विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: रसायन विज्ञान – धातु कार्बन और आवर्त सारणी विषय-वस्तु: 16.9 एथेनॉल एथेनोइक अम्ल साबुन और डिटर्जेंट
कार्बनिक यौगिकों के व्यावहारिक उपयोगों में एथेनॉल (C2H5OH) और एथेनोइक अम्ल (CH3COOH) सबसे प्रचलित हैं। एथेनॉल को एल्कोहॉल या स्पिरिट भी कहा जाता है, जो किण्वन द्वारा शर्करा से प्राप्त होता है। एथेनोइक अम्ल को एसिटिक अम्ल भी कहते हैं, जो सिरके का मुख्य घटक है। ये दोनों यौगिक क्रमशः एल्कोहॉल तथा कार्बोक्सिलिक अम्ल वर्ग के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य हैं। साबुन और डिटर्जेंट भी कार्बनिक रसायन पर आधारित होते हैं, जिनका उपयोग सफाई में होता है।
साबुन वसा या तेलों के क्षार से सापोनीकरण द्वारा बनते हैं, जबकि डिटर्जेंट पेट्रोलियम से प्राप्त अम्लों के सोडियम या पोटैशियम लवण होते हैं। साबुन और डिटर्जेंट दोनों में सफाई का सिद्धांत समान है — इनके अणु के एक सिरे का जल से तथा दूसरे सिरे का ग्रीस या तेल से संबंध होता है। इसी कारण ये गंदगी और ग्रीस को जल में अलग करके धोने में सहायता करते हैं। रेलवे टेक्नीशियन के कार्यक्षेत्र में मशीनरी के कलपुर्जों की सफाई में डिटर्जेंट का उपयोग होता है।
रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में इस अध्याय से 2 से 3 प्रश्न पूछे जाते हैं। एथेनॉल के गुण एवं उपयोग, एथेनोइक अम्ल की अम्लीयता, साबुन बनाने की सापोनीकरण अभिक्रिया, साबुन एवं डिटर्जेंट में अंतर तथा कठोर जल में डिटर्जेंट की श्रेष्ठता संबंधी प्रश्न प्रमुख हैं। इन अवधारणाओं की स्पष्ट समझ परीक्षा में लाभ दिलाती है।
एथेनॉल (C2H5OH) एल्कोहॉल वर्ग का द्वितीय सदस्य है, जिसमें हाइड्रॉक्सिल समूह (-OH) उपस्थित होता है। इसका सामान्य सूत्र C2H5OH तथा संरचनात्मक सूत्र CH3-CH2-OH है। एथेनॉल रंगहीन, सुगंधित, तीखा-स्वाद वाला द्रव है। यह जल में पूर्णतः विलेय होता है तथा सामान्य ताप पर द्रव अवस्था में रहता है। एथेनॉल का क्वथनांक 351 K होता है। इसे स्पिरिट भी कहा जाता है और किण्वन विधि द्वारा गुड़ या शर्करा से प्राप्त किया जाता है।
एथेनॉल अत्यधिक ज्वलनशील है और नीली लौ के साथ जलता है। दहन में CO2 और जल बनते हैं: C2H5OH + 3O2 → 2CO2 + 3H2O। एथेनॉल के ऑक्सीकरण से एथेनोइक अम्ल बनता है। एथेनॉल का उपयोग विलायक के रूप में, औषधियों की बनावट में, परफ्यूम तथा रंग-रंजक उद्योग में होता है। रेलवे में प्रयोग होने वाले कुछ विलायकों तथा इंजन के शीतलक (एंटीफ्रीज़) में भी एथेनॉल अथवा संबंधित एल्कोहॉल का उपयोग होता है।
मेथिलेटेड स्पिरिट: शुद्ध एथेनॉल के अधिक उपयोग को रोकने तथा उसे पेय के रूप में अनुपयुक्त बनाने के लिए उसमें मेथेनॉल, पाइरीडीन जैसे पदार्थ मिलाए जाते हैं। इस मिश्रण को मेथिलेटेड स्पिरिट कहते हैं। मेथेनॉल विषैला होता है, इसलिए मेथिलेटेड स्पिरिट पीने योग्य नहीं होती और इसका उपयोग केवल औद्योगिक कार्यों में होता है। यह तथ्य परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है।
उदाहरण 1: एथेनॉल के जलने पर कौन-से उत्पाद बनते हैं?
