विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: जीव विज्ञान – विकास और पर्यावरण विषय-वस्तु: 19.6 ऊर्जा प्रवाह
पारितंत्र की कार्यप्रणाली में ऊर्जा प्रवाह (Energy Flow) सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में ऊर्जा प्रवाह, 10 प्रतिशत नियम और ऊर्जा पिरामिड से संबंधित प्रश्न प्रतिवर्ष पूछे जाते हैं। पारितंत्र में ऊर्जा का मुख्य स्रोत सूर्य है। हरे पौधे सूर्य की ऊर्जा को प्रकाश संश्लेषण द्वारा रासायनिक ऊर्जा (खाद्य) में बदलते हैं। इसके बाद यह ऊर्जा खाद्य श्रृंखला के माध्यम से विभिन्न ट्रॉफिक स्तरों में प्रवाहित होती है। पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय (Unidirectional) होता है अर्थात यह केवल उत्पादक से उपभोक्ताओं की ओर प्रवाहित होती है और वापस नहीं लौटती।
ऊर्जा प्रवाह की दिशा को समझने के लिए ऊष्मागतिकी के नियम महत्वपूर्ण हैं। ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम के अनुसार ऊर्जा न तो उत्पन्न होती है और न ही नष्ट होती है, केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदलती है। द्वितीय नियम के अनुसार ऊर्जा का प्रत्येक रूपांतरण पूर्ण कुशल नहीं होता, कुछ ऊर्जा ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है। इसी कारण प्रत्येक ट्रॉफिक स्तर पर ऊर्जा की मात्रा घटती जाती है। पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह को दर्शाने के लिए ऊर्जा पिरामिड, संख्या पिरामिड और जैव द्रव्यमान पिरामिड का उपयोग किया जाता है।
इस अध्याय में हम ऊर्जा प्रवाह की दिशा, 10 प्रतिशत नियम (Lindeman का नियम), ऊर्जा पिरामिड, ट्रॉफिक स्तरों में ऊर्जा की हानि तथा पारिस्थितिकी पिरामिडों का अध्ययन करेंगे। ऊर्जा प्रवाह की समझ खाद्य श्रृंखला और पारितंत्र की संरचना को समझने के लिए आवश्यक है। रेलवे परीक्षा में इस अध्याय से तथ्यात्मक प्रश्न, गणना आधारित प्रश्न (10 प्रतिशत नियम) और पिरामिड से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।
पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह सदैव एकदिशीय होता है। ऊर्जा प्रवाह निम्नलिखित क्रम में होता है: सूर्य-उत्पादक-प्राथमिक उपभोक्ता-द्वितीयक उपभोक्ता-तृतीयक उपभोक्ता। सूर्य पारितंत्र का प्राथमिक ऊर्जा स्रोत है। सूर्य से प्राप्त कुल ऊर्जा में से केवल लगभग 1 प्रतिशत ऊर्जा ही हरे पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण में ग्रहण की जाती है। शेष ऊर्जा परावर्तित होती है या वायुमंडल में गर्मी के रूप में वापस लौटती है।
प्रथम ट्रॉफिक स्तर (उत्पादक): हरे पौधे सूर्य की प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलते हैं। इस प्रक्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं। उत्पादकों द्वारा संचित ऊर्जा का एक भाग उनके स्वयं के श्वसन में प्रयोग हो जाता है।
द्वितीय ट्रॉफिक स्तर (प्राथमिक उपभोक्ता): शाकाहारी जीव उत्पादकों को खाकर उनकी ऊर्जा ग्रहण करते हैं। परंतु उत्पादकों में संचित ऊर्जा का केवल 10 प्रतिशत ही शाकाहारियों तक पहुँचती है। शेष 90 प्रतिशत ऊर्जा पाचन में असमर्थ, श्वसन में और ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है।
