विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: सामान्य जागरूकता – भूगोल और राजव्यवस्था विषय-वस्तु: 21.7 मौलिक अधिकार और कर्तव्य
भारतीय संविधान के भाग III में अनुच्छेद 12 से 35 तक नागरिकों के मौलिक अधिकार दिए गए हैं। मौलिक अधिकार व्यक्ति के विकास के लिए आवश्यक मूलभूत अधिकार हैं, जिनकी रक्षा न्यायपालिका करती है। ये अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त हैं और इनका उल्लंघन होने पर नागरिक उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में जा सकता है। मूल रूप से सात मौलिक अधिकार थे, किंतु 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकारों से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया। वर्तमान में छह मौलिक अधिकार हैं। मौलिक अधिकारों की अवधारणा संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान (बिल ऑफ राइट्स) से प्रेरित है।
मौलिक अधिकारों के साथ-साथ संविधान में मौलिक कर्तव्यों की व्यवस्था भी की गई है। मौलिक कर्तव्य भाग IV-क में अनुच्छेद 51-क के अंतर्गत वर्णित हैं। मूल संविधान में मौलिक कर्तव्य नहीं थे। 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 10 मौलिक कर्तव्य जोड़े गए, जिनकी संख्या बाद में 86वें संशोधन (2002) द्वारा बढ़ाकर 11 कर दी गई। मौलिक कर्तव्यों की अवधारणा सोवियत संघ (रूस) के संविधान से ली गई है। मौलिक कर्तव्य नागरिकों को अपने देश के प्रति उत्तरदायित्व का स्मरण कराते हैं।
रेलवे परीक्षा में मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों से संबंधित प्रश्न प्रमुख रूप से पूछे जाते हैं, जिनमें प्रत्येक अधिकार के अनुच्छेद, बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसे रिट, अधिकारों का निलंबन और कर्तव्यों की संख्या शामिल हैं। राज्य के नीति-निदेशक तत्व (भाग IV, अनुच्छेद 36-51) भी इसी अध्याय का भाग हैं, जो सरकार को नीति बनाने में मार्गदर्शन करते हैं। इस अध्याय में हम छह मौलिक अधिकारों, रिटों, मौलिक कर्तव्यों और नीति-निदेशक तत्वों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18) पहला मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 14 के अनुसार विधि के समक्ष सभी व्यक्ति समान हैं। अनुच्छेद 15 में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव पर प्रतिबंध है। अनुच्छेद 16 में सार्वजनिक रोजगार के अवसरों में समानता प्रदान की गई है। अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को समाप्त कर दिया गया है, जिसे 'अस्पृश्यता का उन्मूलन' कहा जाता है। अनुच्छेद 18 में उपाधियों को समाप्त किया गया है (सैन्य और शैक्षिक उपाधियों को छोड़कर)। स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22) में अनुच्छेद 19 के अंतर्गत छह स्वतंत्रताएँ हैं – वाणी और अभिव्यक्ति, शांतिपूर्वक सभा, संघ या समितियाँ बनाना, देश में कहीं भी विचरण करना, निवास करना तथा कोई व्यवसाय या वृत्ति अपनाना। अनुच्छेद 21 के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को प्राण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा प्राप्त है और यह अनुच्छेद भारतीय संविधान का 'सबसे मूल्यवान अनुच्छेद' माना जाता है। अनुच्छेद 21-क शिक्षा के अधिकार (6 से 14 वर्ष) से संबंधित है।
शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24) में अनुच्छेद 23 में मानव व्यापार और बेगार पर प्रतिबंध तथा अनुच्छेद 24 में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक कारखानों में काम करने पर प्रतिबंध है। धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28) के अंतर्गत व्यक्ति किसी भी धर्म को मान सकता है, पालन कर सकता है और उसका प्रचार कर सकता है। सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30) के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति और भाषा की रक्षा करने तथा अपने शैक्षिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार है। संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32) सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार है, जिसे डॉ. अंबेडकर ने 'संविधान का हृदय और आत्मा' कहा है। अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की जा सकती है।
