विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: जीव विज्ञान – विकास और पर्यावरण विषय-वस्तु: 19.2 प्राकृतिक चयन
प्राकृतिक चयन (Natural Selection) विकासवाद का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और स्वीकृत सिद्धांत है। इसे चार्ल्स डार्विन ने सन् 1859 में अपनी पुस्तक 'ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज़' में प्रस्तुत किया। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में प्राकृतिक चयन से संबंधित प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं। प्राकृतिक चयन का अर्थ है कि प्रकृति उन जीवों का चयन करती है जो अपने पर्यावरण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं। जो जीव पर्यावरण के अनुकूल नहीं होते, वे धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the Fittest) भी कहा जाता है।
प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया को समझने के लिए जनसंख्या में विभिन्नता (Variation) को समझना आवश्यक है। एक ही जाति के जीवों में पाए जाने वाले लक्षणों में अंतर को विभिन्नता कहते हैं। ये विभिन्नताएँ यौन जनन, उत्परिवर्तन और जीन पुनर्संयोजन के कारण उत्पन्न होती हैं। जनसंख्या में कुछ जीवों में ऐसे लक्षण होते हैं जो उन्हें पर्यावरणीय परिस्थितियों में जीवित रहने में सहायता करते हैं। ऐसे जीव अधिक संतान उत्पन्न करते हैं और उनके लक्षण अगली पीढ़ी में स्थानांतरित होते जाते हैं। इस प्रकार उपयोगी लक्षणों वाले जीवों की संख्या पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती रहती है।
इस अध्याय में हम प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया, डार्विनवाद के प्रमुख बिंदु, बेट्टी मोथ का क्लासिक उदाहरण, योग्यतम की उत्तरजीविता तथा जिराफ़ की लंबी गर्दन के उदाहरण का अध्ययन करेंगे। प्राकृतिक चयन की समझ विकासवाद और अनुकूलन से सीधे जुड़ी है, इसलिए इसे अगले अध्याय जीवाश्म और अनुकूलन की नींव माना जाता है। परीक्षा में इस अध्याय से तथ्यात्मक प्रश्न, उदाहरण आधारित प्रश्न और तुलनात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया क्रमबद्ध रूप से निम्नलिखित चरणों में घटित होती है। इन चरणों को समझना परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है।
पहला चरण: अतिजनन (Overproduction): सभी जीवों की अपनी सामर्थ्य से अधिक संतान उत्पन्न करने की प्रवृत्ति होती है। उदाहरण के लिए, एक मछली एक बार में सैकड़ों अंडे देती है। यदि सभी संतानें जीवित रहें तो संसाधनों पर दबाव बढ़ जाएगा। अतिजनन से जनसंख्या में तेजी से वृद्धि होती है।
दूसरा चरण: सीमित संसाधन (Limited Resources): पर्यावरण में उपलब्ध खाद्य, जल, स्थान और प्रकाश जैसे संसाधन सीमित होते हैं। जनसंख्या में वृद्धि के कारण संसाधनों की मांग बढ़ जाती है। सभी जीवों के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं होते।
तीसरा चरण: अस्तित्व के लिए संघर्ष (Struggle for Existence): सीमित संसाधनों के कारण जीवों में अस्तित्व के लिए संघर्ष उत्पन्न होता है। यह संघर्ष खाद्य, जल, स्थान और मादा के लिए होता है। जो जीव अधिक सशक्त या अधिक अनुकूल होते हैं, वे जीवित रहते हैं।
