विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: जीव विज्ञान – कोशिका ऊतक और जीवन प्रक्रियाएँ विषय-वस्तु: 17.6 पोषण और पाचन
पोषण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव भोजन ग्रहण करता है और उससे ऊर्जा तथा शरीर के निर्माण के लिए आवश्यक पदार्थ प्राप्त करता है। जीवन को बनाए रखने के लिए पोषण अनिवार्य है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 की परीक्षा में पोषण के प्रकार, पाचन तंत्र के अंग, पाचक एंजाइम और पोषक तत्वों से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं। पोषण दो प्रकार का होता है — स्वपोषी पोषण और परपोषी पोषण। जो जीव अपना भोजन स्वयं बनाते हैं वे स्वपोषी होते हैं, जबकि जो अन्य स्रोतों से भोजन प्राप्त करते हैं वे परपोषी होते हैं।
पाचन वह क्रिया है जिसमें जटिल भोज्य पदार्थ सरल, घुलनशील पदार्थों में टूटते हैं ताकि वे रक्त द्वारा अवशोषित हो सकें। पाचन में एंजाइम मुख्य भूमिका निभाते हैं। एंजाइम जैव उत्प्रेरक होते हैं जो पाचन की क्रिया को तीव्र करते हैं। मानव पाचन तंत्र मुख गुहा से आरंभ होकर गुदा तक फैला हुआ है, जिसमें मुख, ग्रासनली, आमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत तथा विभिन्न सहायक ग्रंथियाँ शामिल हैं।
इस अध्याय में हम पोषण के प्रकार, मानव पाचन तंत्र के अंग, पाचन में सहायक ग्रंथियाँ, पाचक एंजाइम तथा पोषक तत्वों का विस्तार से अध्ययन करेंगे। मानव में पाचन की संपूर्ण प्रक्रिया को समझना परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रत्येक अंग से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। पोषण और पाचन की समझ श्वसन, परिवहन और उत्सर्जन जैसी अन्य जीवन प्रक्रियाओं से सीधे जुड़ी है।
स्वपोषी पोषण (Autotrophic Nutrition): इस पोषण में जीव अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा जल, कार्बन डाइऑक्साइड और सूर्य प्रकाश की सहायता से कार्बोहाइड्रेट बनाते हैं। ऐसे जीव स्वपोषी कहलाते हैं। प्रकाश संश्लेषण में क्लोरोफिल आवश्यक होता है।
परपोषी पोषण (Heterotrophic Nutrition): इस पोषण में जीव अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते और अन्य स्रोतों से प्राप्त करते हैं। परपोषी पोषण के तीन प्रकार होते हैं — मृतजीवी (सैप्रोफाइटिक) पोषण जिसमें जीव मृत एवं सड़े-गले पदार्थों से भोजन प्राप्त करते हैं (कवक, बैक्टीरिया), परजीवी (पैरासिटिक) पोषण जिसमें जीव अन्य जीवों के शरीर से भोजन लेते हैं (अमरबेल, गोलकृमि) और सर्वभक्षी/मांसाहारी/शाकाहारी पोषण। कुछ पौधे जैसे पिचर प्लांट और वीनस फ्लाई ट्रैप कीटभक्षी होते हैं।
पादपों में पोषण की विशेष विधियाँ: कुछ पौधे नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए कीटों को पचाते हैं, इन्हें कीटभक्षी पौधे कहते हैं। कुछ पौधे सहजीवी संबंध द्वारा पोषण प्राप्त करते हैं, जैसे लाइकेन में कवक और शैवाल सहजीवी रूप से रहते हैं।
मुख गुहा (Buccal Cavity): पाचन मुख से आरंभ होता है। दाँत भोजन को चबाकर छोटे टुकड़ों में तोड़ते हैं, जीभ स्वाद का अनुभव करती है और भोजन को मिलाती है। लार ग्रंथियों से निकली लार में टायलिन (लार एमाइलेज) एंजाइम होता है जो स्टार्च को शर्करा में बदलना शुरू करता है। इस प्रकार कार्बोहाइड्रेट का पाचन मुख में ही आरंभ हो जाता है।
ग्रासनली (Oesophagus): मुख से भोजन ग्रासनली से होकर आमाशय तक पहुँचता है। ग्रासनली की दीवार की पेशियों के लयबद्ध संकुचन को क्रमाकुंचन (Peristalsis) कहते हैं जो भोजन को आगे धकेलता है।
