विषय: रेलवे NTPC – सामान्य जागरूकता (भारतीय भूगोल)
अध्याय: 14.5 जलवायु और मानसून
विषय-वस्तु: मानसून, ऋतुएँ
1. परिचय
भारत की जलवायु को 'मानसूनी जलवायु' (Monsoon Type Climate) कहा जाता है, जिसे कोपेन के वर्गीकरण में 'Am' श्रेणी में रखा जाता है। भारत में जलवायु की विविधता अत्यंत विशाल है—एक ओर थार मरुस्थल की चिलचिलाती गर्मी (50 डिग्री सेल्सियस तक) तो दूसरी ओर द्रास (लद्दाख) की कड़कड़ाती ठंड (शून्य से 40 डिग्री सेल्सियस नीचे)। यह विविधता अक्षांशीय विस्तार, समुद्र से दूरी, ऊँचाई, पर्वतों की स्थिति और पवन पट्टियों जैसे कारकों से उत्पन्न होती है। भारतीय जलवायु का सबसे महत्वपूर्ण तत्व दक्षिण-पश्चिम मानसून है, जो देश की कृषि, जल संसाधन और अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।
'मानसून' शब्द अरबी शब्द 'मौसम' से बना है, जिसका अर्थ है 'मौसमी पवन'। मानसून वह पवन तंत्र है जो ऋतु के अनुसार अपनी दिशा बदलती है—ग्रीष्म में समुद्र से स्थल की ओर (आर्द्र) और शीत में स्थल से समुद्र की ओर (शुष्क) बहती है। दक्षिण-पश्चिम मानसून जून से सितंबर तक चलता है और देश की कुल वर्षा का लगभग 75 प्रतिशत इसी अवधि में होती है। मानसून के आगमन (ऑनसेट), अग्रिम (प्रगति), निवर्तन (वापसी) और वर्षा के वितरण का अध्ययन RRB NTPC के प्रश्नों का प्रमुख स्रोत है।
भारत में चार प्रमुख ऋतुएँ मानी जाती हैं—शीत ऋतु (दिसंबर-फरवरी), ग्रीष्म ऋतु (मार्च-मई), वर्षा ऋतु (जून-सितंबर) और निवर्तन मानसून (अक्तूबर-नवंबर)। मानसून के दो अंग हैं—अरब सागरीय शाखा और बंगाल की खाड़ी की शाखा। अरब सागरीय शाखा केरल से होकर गुजरती है और बंगाल की खाड़ी की शाखा म्यांमार-बांग्लादेश होते हुए पूर्वोत्तर भारत में पहुँचती है। चेरापूंजी और मावसिनराम (मेघालय) विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्र हैं, जबकि जैसलमेर (राजस्थान) भारत का सबसे कम वर्षा वाला स्थान है।
2. जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक
भारत की जलवायु निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होती है:
अक्षांशीय विस्तार: कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य से गुजरती है, इसलिए देश का उत्तरी भाग समशीतोष्ण एवं दक्षिणी भाग उष्ण कटिबंधीय जलवायु में स्थित है।
ऊँचाई: हिमालय की ऊँचाई के कारण उत्तरी क्षेत्रों में तापमान कम रहता है; ऊँचाई के साथ तापमान घटता है।
दबाव और पवन: दक्षिण-पश्चिम मानसून, उत्तर-पूर्व मानसून, पश्चिमी विक्षोभ और चक्रवातीय तूफान जलवायु को निर्धारित करते हैं।
समुद्र से दूरी: समुद्र के निकटवर्ती क्षेत्रों (मुंबई, चेन्नई) में जलवायु सम (समुद्री) होती है, जबकि आंतरिक क्षेत्रों (दिल्ली, जयपुर) में अधिक उग्र (महाद्वीपीय) जलवायु होती है।
जेट स्ट्रीम: उप-उष्ण कटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (शीत ऋतु) तथा पूर्वी जेट स्ट्रीम (ग्रीष्म) मानसून की शुरुआत एवं गति को प्रभावित करती हैं।
पर्वतों की स्थिति: पश्चिमी घाट मानसूनी वर्षा को रोककर पश्चिमी तट पर अधिक वर्षा कराता है और पूर्वी भाग को वर्षा-छाया (रेन शैडो) क्षेत्र बनाता है।
इन कारकों के प्रभाव से भारत में दो प्रकार की वर्षा होती है—पर्वत-अवरोधी (ओरोग्राफिक) वर्षा, जो घाटों और पर्वतों की ढलानों पर होती है, तथा चक्रवातीय वर्षा, जो चक्रवातों के कारण होती है। संवहनीय वर्षा ग्रीष्म ऋतु में दोपहर बाद होने वाली तेज बारिश (काल बैसाखी) के रूप में देखी जाती है। भारत में वर्षा की मात्रा उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर (वास्तव में दक्षिण-पश्चिम से पूर्वोत्तर की ओर) बढ़ती जाती है, जिसका कारण मानसूनी पवनों की दिशा है।
3. मानसून तंत्र और ऋतुएँ
दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो शाखाओं का विवरण इस प्रकार है:
अरब सागरीय शाखा: यह शाखा अरब सागर से उठकर लगभग 1 जून को केरल तट पर पहुँचती है। यहाँ से यह पश्चिमी घाट को पार करती है, जिससे मुंबई, गोवा, कर्नाटक तट पर भारी वर्षा होती है। इस शाखा से गुजरात, राजस्थान तथा उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा होती है।
बंगाल की खाड़ी की शाखा: यह बंगाल की खाड़ी से उठकर म्यांमार और बांग्लादेश होते हुए पूर्वोत्तर भारत में प्रवेश करती है। यहाँ से यह गंगा के मैदान में पश्चिम की ओर बढ़ती है और पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश में वर्षा कराती है।
मानसून का अग्रिम: केरल से प्रारंभ होकर मानसून जून के अंत तक पूरे देश में फैल जाता है। मुंबई में लगभग 10 जून तक, दिल्ली में 29 जून तक तथा राजस्थान में जुलाई के प्रारंभ तक मानसून पहुँचता है।
मानसून का निवर्तन: अक्तूबर-नवंबर में मानसून लौटने लगता है। दक्षिणी प्रायद्वीप (तमिलनाडु) में इसी समय उत्तर-पूर्व मानसून से अधिक वर्षा होती है, इसलिए तमिलनाडु को 'मानसून का शीत क्षेत्र' कहा जाता है।
भारत की चार ऋतुओं का विवरण:
शीत ऋतु (दिसंबर-फरवरी): सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है; उत्तर भारत में ठंडी हवाएँ चलती हैं। पंजाब-हरियाणा में पश्चिमी विक्षोभ से हल्की वर्षा (महत्वपूर्ण गेहूँ के लिए) होती है।
ग्रीष्म ऋतु (मार्च-मई): तापमान अधिक होता है; उत्तर-पश्चिम में लू (गर्म हवाएँ) चलती हैं। बंगाल में काल बैसाखी (नोरवेस्टर) तेज आंधी-वर्षा लाती है; असम में 'बोरदोइचिला' तथा कर्नाटक में 'मैंगो शावर' प्रसिद्ध हैं।
वर्षा ऋतु (जून-सितंबर): दक्षिण-पश्चिम मानसून सक्रिय होता है; अधिकांश वर्षा इसी अवधि में होती है; कृषि का मुख्य आधार।
निवर्तन मानसून (अक्तूबर-नवंबर): मानसून लौटता है; तमिलनाडु में अधिक वर्षा; उत्तरी मैदान में 'अक्तूबर की गर्मी' (October Heat) महसूस होती है।
4. विशेष तथ्य और प्रभाव
मानसून एवं वर्षा से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य निम्न हैं:
चेरापूंजी और मावसिनराम (मेघालय): विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाले स्थान; मावसिनराम को विश्व का सबसे आर्द्र स्थान माना जाता है।
जैसलमेर (राजस्थान): भारत का सबसे कम वर्षा वाला स्थान; लेह (लद्दाख) भी अत्यंत कम वर्षा वाला क्षेत्र है।
औसत वार्षिक वर्षा: भारत की औसत वार्षिक वर्षा लगभग 119 सेमी मानी जाती है।
एल नीनो: प्रशांत महासागर में पेरू के तट के पास समुद्र का तापमान बढ़ने से मानसून कमजोर पड़ता है, जिससे भारत में सूखा पड़ने की संभावना बढ़ती है।
ला नीना: समुद्र के तापमान घटने से मानसून प्रबल होता है और अधिक वर्षा होती है।
आईटीसीजेड (ITCZ): भूमध्यरेखीय वर्षा पट्टी का उत्तर की ओर खिसकना मानसून के अग्रिम में सहायक होता है।
बुरहानपुर-अमरावती क्षेत्र: अरब सागरीय शाखा का एक भाग मध्य भारत में दो भागों में विभाजित होता है।
पश्चिमी विक्षोभ: शीत ऋतु में भूमध्यसागरीय क्षेत्र से आने वाली ये पवनें उत्तर-पश्चिम भारत में शीतकालीन वर्षा कराती हैं, जो गेहूँ की फसल के लिए लाभदायक है।
मानसून का भारत के जीवन पर व्यापक प्रभाव है—यह खरीफ फसलों (चावल, ज्वार, मक्का) की सिंचाई करता है, जल-विद्युत उत्पादन में सहायक है, जल-भंडारों को भरता है तथा नदियों में जल प्रवाह बनाए रखता है। मानसून में देरी या कमी से सूखा, फसलों की हानि तथा महंगाई होती है, जबकि अधिक वर्षा से बाढ़ और भूस्खलन होता है। इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था को 'मानसून की दासी' भी कहा जाता है।
5. त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ
तालिका 1
ऋतु
अवधि
प्रमुख विशेषता
शीत ऋतु
दिसंबर-फरवरी
पश्चिमी विक्षोभ, हल्की वर्षा
ग्रीष्म ऋतु
मार्च-मई
लू, काल बैसाखी, मैंगो शावर
वर्षा ऋतु
जून-सितंबर
दक्षिण-पश्चिम मानसून, 75% वर्षा
निवर्तन मानसून
अक्तूबर-नवंबर
तमिलनाडु में अधिक वर्षा
तालिका 2
मानसून/तत्व
विवरण
मानसून का आगमन
लगभग 1 जून, केरल तट
मानसून की शाखाएँ
अरब सागरीय व बंगाल की खाड़ी
सर्वाधिक वर्षा
मावसिनराम (मेघालय)
सबसे कम वर्षा
जैसलमेर (राजस्थान)
औसत वार्षिक वर्षा
लगभग 119 सेमी
एल नीनो का प्रभाव
मानसून कमजोर, सूखा
उत्तर-पूर्व मानसून
तमिलनाडु में वर्षा
6. माइंड मैप
flowchart TD
A[जलवायु और मानसून] --> B[जलवायु कारक]
B --> B1[अक्षांश]
B --> B2[ऊँचाई]
B --> B3[समुद्र से दूरी]
B --> B4[जेट स्ट्रीम]
A --> C[मानसून तंत्र]
C --> C1[अरब सागरीय शाखा]
C --> C2[बंगाल की खाड़ी शाखा]
C --> C3[आगमन 1 जून केरल]
C --> C4[निवर्तन अक्तूबर]
A --> D[ऋतुएँ]
D --> D1[शीत दिसंबर-फरवरी]
D --> D2[ग्रीष्म मार्च-मई]
D --> D3[वर्षा जून-सितंबर]
D --> D4[निवर्तन अक्तूबर-नवंबर]
A --> E[वर्षा के प्रकार]
E --> E1[पर्वत-अवरोधी]
E --> E2[संवहनीय]
E --> E3[चक्रवातीय]
A --> F[विशेष तत्व]
F --> F1[एल नीनो]
F --> F2[ला नीना]
F --> F3[पश्चिमी विक्षोभ]
7. महत्वपूर्ण आरेख (SVG)
8. सामान्य गलतियाँ
गलती: मानसून का आगमन मुंबई से बताना। मानसून सर्वप्रथम 1 जून को केरल तट पर पहुँचता है, मुंबई में लगभग 10 जून तक।
गलती: चेरापूंजी को विश्व का सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान बताना। वर्तमान में मावसिनराम (मेघालय) को सबसे आर्द्र स्थान माना जाता है, चेरापूंजी उसके बाद आता है।
गलती: तमिलनाडु में वर्षा का कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून बताना। तमिलनाडु में अधिक वर्षा उत्तर-पूर्व (निवर्तन) मानसून से होती है।
गलती: एल नीनो को अधिक वर्षा का कारण बताना। एल नीनो से मानसून कमजोर होकर सूखा पड़ता है; ला नीना से अधिक वर्षा होती है।
गलती: पश्चिमी विक्षोभ को ग्रीष्म ऋतु का तत्व बताना। पश्चिमी विक्षोभ शीत ऋतु में उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा कराता है।
गलती: जैसलमेर के स्थान पर लेह को भारत का सबसे शुष्क स्थान बताना। जैसलमेर (राजस्थान) भारत का सबसे कम वर्षा वाला स्थान माना जाता है।
गलती: काल बैसाखी को उत्तर भारत की हवा बताना। काल बैसाखी पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश का ग्रीष्मकालीन आंधी तंत्र है।
9. परीक्षा युक्तियाँ
मानसून के आगमन (1 जून केरल), अग्रिम और निवर्तन की तारीखें याद रखें; तारीखों पर आधारित प्रश्न बार-बार आते हैं।
दोनों शाखाओं (अरब सागरीय और बंगाल की खाड़ी) के मार्गों को मानचित्र पर स्मरण करें।
'सबसे अधिक वर्षा' (मावसिनराम) और 'सबसे कम वर्षा' (जैसलमेर) के जोड़े याद रखें।
एल नीनो/ला नीना के विपरीत प्रभावों को स्पष्ट रखें—एल नीनो = सूखा, ला नीना = अधिक वर्षा।
चार ऋतुओं के काल एवं विशेष पवनों (लू, काल बैसाखी, मैंगो शावर) को जोड़कर याद रखें।
निवर्तन मानसून और तमिलनाडु की वर्षा के संबंध को कभी न भूलें।
10. निष्कर्ष
भारत की जलवायु मानसूनी पवन तंत्र पर निर्भर करती है, जो देश की कृषि, जल संसाधन और अर्थव्यवस्था की नींव है। जलवायु के कारक, मानसून की शाखाएँ, चार ऋतुएँ तथा एल नीनो-ला नीना जैसे तत्व इस अध्याय के प्रमुख प्रश्न-स्रोत हैं। वर्षा के वितरण, अधिकतम-न्यूनतम वर्षा वाले क्षेत्रों तथा मौसमी पवनों के नामों को स्मरण करना परीक्षा की दृष्टि से अनिवार्य है। मानचित्र और स्मरण सूत्रों के सहारे इस अध्याय में पूर्ण पकड़ बनाई जा सकती है, जिससे RRB NTPC में सामान्य जागरूकता के अंक सुरक्षित हो सकते हैं।