मौलिक अधिकारों का महत्व इस बात में है कि ये राज्य द्वारा अनुचित हस्तक्षेप से व्यक्ति की रक्षा करते हैं। मौलिक अधिकार उचित प्रतिबंधों के साथ उपलब्ध होते हैं, अर्थात इन पर उचित सीमाओं के साथ प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 21 को छोड़कर अन्य मौलिक अधिकारों को निलंबित किया जा सकता है। राष्ट्रीय आपातकाल में अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएँ स्वतः निलंबित हो जाती हैं। मौलिक अधिकार विदेशियों को भी प्राप्त हैं, किंतु अनुच्छेद 15, 16, 19 और 30 के अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को ही उपलब्ध हैं।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए पाँच प्रकार के रिट जारी कर सकते हैं। ये रिटें हैं – बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस), परमादेश (मैंडेमस), प्रतिषेध (प्रोहिबिशन), उत्प्रेषण (सर्टियोरारी) और अधिकार पृच्छा (क्वो वारंटो)। बंदी प्रत्यक्षीकरण का अर्थ है 'शरीर प्रस्तुत करो', जो अवैध रूप से बंदी बनाए गए व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करवाने के लिए जारी की जाती है। यह रिट व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा का सबसे प्रभावी साधन है। परमादेश (हम आदेश देते हैं) वह रिट है जो निम्न न्यायालय या सार्वजनिक अधिकारी को अपना कर्तव्य पालन करने का आदेश देती है।
प्रतिषेध (प्रोहिबिशन) रिट उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकने के लिए जारी की जाती है। यह रिट केवल न्यायिक या अर्ध-न्यायिक निकायों के विरुद्ध जारी होती है। उत्प्रेषण (सर्टियोरारी) रिट के द्वारा उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय के किसी मामले की सुनवाई को स्वयं स्थानांतरित कर लेता है या उसके निर्णय को रद्द कर देता है। अधिकार पृच्छा (क्वो वारंटो) रिट के द्वारा न्यायालय किसी सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति से उस पद पर काबिज होने के अधिकार के बारे में पूछताछ करता है। यदि व्यक्ति के पास वैध अधिकार नहीं है तो उसे पद से हटाया जा सकता है। परीक्षा में प्रत्येक रिट के उपयोग को उदाहरण सहित याद रखना आवश्यक है।
रिटों के प्रश्नों में अक्सर पूछा जाता है कि अवैध नजरबंदी के मामले में कौन-सी रिट जारी होती है, जिसका उत्तर 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' है। यदि कोई सार्वजनिक अधिकारी कर्तव्य पालन नहीं कर रहा है तो 'परमादेश' जारी होती है। अधिकार क्षेत्र से बाहर काम करने वाले न्यायालय के विरुद्ध 'प्रतिषेध' तथा निर्णय के स्थानांतरण के लिए 'उत्प्रेषण' जारी होती है। सार्वजनिक पद पर अवैध कब्जे के प्रश्न में 'अधिकार पृच्छा' रिट का उल्लेख होता है। भारत में रिटों की अवधारणा ब्रिटिश कानून से ली गई है, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय को 'रिट का संरक्षक' कहा जाता है।
मौलिक कर्तव्य भाग IV-क में अनुच्छेद 51-क के अंतर्गत दिए गए हैं। 42वें संविधान संशोधन (1976) में स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के आधार पर 10 मौलिक कर्तव्य जोड़े गए थे और 86वें संशोधन (2002) द्वारा 'माता-पिता या अभिभावक का 6 से 14 वर्ष के बच्चे को शिक्षा प्रदान करने का कर्तव्य' जोड़कर कुल 11 कर्तव्य कर दिए गए। प्रमुख कर्तव्यों में संविधान का सम्मान, राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज का सम्मान, राष्ट्र की रक्षा, साम्प्रदायिक सद्भाव, प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा शामिल हैं। मौलिक कर्तव्यों की अवधारणा सोवियत संघ के संविधान से ली गई है।
