विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: जीव विज्ञान – कोशिका ऊतक और जीवन प्रक्रियाएँ विषय-वस्तु: 17.10 उत्सर्जन
उत्सर्जन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपने शरीर से चयापचय की क्रियाओं से उत्पन्न हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालता है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 की परीक्षा में मानव उत्सर्जन तंत्र, वृक्क की संरचना, नेफ्रॉन, मूत्र निर्माण की प्रक्रिया तथा पादपों में उत्सर्जन से संबंधित प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं। श्वसन, पाचन और उपापचय से उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थ यदि शरीर में एकत्र हो जाएँ तो वे विषैले प्रभाव डालते हैं, इसलिए उनका नियमित निष्कासन आवश्यक है।
मानव शरीर में उत्सर्जन का मुख्य अंग वृक्क (गुर्दा) है। मनुष्य के शरीर में दो वृक्क होते हैं जो मूत्र बनाकर अपशिष्ट नाइट्रोजनयुक्त पदार्थों (मुख्यतः यूरिया) को बाहर निकालते हैं। वृक्क के अतिरिक्त फेफड़े CO2 का, त्वचा पसीने के रूप में अपशिष्ट का और यकृत अपशिष्ट पदार्थों को विषहीन करने का कार्य करता है। मानव उत्सर्जन तंत्र में दो वृक्क, दो मूत्रवाहिनियाँ (यूरेटर), मूत्राशय और मूत्रमार्ग शामिल हैं।
इस अध्याय में हम मानव उत्सर्जन तंत्र की संरचना, वृक्क की कार्यात्मक इकाई नेफ्रॉन, मूत्र निर्माण की प्रक्रिया (निस्यंदन, पुनःअवशोषण, स्रावण), तथा पादपों में उत्सर्जन के तरीकों का विस्तार से अध्ययन करेंगे। उत्सर्जन जल एवं लवण संतुलन को बनाए रखने में भी सहायक है, इसलिए यह प्रक्रिया शरीर के आंतरिक संतुलन (होमियोस्टेसिस) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मानव उत्सर्जन तंत्र के प्रमुख अंग निम्न हैं।
वृक्क (Kidney): ये रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर कमर के पास स्थित दो सेम के आकार के अंग हैं। प्रत्येक वृक्क की कार्यात्मक इकाई नेफ्रॉन है। वृक्क रक्त को निस्यंदित करके यूरिया जैसे अपशिष्ट पदार्थों को अलग करता है और मूत्र बनाता है। वृक्क में लगभग दस लाख नेफ्रॉन होते हैं। वृक्क का आंतरिक भाग मेडुला और बाहरी भाग कॉर्टेक्स कहलाता है।
मूत्रवाहिनी (Ureter): वृक्क से मूत्र को मूत्राशय तक ले जाने वाली दो पतली नलिकाएँ मूत्रवाहिनियाँ हैं। मूत्रवाहिनियों की दीवारों की पेशियाँ मूत्र को नीचे की ओर धकेलती हैं।
मूत्राशय (Urinary Bladder): यह मूत्र का संग्रहण करने वाली पेशीय थैली है। यह मूत्र को तब तक संग्रहित करता है जब तक उसे बाहर नहीं निकाला जाता।
मूत्रमार्ग (Urethra): मूत्राशय से मूत्र शरीर से बाहर मूत्रमार्ग द्वारा निकलता है। इस प्रक्रिया को मूत्रत्याग (यूरिनेशन) कहते हैं।
नेफ्रॉन (Nephron): नेफ्रॉन वृक्क की कार्यात्मक इकाई है। प्रत्येक नेफ्रॉन में बोमन संपुट (Bowman's Capsule), ग्लोमेरुलस, लंबी नलिका (प्रॉक्सिमल नलिका, हेनले लूप, डिस्टल नलिका) होते हैं। ग्लोमेरुलस केशिकाओं का जाल है जो बोमन संपुट में स्थित होता है। ग्लोमेरुलस तथा बोमन संपुट मिलकर माल्पीघी कणिका बनाते हैं।
मूत्र निर्माण की तीन मुख्य प्रक्रियाएँ:
निस्यंदन (Filtration): ग्लोमेरुलस में रक्तदाब के कारण रक्त का द्रव्य भाग, अपशिष्ट पदार्थ और छोटे अणु बोमन संपुट में छनकर जाते हैं। इस तरल को निस्यंदित (फिल्ट्रेट) कहते हैं। रक्त की बड़ी कोशिकाएँ और प्रोटीन इस प्रक्रिया में बाहर नहीं जाते।
पुनःअवशोषण (Reabsorption): निस्यंदित में उपस्थित उपयोगी पदार्थ जैसे ग्लूकोज, अमीनो अम्ल और अधिकांश जल तथा खनिज लवण नलिकाओं की दीवारों द्वारा पुनः रक्त में अवशोषित कर लिए जाते हैं। यह चयनात्मक प्रक्रिया है।