चौथा चरण: विभिन्नता (Variation): एक ही जनसंख्या में जीवों के बीच लक्षणों में अंतर पाया जाता है। कुछ जीवों में ऐसे लक्षण होते हैं जो उन्हें संघर्ष में लाभ देते हैं। जैसे तेज़ दौड़ना, अच्छा छलावरण (Camouflage), रोग प्रतिरोधक क्षमता आदि। ये लाभकारी विभिन्नताएँ संघर्ष में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
पाँचवाँ चरण: प्राकृतिक चयन (Natural Selection): प्रकृति उन जीवों का चयन करती है जिनमें लाभकारी विभिन्नताएँ होती हैं। जिन जीवों में हानिकारक विभिन्नताएँ होती हैं, वे संघर्ष में पीछे रह जाते हैं और समाप्त हो जाते हैं। इस प्रकार प्रकृति अनुकूल लक्षणों वाले जीवों का चयन करती है।
छठा चरण: योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the Fittest): जो जीव पर्यावरण के लिए सर्वाधिक अनुकूल होते हैं, वे जीवित रहते हैं। इन्हीं जीवों को सबसे उपयुक्त (Fittest) कहा जाता है। ये जीव अधिक संतान उत्पन्न करते हैं और अपने लाभकारी लक्षण अगली पीढ़ी में स्थानांतरित करते हैं।
सातवाँ चरण: लक्षणों की वंशागति (Inheritance): लाभकारी लक्षण जनक से संतान में स्थानांतरित होते हैं। कई पीढ़ियों तक यह प्रक्रिया चलती रहती है और अंततः उपयोगी लक्षण जनसंख्या में प्रचलित हो जाते हैं। लंबी अवधि में यही प्रक्रिया नई जातियों के विकास की ओर ले जाती है।
प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए कुछ क्लासिक उदाहरण परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं। इन्हें विस्तार से समझना आवश्यक है।
बेट्टी मोथ (Peppered Moth) का उदाहरण: इंग्लैंड के मैनचेस्टर क्षेत्र में औद्योगिक क्रांति से पहले वृक्षों की छाल पर सफेद रंग के लाइकेन पाए जाते थे। उस समय सफेद (हल्के रंग के) बेट्टी मोथ अधिक संख्या में थे क्योंकि सफेद छाल पर सफेद मोथ को पक्षी आसानी से नहीं देख पाते थे। औद्योगिक क्रांति के बाद कारखानों के धुएं से वृक्षों की छाल काली हो गई। अब काली छाल पर सफेद मोथ पक्षियों को स्पष्ट दिखने लगे, जिससे सफेद मोथ की संख्या घट गई और काले मोथ की संख्या बढ़ गई। यह घटना प्राकृतिक चयन का उत्कृष्ट उदाहरण है।
जिराफ़ की लंबी गर्दन: डार्विनवाद के अनुसार जिराफ़ों में गर्दन की लंबाई में विभिन्नता पाई जाती थी। जिन जिराफ़ों की गर्दन लंबी थी, वे ऊँचे वृक्षों की पत्तियाँ खा सकते थे और खाद्य की कमी में जीवित रह सकते थे। छोटी गर्दन वाले जिराफ़ों को खाद्य के लिए संघर्ष करना पड़ता था। इस प्रकार प्रकृति ने लंबी गर्दन वाले जिराफ़ों का चयन किया।
औषधि प्रतिरोधकता (Antibiotic Resistance): जीवाणुओं में कुछ जीवाणु औषधि (एंटीबायोटिक) के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। एंटीबायोटिक के प्रयोग से सामान्य जीवाणु मर जाते हैं परंतु प्रतिरोधी जीवाणु जीवित रहते हैं और गुणा करते हैं। यह प्राकृतिक चयन का एक आधुनिक उदाहरण है।
औद्योगिक मेलानिज्म (Industrial Melanism): बेट्टी मोथ के उदाहरण में दिखाई देने वाली इस घटना को औद्योगिक मेलानिज्म कहा जाता है। इसमें औद्योगिक प्रदूषण के कारण जीवों का रंग काला हो जाता है जिससे उन्हें काली पृष्ठभूमि पर छलावरण (Camouflage) मिलता है।