तृतीय और चतुर्थ ट्रॉफिक स्तर: प्रत्येक अगले ट्रॉफिक स्तर पर ऊर्जा का केवल 10 प्रतिशत ही स्थानांतरित होता है। इसलिए ट्रॉफिक स्तर जितना ऊँचा होता है, वहाँ उपलब्ध ऊर्जा उतनी ही कम होती है। इसी कारण खाद्य श्रृंखला में चार से पाँच ट्रॉफिक स्तर से अधिक संभव नहीं होते। उच्च ट्रॉफिक स्तरों पर जीवों की संख्या भी कम होती है क्योंकि वहाँ ऊर्जा सीमित होती है।
ऊर्जा का अपघटकों में प्रवाह: अपघटक सभी ट्रॉफिक स्तरों के मृत जीवों और अपशिष्टों से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। अपघटकों को भी अपघटन के दौरान श्वसन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अपघटन से प्राप्त पोषक तत्व पुनः मिट्टी में लौट आते हैं जिन्हें उत्पादक फिर उपयोग करते हैं। परंतु ध्यान रहे, पोषक तत्व चक्रीय रूप में प्रवाहित होते हैं जबकि ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है।
दस प्रतिशत नियम (Ten Percent Law) पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह का सबसे महत्वपूर्ण नियम है। इस नियम को रेमंड लिंडमैन (Raymond Lindeman) ने सन् 1942 में प्रतिपादित किया था। इस नियम के अनुसार प्रत्येक ट्रॉफिक स्तर से अगले ट्रॉफिक स्तर तक ऊर्जा का केवल 10 प्रतिशत ही स्थानांतरित होता है। शेष 90 प्रतिशत ऊर्जा निम्नलिखित तरीकों से नष्ट होती है: श्वसन के दौरान ऊष्मा के रूप में, पाचन में असमर्थ पदार्थों के रूप में, अपशिष्ट (मल-मूत्र) के रूप में और सामान्य चयापचय क्रियाओं में।
दस प्रतिशत नियम की गणना: मान लीजिए उत्पादकों में 10000 किलो कैलोरी ऊर्जा संचित है। तब प्राथमिक उपभोक्ताओं को 10 प्रतिशत अर्थात 1000 किलो कैलोरी प्राप्त होगी। द्वितीयक उपभोक्ताओं को 1000 का 10 प्रतिशत अर्थात 100 किलो कैलोरी प्राप्त होगी। तृतीयक उपभोक्ताओं को 100 का 10 प्रतिशत अर्थात 10 किलो कैलोरी प्राप्त होगी। इस प्रकार प्रत्येक स्तर पर ऊर्जा दसवें भाग में घटती जाती है। रेलवे परीक्षा में इस प्रकार की गणना आधारित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
ऊर्जा पिरामिड (Pyramid of Energy): ऊर्जा पिरामिड में प्रत्येक ट्रॉफिक स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा की मात्रा को आधार से शीर्ष तक घटते क्रम में दर्शाया जाता है। ऊर्जा पिरामिड सदैव सीधा (Upright) होता है क्योंकि ऊर्जा का प्रवाह सदैव उत्पादक से उपभोक्ता की ओर घटता है। ऊर्जा पिरामिड कभी उल्टा नहीं हो सकता। पिरामिड का सबसे चौड़ा भाग उत्पादकों का होता है और सबसे संकरा भाग शीर्ष उपभोक्ताओं का।
संख्या पिरामिड (Pyramid of Numbers): इस पिरामिड में प्रत्येक ट्रॉफिक स्तर पर जीवों की संख्या को दर्शाया जाता है। सामान्यतः यह सीधा होता है परंतु कुछ पारितंत्रों में यह उल्टा भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, एक बड़े वृक्ष (उत्पादक) पर हजारों कीट रह सकते हैं, यहाँ उत्पादक एक है परंतु उपभोक्ता अनेक हैं, इसलिए पिरामिड उल्टा होता है।
जैव द्रव्यमान पिरामिड (Pyramid of Biomass): इस पिरामिड में प्रत्येक ट्रॉफिक स्तर पर उपलब्ध जैव द्रव्यमान (जीवों का कुल भार) को दर्शाया जाता है। यह भी सामान्यतः सीधा होता है। परंतु कुछ जलीय पारितंत्रों में यह उल्टा भी हो सकता है जहाँ उत्पादकों का द्रव्यमान उपभोक्ताओं से कम होता है।
