विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: सामान्य जागरूकता – अर्थव्यवस्था खेल और विज्ञान विषय-वस्तु: 22.4 मुद्रास्फीति और आर्थिक सूचकांक
मुद्रास्फीति (Inflation) किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में होने वाली निरंतर वृद्धि है, जिससे मुद्रा की क्रय शक्ति घटती है। जब समय के साथ वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं तो उसी राशि से कम वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं, इसे मुद्रास्फीति कहते हैं। मुद्रास्फीति की विपरीत स्थिति अपस्फीति (Deflation) है, जिसमें कीमतों में गिरावट आती है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 की सामान्य जागरूकता में मुद्रास्फीति, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI), थोक मूल्य सूचकांक (WPI) और GDP अपस्फीतिकारक से प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं। मुद्रास्फीति नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) मौद्रिक नीति में रेपो रेट और बैंक दर का प्रयोग करता है।
मुद्रास्फीति के प्रमुख प्रकारों में मांग-आधारित (Demand-Pull) और लागत-आधारित (Cost-Push) मुद्रास्फीति शामिल हैं। मांग-आधारित मुद्रास्फीति तब होती है जब आपूर्ति की तुलना में मांग अधिक होती है, जबकि लागत-आधारित मुद्रास्फीति तब होती है जब उत्पादन की लागत बढ़ जाती है और उत्पादक कीमतें बढ़ाते हैं। रेंगती (Creeping), चाल (Walking), सरपट (Galloping) और अति मुद्रास्फीति (Hyperinflation) मुद्रास्फीति की गति के आधार पर वर्गीकरण हैं। मुद्रास्फीति की दर को मापने के लिए विभिन्न सूचकांकों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें से CPI और WPI सबसे प्रमुख हैं।
इस अध्याय में हम मुद्रास्फीति की परिभाषा और प्रकार, CPI और WPI की संरचना, GDP अपस्फीतिकारक, मुद्रास्फीति नियंत्रण के उपाय और भारत में मुद्रास्फीति के वर्तमान आँकड़ों का अध्ययन करेंगे। परीक्षा की दृष्टि से सूचकांकों के आधार वर्ष, मुद्रास्फीति लक्ष्य, राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर सूचकांकों के प्रकार तथा मुद्रास्फीति के कारण और प्रभाव महत्वपूर्ण हैं। मुद्रास्फीति सूचकांक में खाद्य और ईंधन की कीमतों की भूमिका विशेष रूप से पूछी जाती है। अंत में तालिकाओं, माइंड मैप और चित्रों के माध्यम से पूरे विषय की पुनरावृत्ति की जाएगी।
मुद्रास्फीति को उसकी दर के आधार पर कई प्रकारों में बाँटा जाता है। रेंगती मुद्रास्फीति (Creeping Inflation) 2-3 प्रतिशत की वार्षिक दर होती है, जो अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक नहीं होती और आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है। चाल मुद्रास्फीति (Walking Inflation) 3-10 प्रतिशत की दर होती है, जबकि सरपट मुद्रास्फीति (Galloping Inflation) 10-100 प्रतिशत की दर होती है। अति मुद्रास्फीति (Hyperinflation) 100 प्रतिशत से अधिक होती है, जो अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी होती है। मुद्रास्फीति की दर 10 प्रतिशत से अधिक होने पर उसे द्वि-अंकीय मुद्रास्फीति कहा जाता है। मुद्रास्फीति की तीव्रता के अनुसार RBI की नीतियाँ निर्धारित होती हैं।
मुद्रास्फीति के कारणों में अतिरिक्त मांग, उत्पादन लागत में वृद्धि, मुद्रा आपूर्ति में अत्यधिक वृद्धि, आयात की कीमतों में वृद्धि और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान शामिल हैं। मांग-आधारित मुद्रास्फीति तब उत्पन्न होती है जब जनता के पास अधिक धन होता है, परंतु वस्तुओं की आपूर्ति सीमित होती है। लागत-आधारित मुद्रास्फीति तब होती है जब कच्चे माल, श्रम या ऊर्जा की लागत बढ़ती है, जिससे उत्पादक कीमतें बढ़ाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि भी लागत-आधारित मुद्रास्फीति का प्रमुख कारण है, क्योंकि भारत अपनी तेल आवश्यकता का बड़ा भाग आयात करता है। मानसून की विफलता से कृषि उत्पादन घटने पर खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ जाती है।
