विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: जीव विज्ञान – नियंत्रण जनन और आनुवंशिकता विषय-वस्तु: 18.6 मानव जनन तंत्र
मानव जनन तंत्र (human reproductive system) मनुष्य की उन संरचनाओं का समूह है जो युग्मकों के निर्माण, निषेचन तथा संतति उत्पन्न करने का कार्य करता है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में मानव जनन तंत्र के नर एवं मादा अंगों, उनके कार्यों तथा जनन प्रक्रिया से संबंधित प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं। मानव जनन आंतरिक निषेचन पर आधारित है। नर जनन तंत्र के मुख्य अंग वृषण हैं जो शुक्राणु तथा टेस्टोस्टेरोन हार्मोन बनाते हैं। मादा जनन तंत्र के मुख्य अंग अंडाशय हैं जो अंडाणु तथा एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन बनाते हैं। परीक्षा की दृष्टि से अंगों के नाम, स्थान तथा कार्य सबसे महत्वपूर्ण हैं।
मानव जनन तंत्र का अध्ययन दो भागों में होता है — नर जनन तंत्र और मादा जनन तंत्र। नर जनन तंत्र का मुख्य कार्य शुक्राणुओं का निर्माण तथा उन्हें मादा के शरीर तक पहुँचाना है। मादा जनन तंत्र का मुख्य कार्य अंडाणु का निर्माण, निषेचन की सुविधा, भ्रूण का पोषण तथा शिशु का जन्म है। यह अध्याय निषेचन और जनन स्वास्थ्य जैसे आगामी विषयों की नींव है। इसलिए मानव जनन तंत्र के अंगों की संरचना तथा कार्य की सटीक जानकारी अत्यंत आवश्यक है।
इस अध्याय में हम नर जनन तंत्र के अंग — वृषण, शुक्रवाहिका, शुक्राशय, प्रोस्टेट ग्रंथि, मूत्रमार्ग — तथा मादा जनन तंत्र के अंग — अंडाशय, डिंबवाहिनी (फैलोपियन नलिका), गर्भाशय, योनि — का विस्तार से अध्ययन करेंगे। साथ ही शुक्राणु तथा अंडाणु की संरचना और मासिक धर्म चक्र को भी समझेंगे। इन सभी तथ्यों की पकड़ परीक्षा में निश्चित अंक दिलाती है।
वृषण (Testes): नर जनन तंत्र के प्रमुख अंग वृषण हैं, जो एक जोड़ी होते हैं। ये शरीर के बाहर अंडकोष (scrotum) में स्थित होते हैं। वृषण में शुक्राणुजनन (spermatogenesis) होता है, जिससे शुक्राणु बनते हैं। वृषण में लेडिग कोशिकाएँ टेस्टोस्टेरोन हार्मोन स्रावित करती हैं, जो पुरुषों के माध्यमिक लैंगिक लक्षणों — दाढ़ी-मूँछ, गहरी आवाज, पेशियों का विकास — के लिए उत्तरदायी है। वृषण के अंदर असंख्य शुक्र नलिकाएँ (seminiferous tubules) होती हैं, जिनमें शुक्राणु बनते हैं। अंडकोष में वृषण इसलिए स्थित होते हैं ताकि शुक्राणु निर्माण के लिए आवश्यक तापमान (शरीर के तापमान से 1-2 डिग्री कम) बना रहे।
शुक्रवाहिका (Vas Deferens): यह शुक्राणुओं को वृषण से मूत्रमार्ग तक ले जाने वाली नलिका है। शुक्रवाहिका के रास्ते में शुक्राशय (seminal vesicle) से स्राव मिलता है, जो शुक्राणुओं को पोषण देता है।
सहायक ग्रंथियाँ: शुक्राशय तथा प्रोस्टेट ग्रंथि सहायक ग्रंथियाँ हैं। प्रोस्टेट ग्रंथि शुक्राशय के साथ मिलकर वीर्य द्रव (seminal fluid) बनाती है। शुक्राणु + सहायक ग्रंथियों का स्राव = वीर्य (semen)। वीर्य शुक्राणुओं को पोषण तथा सुरक्षा प्रदान करता है।
मूत्रमार्ग (Urethra): यह वीर्य तथा मूत्र दोनों के बाहर निकलने का मार्ग है। इसे नर जनन तंत्र का अंतिम भाग कहा जाता है।
