
    A --> C[मूल अवधारणा]
    A --> D[डार्विन सिद्धांत]
    A --> E[विकास के प्रमाण]
    C --> F[भिन्नता]
    C --> G[अनुकूलन]
    C --> H[जनसंख्या]
    D --> I[अधिक उत्पादन]
    D --> J[संघर्ष]
    D --> K[प्राकृतिक चयन]
    D --> L[नई जातियों का निर्माण]
    E --> M[जीवाश्म साक्ष्य]
    E --> N[समरूप अंग]
    E --> O[भ्रूणविज्ञानी साक्ष्य]
    E --> P[आणविक साक्ष्य]

7. महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

डार्विन का विकासवाद चक्र अधिक उत्पादन ज्यामितीय वृद्धि संघर्ष भिन्नताएँ प्राकृतिक चयन स्वर्ण नियम: डार्विन के सिद्धांत के चार चरणों अधिक उत्पादन, संघर्ष, भिन्नता और प्राकृतिक चयन का क्रम हमेशा याद रखें।

विकासवाद की समयरेखा जीवन की उत्पत्ति जल में सरल एककोशिकीय जीव विषमपोषी, अवायवीय बहुकोशिकीय जीव पौधे और जंतु मानव होमो सेपियंस स्वर्ण नियम: विकास की दिशा सदैव सरल से जटिल और निम्न से उच्च की ओर होती है, जल में जीवन की उत्पत्ति से आरंभ होती है।

8. सामान्य गलतियाँ

  1. लैमार्क और डार्विन के सिद्धांतों में भ्रम होना सबसे आम गलती है; याद रखें कि लैमार्क अर्जित लक्षणों और अंगों के प्रयोग-अव्यय पर बल देते हैं, जबकि डार्विन प्राकृतिक चयन पर।
  2. समरूप (होमोलॉगस) और समानवृत्ति (एनालॉगस) अंगों को अदला-बदली कर लेना, जैसे पक्षी और तितली के पंख को समरूप बताना, जो वास्तव में समानवृत्ति अंग हैं।
  3. "ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीसीज़" का प्रकाशन वर्ष 1859 को 1856 या 1871 समझ लेना।
  4. विकास को किसी व्यक्ति के जीवनकाल में होने वाला परिवर्तन मानना, जबकि विकास जनसंख्या में पीढ़ियों में होता है।
  5. उत्परिवर्तन (अचानक, वंशानुगत) और भिन्नता (छोटे अंतर) को एक ही समझ लेना।
  6. "योग्यतम की उत्तरजीविता" शब्द डार्विन का मानना, जबकि यह शब्द हर्बर्ट स्पेंसर ने दिया था।
  7. आर्कियोप्टेरिक्स को मछली और उभयचर के बीच का जीवाश्म मान लेना, जबकि यह सरीसृप और पक्षी के बीच का मध्यवर्ती जीवाश्म है।

9. परीक्षा युक्तियाँ

  1. वैज्ञानिकों और उनके योगदानों की तालिका 1 को बार-बार दोहराएं, क्योंकि परीक्षा में इसी से सीधे प्रश्न आते हैं।
  2. 1859 का वर्ष और "ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीसीज़" का नाम रट लें, यह सबसे अधिक पूछा जाने वाला तथ्य है।
  3. समरूप अंगों के उदाहरण (इंसान का हाथ, बल्ले का पंख, व्हेल का फ्लिपर) और समानवृत्ति अंगों के उदाहरण (पक्षी व तितली के पंख) याद रखें।
  4. लैमार्क के लिए जिराफ की गर्दन और डी व्रीज़ के लिए प्राइमरोज़ पौधे का उदाहरण हमेशा जोड़कर रखें।
  5. मानव विकास की श्रृंखला ड्रायोपिथेकस से होमो सेपियंस तक और होमो इरेक्टस के आग के उपयोग वाले तथ्य पर ध्यान दें।
  6. मिलर-उरे प्रयोग का परिणाम अमीनो अम्ल है, इसे जीवन की उत्पत्ति के प्रायोगिक प्रमाण के रूप में याद रखें।

10. निष्कर्ष

विकासवाद जीव विज्ञान की वह केंद्रीय अवधारणा है जो बताती है कि सभी जीव एक सामान्य पूर्वज से क्रमिक परिवर्तनों द्वारा विकसित हुए हैं, और डार्विन के प्राकृतिक चयन का सिद्धांत इसका सबसे स्वीकृत वैज्ञानिक आधार है। जीवाश्म, समरूप तथा समानवृत्ति अंग, भ्रूणविज्ञानी और आण्विक साक्ष्य मिलकर विकास की पुष्टि करते हैं। रेलवे ग्रुप D की परीक्षा के लिए वैज्ञानिकों के योगदान, प्रमुख तिथियों और अंगों के उदाहरणों को स्मरण रखना ही इस अध्याय से पूर्ण अंक प्राप्त करने की कुंजी है।