पारिस्थितिकी पिरामिड तीन प्रकार के होते हैं और इन्हें समझना रेलवे परीक्षा के लिए आवश्यक है। पारिस्थितिकी पिरामिड की अवधारणा चार्ल्स एल्टन (Charles Elton) ने दी थी, इसलिए इन्हें एल्टन का पिरामिड भी कहते हैं। तीन प्रकार के पिरामिड इस प्रकार हैं: संख्या पिरामिड, जैव द्रव्यमान पिरामिड और ऊर्जा पिरामिड। इनमें से ऊर्जा पिरामिड सदैव सीधा होता है।
ऊर्जा हानि के मुख्य कारण: प्रत्येक ट्रॉफिक स्तर पर ऊर्जा की हानि के प्रमुख कारण हैं: श्वसन में ऊर्जा का व्यय, चयापचय क्रियाएँ, शरीर का तापमान बनाए रखना, पाचन में असमर्थ पदार्थ, अपशिष्ट पदार्थ (मल-मूत्र) और गति के लिए ऊर्जा। गर्म रक्त वाले जीव (स्तनधारी, पक्षी) शरीर का तापमान बनाए रखने में बहुत अधिक ऊर्जा खर्च करते हैं। ठंडे रक्त वाले जीवों (सरीसृप, मछली) की तुलना में गर्म रक्त वाले जीवों में ऊर्जा की हानि अधिक होती है।
ऊर्जा प्रवाह का महत्व: ऊर्जा प्रवाह पारितंत्र की स्थिरता और उत्पादकता को निर्धारित करता है। प्राथमिक उत्पादकता (Primary Productivity) पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण से संचित ऊर्जा की मात्रा है। पारितंत्र की कुल उत्पादकता उत्पादकों की ऊर्जा ग्रहण करने की क्षमता पर निर्भर करती है। रेलवे के संदर्भ में, रेलवे द्वारा किए गए वृक्षारोपण कार्यक्रम पारितंत्र की ऊर्जा आपूर्ति और उत्पादकता को बढ़ाने में सहायक होते हैं।
| नियम/अवधारणा | प्रतिपादक | वर्ष | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|---|
| दस प्रतिशत नियम | रेमंड लिंडमैन | 1942 | प्रत्येक स्तर पर 10 प्रतिशत ऊर्जा स्थानांतरित होती है |
| पारिस्थितिकी पिरामिड | चार्ल्स एल्टन | - | संख्या, द्रव्यमान, ऊर्जा के पिरामिड |
| ऊर्जा स्रोत | सूर्य | - | प्रकाश संश्लेषण में 1 प्रतिशत ऊर्जा ग्रहण |
| ट्रॉफिक स्तर | ऊर्जा (किलो कैलोरी) |
|---|---|
| उत्पादक | 10000 |
| प्राथमिक उपभोक्ता | 1000 |
| द्वितीयक उपभोक्ता | 100 |
| तृतीयक उपभोक्ता | 10 |
flowchart TD
A[ऊर्जा प्रवाह] --> B[स्रोत - सूर्य]
A --> C[दिशा - एकदिशीय]
A --> D[दस प्रतिशत नियम]
A --> E[पारिस्थितिकी पिरामिड]
B --> B1[प्रकाश संश्लेषण - 1 प्रतिशत]
D --> D1[रेमंड लिंडमैन 1942]
D --> D2[90 प्रतिशत ऊर्जा हानि]
E --> E1[संख्या पिरामिड]
E --> E2[जैव द्रव्यमान पिरामिड]
E --> E3[ऊर्जा पिरामिड - सदैव सीधा]
C --> C1[उत्पादक से उपभोक्ता की ओर]
ऊर्जा प्रवाह पारितंत्र की कार्यप्रणाली का केंद्र है। इस अध्याय में हमने सीखा कि ऊर्जा का मुख्य स्रोत सूर्य है और केवल लगभग 1 प्रतिशत ऊर्जा प्रकाश संश्लेषण द्वारा ग्रहण होती है। ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय है जो उत्पादक से उपभोक्ताओं की ओर होता है। दस प्रतिशत नियम के अनुसार प्रत्येक ट्रॉफिक स्तर पर केवल 10 प्रतिशत ऊर्जा ही अगले स्तर तक पहुँचती है, जिससे उच्च स्तरों पर ऊर्जा सीमित हो जाती है। पारिस्थितिकी पिरामिड ऊर्जा, संख्या और जैव द्रव्यमान की घटती प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। ऊर्जा पिरामिड सदैव सीधा होता है। ऊर्जा प्रवाह की समझ खाद्य श्रृंखला और पारितंत्र की उत्पादकता को समझने की कुंजी है। अगले अध्याय में हम प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन का अध्ययन करेंगे जो पारितंत्र के संतुलन को प्रभावित करने वाले कारक हैं।