हल: एथेनॉल पूर्ण दहन पर कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनाता है तथा ऊष्मा मुक्त करता है। समीकरण: C2H5OH + 3O2 → 2CO2 + 3H2O।
एथेनोइक अम्ल (CH3COOH) कार्बोक्सिलिक अम्ल वर्ग का द्वितीय सदस्य है, जिसमें कार्बोक्सिल समूह (-COOH) उपस्थित होता है। इसे एसिटिक अम्ल भी कहा जाता है। 5 से 8 प्रतिशत एथेनोइक अम्ल का जलीय विलयन ही सिरका है, जो भोजन में अम्लीय स्वाद देने के लिए प्रयोग होता है। शुद्ध एथेनोइक अम्ल को ग्लेशियल एसिटिक अम्ल कहते हैं, क्योंकि यह 290 K पर ठोस बर्फ जैसे क्रिस्टल में जम जाता है। इसका क्वथनांक 391 K है।
एथेनोइक अम्ल दुर्बल अम्ल है, परंतु यह धातुओं, क्षारों तथा कार्बोनेटों से अभिक्रिया करता है। धातु से अभिक्रिया में हाइड्रोजन मुक्त होती है, जैसे: 2CH3COOH + 2Na → 2CH3COONa + H2। क्षार से अभिक्रिया में लवण और जल बनते हैं। सोडियम बाइकार्बोनेट के साथ अभिक्रिया से कार्बन डाइऑक्साइड मुक्त होती है: CH3COOH + NaHCO3 → CH3COONa + H2O + CO2। यही अभिक्रिया सिरके तथा सोडा में अभिक्रिया पर फिज फिज शोर का कारण होती है।
एथेनोइक अम्ल का उपयोग सिरका बनाने में, खाद्य परिरक्षक के रूप में, औषधियों में, एसीटेट रेशों तथा विलायक बनाने में होता है। एथेनॉल के ऑक्सीकरण से एथेनोइक अम्ल प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त यह एस्टर निर्माण की अभिक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसमें अम्ल और एल्कोहॉल मिलकर एस्टर तथा जल बनाते हैं। एस्टर में फल जैसी सुगंध होती है।
उदाहरण 2: एथेनोइक अम्ल तथा सोडियम हाइड्रॉक्साइड की अभिक्रिया का समीकरण लिखिए।
हल: CH3COOH + NaOH → CH3COONa + H2O। इस अभिक्रिया में सोडियम एथेनोएट लवण और जल बनते हैं।
साबुन वसा (फैट) या तेल का सोडियम या पोटैशियम क्षार से सापोनीकरण करने पर बनता है। सापोनीकरण में वसा ग्लिसरॉल तथा साबुन में अपघटित होती है। सोडियम क्षार से बना साबुन कठोर तथा पोटैशियम क्षार से बना साबुन नरम होता है। साबुन के अणु में दो सिरे होते हैं — लंबी हाइड्रोकार्बन श्रृंखला (जल-विरोधी या हाइड्रोफोबिक) तथा ध्रुवीय लवण सिरा (जल-प्रेमी या हाइड्रोफिलिक)। यही संरचना साबुन को जल और तेल दोनों से जुड़ने में सक्षम बनाती है।
साबुन की सफाई का सिद्धांत यह है कि साबुन के हाइड्रोफोबिक सिरे ग्रीस या तेल की बूँदों से जुड़ते हैं, जबकि हाइड्रोफिलिक सिरे जल की ओर रहते हैं। इस प्रकार गंदगी के कण चारों ओर साबुन की परत से घिरकर पानी में निलंबित हो जाते हैं और धोने पर निकल जाते हैं। साबुन जल में मिसेल (micelle) बनाता है, जो ग्रीस के कणों को घेरकर उन्हें जल में बनाए रखता है।