शुक्राणु की संरचना: शुक्राणु तीन भागों से बना होता है — शीर्ष (head), मध्य खंड (middle piece) और पुच्छ (tail)। शीर्ष में केंद्रक होता है, मध्य खंड में माइटोकॉन्ड्रिया होते हैं जो ऊर्जा प्रदान करते हैं, और पुच्छ शुक्राणु को तैरने में सहायता करती है। शुक्राणु अत्यंत सूक्ष्म होते हैं और उनकी संख्या प्रतिदिन लाखों में होती है। शुक्राणु की पुच्छ गति से तैरकर अंडाणु तक पहुँचता है।
अंडाशय (Ovaries): मादा जनन तंत्र के प्रमुख अंग अंडाशय हैं, जो एक जोड़ी होते हैं। ये उदर गुहा में गर्भाशय के दोनों ओर स्थित होते हैं। अंडाशय में अंडजनन (oogenesis) होता है, जिससे अंडाणु बनते हैं। अंडाशय एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरोन हार्मोन भी स्रावित करता है। एस्ट्रोजन स्त्रियों के माध्यमिक लैंगिक लक्षणों — स्तनों का विकास, श्रोणि का चौड़ा होना — के लिए उत्तरदायी है। प्रोजेस्टेरोन गर्भावस्था को बनाए रखने में सहायक है। सामान्यतः प्रत्येक मासिक धर्म चक्र में एक अंडाणु परिपक्व होता है।
डिंबवाहिनी (Oviduct / Fallopian Tube): अंडाशय से निकला अंडाणु डिंबवाहिनी में प्रवेश करता है। डिंबवाहिनी अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। निषेचन सामान्यतः डिंबवाहिनी (फैलोपियन नलिका) में होता है। डिंबवाहिनी की भीतरी दीवार पर सिलिया (cilia) होती हैं, जो अंडाणु को गर्भाशय की ओर ले जाती हैं।
गर्भाशय (Uterus): गर्भाशय नाशपाती के आकार का अंग है, जिसमें भ्रूण का विकास होता है। गर्भाशय की मोटी पेशीय दीवार होती है, जो प्रसव के समय शिशु को बाहर धकेलती है। गर्भाशय की आंतरिक परत को अंत:स्तर (endometrium) कहते हैं, जो प्रत्येक मासिक चक्र में मोटी होती है और निषेचन न होने पर टूटकर बह जाती है, जिसे मासिक धर्म (menstruation) कहते हैं। गर्भाशय गर्भावस्था में भ्रूण का पोषण प्लेसेंटा के माध्यम से करता है।
योनि (Vagina): यह गर्भाशय से बाहर की ओर जाने वाली नली है। यह शुक्राणुओं के प्रवेश, मासिक धर्म के रक्त निकलने तथा प्रसव के मार्ग का कार्य करती है। योनि शिशु के जन्म का मार्ग है।
अंडाणु की संरचना: अंडाणु शरीर की सबसे बड़ी कोशिका है, जो गोल आकार की होती है। इसमें भ्रूण के विकास के लिए पोषक पदार्थ जर्दी (yolk) होता है। अंडाणु में केवल एक जीनतंत्र (haploid) गुणसूत्र समूह होता है।
यौन परिपक्वता (Puberty): जिस आयु में जनन अंग पूर्ण रूप से विकसित होने लगते हैं, उसे यौन परिपक्वता कहते हैं। लड़कों में यह सामान्यतः 13-14 वर्ष तथा लड़कियों में 10-12 वर्ष की आयु में होती है। इस अवधि में हार्मोन के प्रभाव से माध्यमिक लैंगिक लक्षण विकसित होते हैं। लड़कों में टेस्टोस्टेरोन तथा लड़कियों में एस्ट्रोजन की सक्रियता बढ़ती है।