आमाशय (Stomach): यह ग्रासनली के बाद स्थित पेशीय थैली है। यहाँ गैस्ट्रिक ग्रंथियाँ गैस्ट्रिक रस स्रावित करती हैं जिसमें हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, पेप्सिन और रेनिन होते हैं। HCl रोगाणुओं को नष्ट करता है और पेप्सिन को सक्रिय करता है। पेप्सिन प्रोटीन का पाचन करता है। आमाशय में भोजन से अर्धतरल कीमा (काइम) बनता है।
छोटी आंत (Small Intestine): यह पाचन का मुख्य स्थल है। यकृत का पित्त और अग्न्याशय का अग्न्याशयी रस छोटी आंत के आरंभिक भाग (ड्युओडेनम) में आकर वसा, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का पाचन पूर्ण करते हैं। छोटी आंत की आंतरिक परत पर अंगुली जैसे उभार होते हैं जिन्हें विलाई कहते हैं। विलाई की सहायता से पचा हुआ भोजन रक्त में अवशोषित होता है।
बड़ी आंत (Large Intestine): यहाँ जल और खनिज लवणों का अवशोषण होता है। बड़ी आंत के अंतिम भाग मलाशय (रेक्टम) में अनपचा मल एकत्र होता है जो गुदा द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है।
यकृत (Liver): यह शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह पित्त स्रावित करती है जो वसा के पाचन में सहायता करता है। पित्त पित्ताशय में संग्रहीत रहता है। पित्त में पाचक एंजाइम नहीं होते, यह केवल वसा का पायसीकरण करता है।
अग्न्याशय (Pancreas): यह अग्न्याशयी रस स्रावित करता है जिसमें ट्रिप्सिन (प्रोटीन पाचन), एमाइलेज (स्टार्च पाचन) और लाइपेज (वसा पाचन) जैसे एंजाइम होते हैं।
पोषक तत्व: कार्बोहाइड्रेट (ऊर्जा का मुख्य स्रोत), प्रोटीन (शरीर की वृद्धि व मरम्मत), वसा (ऊर्जा का संचित स्रोत), विटामिन, खनिज लवण, जल और रेशा प्रमुख पोषक तत्व हैं। इनमें से कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा को मुख्य पोषक तत्व तथा विटामिन और खनिज को सूक्ष्म पोषक तत्व कहते हैं।
| अंग | मुख्य स्राव/कार्य | पाचित पोषक तत्व |
|---|---|---|
| मुख गुहा | लार (टायलिन) | स्टार्च (कार्बोहाइड्रेट) |
| आमाशय | गैस्ट्रिक रस (HCl, पेप्सिन) | प्रोटीन |
| छोटी आंत | पित्त, अग्न्याशयी रस | वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट |
| बड़ी आंत | जल व खनिज अवशोषण | — |
| प्रकार | विधि | उदाहरण |
|---|---|---|
| स्वपोषी | प्रकाश संश्लेषण द्वारा स्वयं भोजन | हरे पौधे |
| मृतजीवी | मृत पदार्थों से | कवक, बैक्टीरिया |
| परजीवी | अन्य जीवों के शरीर से | अमरबेल, गोलकृमि |
| कीटभक्षी | कीटों को पचाकर | पिचर प्लांट |
flowchart TD
A[पोषण] --> B[स्वपोषी]
A --> C[परपोषी]
C --> C1[मृतजीवी - कवक]
C --> C2[परजीवी - अमरबेल]
C --> C3[कीटभक्षी - पिचर प्लांट]
A --> D[मानव पाचन तंत्र]
D --> D1[मुख - लार टायलिन]
D --> D2[आमाशय - पेप्सिन प्रोटीन]
D --> D3[छोटी आंत - पित्त, अग्न्याशयी रस]
D --> D4[बड़ी आंत - जल अवशोषण]
A --> E[पोषक तत्व]
E --> E1[कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा]
E --> E2[विटामिन, खनिज, जल]
पोषण और पाचन जीवन की मूलभूत प्रक्रियाएँ हैं जो शरीर को ऊर्जा और निर्माण सामग्री प्रदान करती हैं। पोषण स्वपोषी और परपोषी दो प्रकार का होता है, जिसमें हरे पौधे स्वपोषी तथा कवक, परजीवी और कीटभक्षी पौधे परपोषी होते हैं। मानव पाचन तंत्र मुख गुहा से गुदा तक विभिन्न अंगों में विभाजित है, जिसमें प्रत्येक अंग का विशिष्ट कार्य होता है। मुख में कार्बोहाइड्रेट, आमाशय में प्रोटीन और छोटी आंत में वसा, प्रोटीन तथा कार्बोहाइड्रेट का पाचन पूर्ण होता है। यकृत का पित्त और अग्न्याशय का रस पाचन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। छोटी आंत की विलाई पोषक तत्वों का अवशोषण करती हैं। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 की परीक्षा में पाचन से संबंधित प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं, अतः एंजाइम-पोषक तत्व के संबंध तथा अंगों के कार्यों की पकड़ बनाना आवश्यक है।