डार्विनवाद को अंग्रेज़ वैज्ञानिक ए.आर. वैलेस ने भी स्वतंत्र रूप से प्रतिपादित किया था। वैलेस और डार्विन दोनों ने प्राकृतिक चयन के सिद्धांत पर समान रूप से कार्य किया। इसलिए कभी-कभी इसे डार्विन-वैलेस सिद्धांत भी कहा जाता है। डार्विन ने 'डिसेंट ऑफ मैन' जैसी रचनाओं में मानव विकास का भी वर्णन किया।
डार्विनवाद की कुछ कमियाँ भी हैं जो परीक्षा में पूछी जाती हैं। सबसे बड़ी कमी यह है कि डार्विन यह नहीं समझा सके कि विभिन्नताएँ किस प्रकार उत्पन्न होती हैं। वे वंशागति की इकाई 'जीन' के बारे में नहीं जानते थे। डार्विनवाद इस बात की भी व्याख्या नहीं करता कि कुछ अंग जो आरंभ में अनुपयोगी होते हैं, वे कैसे उपयोगी बनते हैं। ये कमियाँ बाद में उत्परिवर्तनवाद और जीन सिद्धांत द्वारा पूरी की गईं।
कृत्रिम चयन (Artificial Selection): मनुष्य द्वारा अपनी आवश्यकताओं के अनुसार जीवों का चयन करके उनमें वांछित लक्षण विकसित करना कृत्रिम चयन कहलाता है। उदाहरण के लिए, मनुष्य ने कुत्तों की विभिन्न नस्लें, गेहूँ की उन्नत किस्में और गायों की दुधारू नस्लें कृत्रिम चयन द्वारा विकसित की हैं। कृत्रिम चयन में चयन मनुष्य करता है जबकि प्राकृतिक चयन में प्रकृति।
| क्रम | चरण | व्याख्या |
|---|---|---|
| 1 | अतिजनन | सामर्थ्य से अधिक संतान उत्पन्न करना |
| 2 | सीमित संसाधन | खाद्य, जल, स्थान की कमी |
| 3 | अस्तित्व का संघर्ष | संसाधनों के लिए जीवों में प्रतिस्पर्धा |
| 4 | विभिन्नता | जीवों में लक्षणों का अंतर |
| 5 | प्राकृतिक चयन | प्रकृति द्वारा अनुकूल जीवों का चयन |
| 6 | योग्यतम की उत्तरजीविता | अनुकूल जीवों का जीवित रहना |
| 7 | लक्षणों की वंशागति | लाभकारी लक्षणों का अगली पीढ़ी में स्थानांतरण |
| आधार | प्राकृतिक चयन | कृत्रिम चयन |
|---|---|---|
| चयनकर्ता | प्रकृति | मनुष्य |
| उद्देश्य | अस्तित्व | मानवीय आवश्यकता |
| समय | बहुत लंबी अवधि | अपेक्षाकृत कम अवधि |
| उदाहरण | बेट्टी मोथ का कालापन | कुत्तों की नस्लें, गेहूँ की किस्में |
| गति | धीमी | तेज़ |
flowchart TD
A[प्राकृतिक चयन] --> B[डार्विन 1859]
A --> C[प्रक्रिया]
A --> D[उदाहरण]
A --> E[तुलना]
C --> C1[अतिजनन]
C --> C2[सीमित संसाधन]
C --> C3[अस्तित्व का संघर्ष]
C --> C4[विभिन्नता]
C --> C5[प्रकृति का चयन]
C --> C6[योग्यतम की उत्तरजीविता]
D --> D1[बेट्टी मोथ]
D --> D2[जिराफ़ की लंबी गर्दन]
D --> D3[औषधि प्रतिरोधकता]
E --> E1[कृत्रिम चयन - मनुष्य]
E --> E2[प्राकृतिक चयन - प्रकृति]
प्राकृतिक चयन विकासवाद का वह तंत्र है जो बताता है कि पर्यावरण के अनुकूल लक्षणों वाले जीव जीवित रहकर अपने लक्षण अगली पीढ़ी में स्थानांतरित करते हैं। इस अध्याय में हमने अतिजनन से लेकर लक्षणों की वंशागति तक की पूरी प्रक्रिया को क्रमबद्ध रूप से समझा। बेट्टी मोथ, जिराफ़ की लंबी गर्दन और औषधि प्रतिरोधकता जैसे उदाहरणों ने यह स्पष्ट किया कि प्राकृतिक चयन वास्तविक जीवन में कैसे कार्य करता है। हमने डार्विनवाद की कमियों और कृत्रिम चयन की अवधारणा को भी जाना। प्राकृतिक चयन न केवल विकासवाद का सार है बल्कि जीवों के अनुकूलन, जीवाश्मों और पारितंत्र की समझ का भी आधार है। अगले अध्यायों में जीवाश्म, अनुकूलन, पारितंत्र और जैव विविधता का अध्ययन करते समय इस अध्याय की अवधारणाएँ बार-बार काम आएंगी।