मासिक धर्म चक्र (Menstrual Cycle): यह लगभग 28 दिनों का चक्र होता है, जिसमें अंडाशय तथा गर्भाशय में विभिन्न परिवर्तन होते हैं। इस चक्र के मध्य में (14वें दिन) अंडाशय से अंडाणु निकलता है, इसे डिंबोत्सर्जन (ovulation) कहते हैं। यदि इस समय निषेचन होता है तो गर्भावस्था होती है, अन्यथा गर्भाशय की परत टूटकर रक्त के साथ बाहर निकल जाती है, जिसे मासिक धर्म (मासिक स्राव) कहते हैं। मासिक धर्म सामान्यतः 3 से 5 दिन तक रहता है। मासिक धर्म चक्र में एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरोन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
जनन की प्रक्रिया: संभोग के समय पुरुष के वीर्य में उपस्थित शुक्राणु योनि में पहुँचते हैं। शुक्राणु गर्भाशय होते हुए डिंबवाहिनी में पहुँचते हैं, जहाँ अंडाणु से निषेचन होता है। निषेचन के बाद बना युग्मज विभाजित होकर भ्रूण बनता है, जो गर्भाशय की दीवार में स्थापित होता है। भ्रूण का पोषण प्लेसेंटा (अपरा) द्वारा होता है। लगभग 9 माह (गर्भकाल) के बाद प्रसव होता है।
मानव जनन तंत्र की स्वच्छता: जनन तंत्र की स्वच्छता रखना अत्यंत आवश्यक है। खराब स्वच्छता से संक्रमण तथा जनन रोग हो सकते हैं। इसीलिए जनन स्वास्थ्य विषय में स्वच्छता तथा संक्रमण से बचाव पर बल दिया जाता है।
| अंग | स्थान | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| वृषण | अंडकोष में | शुक्राणु और टेस्टोस्टेरोन निर्माण |
| शुक्रवाहिका | वृषण से मूत्रमार्ग | शुक्राणु का संचरण |
| शुक्राशय | शुक्रवाहिका के पास | वीर्य स्राव |
| प्रोस्टेट ग्रंथि | मूत्राशय के नीचे | वीर्य द्रव निर्माण |
| मूत्रमार्ग | लिंग के भीतर | वीर्य व मूत्र का मार्ग |
| अंग | स्थान | मुख्य कार्य |
|---|---|---|
| अंडाशय | गर्भाशय के दोनों ओर | अंडाणु व हार्मोन निर्माण |
| डिंबवाहिनी | अंडाशय से गर्भाशय | निषेचन का स्थान |
| गर्भाशय | श्रोणि में | भ्रूण का विकास |
| योनि | गर्भाशय से बाहर | जन्म मार्ग |
flowchart TD
A[मानव जनन तंत्र] --> B[नर जनन तंत्र]
A --> C[मादा जनन तंत्र]
A --> D[जनन प्रक्रिया]
B --> B1[वृषण - शुक्राणु, टेस्टोस्टेरोन]
B --> B2[शुक्रवाहिका]
B --> B3[शुक्राशय]
B --> B4[प्रोस्टेट ग्रंथि]
B --> B5[मूत्रमार्ग]
C --> C1[अंडाशय - अंडाणु, एस्ट्रोजन]
C --> C2[डिंबवाहिनी - निषेचन]
C --> C3[गर्भाशय - भ्रूण विकास]
C --> C4[योनि - जन्म मार्ग]
D --> D1[निषेचन]
D --> D2[युग्मज → भ्रूण]
D --> D3[प्लेसेंटा - पोषण]
D --> D4[प्रसव]
A --> E[मासिक धर्म चक्र]
E --> E1[डिंबोत्सर्जन - 14वाँ दिन]
मानव जनन तंत्र जीव विज्ञान का वह विषय है जो मनुष्य की संतति उत्पन्न करने की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है। इस अध्याय में हमने नर जनन तंत्र के अंगों — वृषण, शुक्रवाहिका, शुक्राशय, प्रोस्टेट ग्रंथि, मूत्रमार्ग — तथा मादा जनन तंत्र के अंगों — अंडाशय, डिंबवाहिनी, गर्भाशय, योनि — का विस्तार से अध्ययन किया। निषेचन डिंबवाहिनी में होता है और भ्रूण का विकास गर्भाशय में होता है। मासिक धर्म चक्र लगभग 28 दिनों का होता है, जिसमें 14वें दिन डिंबोत्सर्जन होता है। शुक्राणु तथा अंडाणु की संरचना और हार्मोन की भूमिका भी हमने समझी। रेलवे टेक्नीशियन परीक्षा में इस विषय से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं, अतः अंगों के नाम, स्थान तथा कार्य का नियमित अभ्यास करना चाहिए।