कठोर जल और डिटर्जेंट: कठोर जल में कैल्शियम और मैग्नीशियम के लवण होते हैं। साबुन कठोर जल में इन धातुओं के अघुलनशील लवण (कैल्शियम-मैग्नीशियम साबुन) बनाकर झाग उत्पन्न नहीं कर पाता, जिससे सफाई क्षमता घट जाती है। डिटर्जेंट इस समस्या से मुक्त होते हैं, क्योंकि डिटर्जेंट कठोर जल में भी झाग बनाते हैं और गंदगी हटाते हैं। डिटर्जेंट पेट्रोलियम से प्राप्त सल्फोनिक अम्लों के सोडियम लवण होते हैं। रेलवे में मशीन के कलपुर्जों की सफाई हेतु डिटर्जेंट का प्रयोग किया जाता है।
| गुण | एथेनॉल C2H5OH | एथेनोइक अम्ल CH3COOH |
|---|---|---|
| क्रियात्मक समूह | -OH | -COOH |
| प्रकृति | उदासीन | अम्लीय |
| उपयोग | विलायक, परफ्यूम | सिरका, परिरक्षक |
| अभिक्रिया | दहन, ऑक्सीकरण | क्षार, कार्बोनेट, धातु |
| विशेषता | ज्वलनशील | 290 K पर ठोस |
| गुण | साबुन | डिटर्जेंट |
|---|---|---|
| स्रोत | वसा / तेल | पेट्रोलियम |
| निर्माण | सापोनीकरण | सल्फोनेशन |
| कठोर जल में | कम झाग | अच्छा झाग |
| प्रकृति | बायोडिग्रेडेबल | कम बायोडिग्रेडेबल |
| उपयोग | घरेलू कपड़ा धोना | मशीन, औद्योगिक सफाई |
flowchart TD
A[एथेनॉल एथेनोइक अम्ल साबुन डिटर्जेंट] --> B[एथेनॉल C2H5OH]
A --> C[एथेनोइक अम्ल CH3COOH]
A --> D[साबुन]
A --> E[डिटर्जेंट]
B --> B1[-OH समूह]
B --> B2[दहन उपयोग विलायक]
C --> C1[-COOH समूह]
C --> C2[सिरका ग्लेशियल]
D --> D1[सापोनीकरण]
D --> D2[हाइड्रोफोबिक + हाइड्रोफिलिक]
E --> E1[पेट्रोलियम से]
E --> E2[कठोर जल में उपयोगी]
एथेनॉल, एथेनोइक अम्ल, साबुन और डिटर्जेंट कार्बनिक रसायन के सबसे व्यावहारिक उपयोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस अध्याय में हमने एथेनॉल के गुण, दहन एवं उपयोग, एथेनोइक अम्ल की अम्लीय अभिक्रियाएँ तथा सिरका एवं ग्लेशियल एसिटिक अम्ल की अवधारणाएँ समझीं। साबुन के सापोनीकरण निर्माण, सफाई का सिद्धांत तथा साबुन और डिटर्जेंट में अंतर का भी अध्ययन किया। कठोर जल में डिटर्जेंट की श्रेष्ठता महत्वपूर्ण तथ्य है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में इन यौगिकों के गुण एवं उपयोग से 2 से 3 प्रश्न अवश्य आते हैं। इन अवधारणाओं की दृढ़ पकड़ से अभ्यर्थी परीक्षा में अंक अर्जित कर सकता है।