स्रावण (Secretion): नलिकाओं की कोशिकाएँ अतिरिक्त हाइड्रोजन आयन, अमोनिया तथा कुछ अन्य अपशिष्ट पदार्थों को रक्त से निकालकर मूत्र में मिलाती हैं। अंत में तैयार मूत्र एकत्र नलिका में जाकर वृक्क श्रोणि से होता हुआ मूत्रवाहिनी में पहुँचता है। सामान्य मनुष्य प्रतिदिन लगभग 1 से 1.5 लीटर मूत्र बनाता है।
पादपों में उत्सर्जन: पौधों में उत्सर्जन के विशेष अंग नहीं होते। पौधे अपने अपशिष्ट पदार्थों को विभिन्न विधियों से बाहर निकालते हैं — रंध्रों द्वारा CO2 और जलवाष्प का उत्सर्जन, पत्तियों की वृद्धावस्था में झड़ना, कुछ पौधों में रेजिन, गोंद, टैनिन तथा क्षारीय पदार्थों का पुरानी पत्तियों और छाल में संचयन। कुछ पौधे (लार्ज और अमरूद) अपने अतिरिक्त पानी को बूँदों के रूप में बाहर निकालते हैं, जिसे गटेशन कहते हैं।
अन्य मानव उत्सर्जन अंग: फेफड़े कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प का उत्सर्जन करते हैं। त्वचा की स्वेद ग्रंथियाँ पसीने के रूप में जल, लवण और थोड़ी मात्रा में यूरिया बाहर निकालती हैं। यकृत पित्त वर्णकों का निस्तारण करता है और अमोनिया को यूरिया में बदलकर कम विषैला बनाता है।
कृत्रिम वृक्क (डायलिसिस): जब वृक्क कार्य करना बंद कर देते हैं, तो डायलिसिस यंत्र द्वारा रक्त को बाहर निस्यंदित कर शुद्ध किया जाता है। यह प्रक्रिया हेमोडायलिसिस कहलाती है। इस यंत्र में अर्धपारगम्य झिल्ली का उपयोग होता है।
| अंग | संख्या | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| वृक्क | 2 | रक्त निस्यंदन, मूत्र निर्माण |
| मूत्रवाहिनी | 2 | मूत्र को मूत्राशय तक ले जाना |
| मूत्राशय | 1 | मूत्र का संग्रहण |
| मूत्रमार्ग | 1 | मूत्र को शरीर से बाहर निकालना |
| प्रक्रिया | स्थल | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| निस्यंदन | ग्लोमेरुलस | रक्त का छनना |
| पुनःअवशोषण | नेफ्रॉन नलिकाएँ | उपयोगी पदार्थों का रक्त में लौटना |
| स्रावण | नेफ्रॉन नलिकाएँ | अतिरिक्त अपशिष्ट का मूत्र में मिलना |
flowchart TD
A[उत्सर्जन] --> B[मानव उत्सर्जन तंत्र]
A --> C[पादप उत्सर्जन]
B --> B1[वृक्क - नेफ्रॉन]
B --> B2[मूत्रवाहिनी]
B --> B3[मूत्राशय]
B --> B4[मूत्रमार्ग]
B1 --> B11[निस्यंदन - ग्लोमेरुलस]
B1 --> B12[पुनःअवशोषण - नलिका]
B1 --> B13[स्रावण - नलिका]
C --> C1[रंध्र - CO2, जलवाष्प]
C --> C2[पत्ती झड़ना]
C --> C3[गोंद, रेजिन संचयन]
A --> D[अन्य अंग]
D --> D1[फेफड़े - CO2]
D --> D2[त्वचा - पसीना]
D --> D3[यकृत - विषहीन]
उत्सर्जन शरीर से हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने की आवश्यक प्रक्रिया है। मानव में मुख्य उत्सर्जन अंग वृक्क है जो रक्त को निस्यंदित कर मूत्र बनाता है। मूत्र निर्माण तीन प्रक्रियाओं — निस्यंदन, पुनःअवशोषण और स्रावण — द्वारा संपन्न होता है। नेफ्रॉन वृक्क की कार्यात्मक इकाई है जहाँ ये सभी प्रक्रियाएँ होती हैं। मूत्रवाहिनी, मूत्राशय और मूत्रमार्ग मूत्र के परिवहन एवं निष्कासन में सहायक हैं। पादपों में विशेष उत्सर्जन अंग नहीं होते, ये रंध्रों, पत्तियों और संचयन द्वारा अपशिष्ट निस्तारित करते हैं। फेफड़े, त्वचा और यकृत भी उत्सर्जन में सहायक हैं। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 की परीक्षा में उत्सर्जन तंत्र और नेफ्रॉन से संबंधित प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं। उत्सर्जन की स्पष्ट समझ शरीर के जल एवं लवण संतुलन तथा होमियोस्टेसिस को समझने में सहायक होती है।