राज्य के नीति-निदेशक तत्व भाग IV (अनुच्छेद 36 से 51) में वर्णित हैं, जिनकी अवधारणा आयरलैंड के संविधान से ली गई है। ये तत्व राज्य को नीति बनाने में मार्गदर्शन करते हैं, किंतु इन्हें न्यायालय में लागू नहीं कराया जा सकता, अतः ये 'गैर-न्यायसंगत' हैं। प्रमुख नीति-निदेशक तत्व हैं – ग्राम पंचायतों का संगठन (अनुच्छेद 40), समान कार्य के लिए समान वेतन (अनुच्छेद 39), बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा (अनुच्छेद 45), गाय सहित पशुओं के संरक्षण के लिए प्रयास (अनुच्छेद 48), पर्यावरण की रक्षा (अनुच्छेद 48-क) तथा अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना (अनुच्छेद 51)। ये तत्व सरकार के लिए दिशा-निर्देश हैं, जो 'सामाजिक और आर्थिक न्याय' के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होते हैं।
मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्वों के बीच मुख्य अंतर यह है कि मौलिक अधिकार न्यायसंगत (लागू करने योग्य) हैं, जबकि नीति-निदेशक तत्व गैर-न्यायसंगत हैं। मौलिक अधिकार व्यक्ति के अधिकार हैं, जबकि नीति-निदेशक तत्व समाज के कल्याण से संबंधित हैं। वर्तमान में इन दोनों में कम विरोधाभास रह गया है और न्यायालयों ने कई नीति-निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए मौलिक अधिकारों के विस्तार की व्याख्या की है। रेलवे परीक्षा में मौलिक कर्तव्यों की संख्या, नीति-निदेशक तत्वों के अनुच्छेद और मौलिक अधिकारों के अनुच्छेदों के प्रश्न सबसे अधिक पूछे जाते हैं।
| मौलिक अधिकार | अनुच्छेद | मुख्य प्रावधान |
|---|---|---|
| समानता का अधिकार | 14-18 | विधि के समक्ष समानता, अस्पृश्यता का उन्मूलन |
| स्वतंत्रता का अधिकार | 19-22 | छह स्वतंत्रताएँ, जीवन का अधिकार (अ. 21) |
| शोषण के विरुद्ध अधिकार | 23-24 | मानव व्यापार और बेगार पर प्रतिबंध |
| धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार | 25-28 | धर्म मानने, पालन करने की स्वतंत्रता |
| सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार | 29-30 | अल्पसंख्यकों की संस्कृति व संस्थान |
| संवैधानिक उपचारों का अधिकार | 32 | रिटें, संविधान का हृदय और आत्मा |
| रिट | अर्थ | उपयोग |
|---|---|---|
| बंदी प्रत्यक्षीकरण | शरीर प्रस्तुत करो | अवैध बंदी की रिहाई |
| परमादेश | हम आदेश देते हैं | कर्तव्य पालन कराना |
| प्रतिषेध | रोकना | अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोक |
| उत्प्रेषण | स्थानांतरण | निर्णय को रद्द करना/स्थानांतरित करना |
| अधिकार पृच्छा | किस अधिकार से | पद पर अवैध कब्जे की जाँच |
flowchart TD
A[मौलिक अधिकार और कर्तव्य] --> B[भाग III - मौलिक अधिकार]
A --> C[भाग IV - नीति-निदेशक तत्व]
A --> D[भाग IV-क - मौलिक कर्तव्य]
B --> B1[समानता 14-18]
B --> B2[स्वतंत्रता 19-22]
B --> B3[शोषण विरुद्ध 23-24]
B --> B4[धार्मिक 25-28]
B --> B5[सांस्कृतिक 29-30]
B --> B6[उपचार 32 - रिटें]
C --> C1[ग्राम पंचायतें - अ. 40]
C --> C2[समान वेतन - अ. 39]
C --> C3[शिक्षा - अ. 45]
D --> D1[11 कर्तव्य]
D --> D2[42वाँ संशोधन 1976]
मौलिक अधिकार और कर्तव्य भारतीय संविधान की आत्मा हैं। इस अध्याय में हमने छह मौलिक अधिकारों (समानता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध, धार्मिक, सांस्कृतिक, संवैधानिक उपचार) के अनुच्छेद, पाँच प्रकार की रिटें, 11 मौलिक कर्तव्य तथा राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का अध्ययन किया। अनुच्छेद 32 को 'संविधान का हृदय और आत्मा' कहा गया है। मौलिक अधिकार न्यायसंगत हैं जबकि नीति-निदेशक तत्व गैर-न्यायसंगत हैं, यह अंतर परीक्षा में निर्णायक होता है। इन अनुच्छेदों और रिटों की तालिकाओं का पुनरावलोकन करने से रेलवे परीक्षा में सटीक उत्तर देना संभव होता है।