मुद्रास्फीति के प्रभाव में वेतनभोगी वर्ग की वास्तविक आय घटती है, ऋणदाताओं को हानि और ऋणियों को लाभ होता है, जमाकर्ताओं की क्रय शक्ति घटती है तथा स्थिर आय वाले लोगों (पेंशनभोगी) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मुद्रास्फीति से उत्पादकों और व्यापारियों को लाभ होता है क्योंकि उनकी वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं। परीक्षा में पूछा जाता है कि मुद्रास्फीति से किस वर्ग को लाभ और किसे हानि होती है। मुद्रास्फीति नियंत्रण के लिए मौद्रिक नीति (रेपो रेट बढ़ाना), राजकोषीय नीति (कर बढ़ाना, व्यय घटाना) और आपूर्ति प्रबंधन जैसे उपाय किए जाते हैं। RBI मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए प्रमुख रूप से रेपो रेट में वृद्धि करता है।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) खुदरा स्तर पर उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन को मापता है। CPI को खुदरा मुद्रास्फीति भी कहा जाता है। भारत में CPI के मुख्य प्रकार हैं — संयुक्त CPI (CPI-Combined) जो ग्रामीण और शहरी दोनों को कवर करता है, CPI-औद्योगिक श्रमिक (CPI-IW) और CPI-कृषि श्रमिक (CPI-AL)। सन् 2012 के बाद से संयुक्त CPI को मुद्रास्फीति का प्रमुख माप माना जाता है। CPI की गणना का आधार वर्ष 2012 है। CPI में खाद्य एवं पेय पदार्थों का भार सबसे अधिक होता है, जो लगभग 45-54 प्रतिशत है, क्योंकि खाद्य कीमतें घरेलू उपभोक्ताओं को सीधे प्रभावित करती हैं।
थोक मूल्य सूचकांक (WPI) थोक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन को मापता है, जिसमें केवल वस्तुएँ शामिल होती हैं और सेवाएँ शामिल नहीं होतीं। WPI का प्रबंधन कार्यालय आर्थिक सलाहकार (OEA), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा किया जाता है, जबकि CPI का प्रबंधन राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) करता है। WPI का आधार वर्ष 2011-12 है। WPI के अंतर्गत प्राथमिक वस्तुएँ, ईंधन एवं बिजली और विनिर्मित उत्पाद शामिल हैं। WPI को थोक मुद्रास्फीति कहा जाता है। भारत में RBI मौद्रिक नीति के लिए CPI का प्रयोग मुख्य लक्ष्य के रूप में करता है, जबकि WPI का उपयोग नीति निर्माण के लिए अतिरिक्त संकेतक के रूप में होता है।
GDP अपस्फीतिकारक (GDP Deflator) अर्थव्यवस्था की समग्र कीमतों के स्तर को मापने का एक व्यापक सूचकांक है। इसे नाममात्र GDP को वास्तविक GDP से भाग देकर प्राप्त किया जाता है। GDP अपस्फीतिकारक में अर्थव्यवस्था में उत्पादित सभी वस्तुएँ और सेवाएँ शामिल होती हैं, इसलिए इसे CPI और WPI की तुलना में अधिक व्यापक माप माना जाता है। GDP अपस्फीतिकारक = (नाममात्र GDP ÷ वास्तविक GDP) × 100। CPI और WPI में खाद्य पदार्थों का भार अधिक होता है, जबकि GDP अपस्फीतिकारक में पूरी अर्थव्यवस्था का भार होता है। परीक्षा में इन तीनों सूचकांकों की तुलना और उनके आधार वर्ष अक्सर पूछे जाते हैं।
भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्य की घोषणा मौद्रिक नीति समिति (MPC) द्वारा की जाती है। RBI अधिनियम 1934 में संशोधन करके मौद्रिक नीति समिति (MPC) का गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता RBI गवर्नर करते हैं। MPC का लक्ष्य खुदरा मुद्रास्फीति (CPI) को 4 प्रतिशत के केंद्रबिंदु के साथ 2 से 6 प्रतिशत की सीमा में बनाए रखना है। MPC में कुल 6 सदस्य होते हैं, जिनमें से 3 RBI द्वारा नामित और 3 सरकार द्वारा नियुक्त होते हैं। MPC की बैठक वर्ष में कम से कम चार बार होती है और इसमें रेपो रेट में परिवर्तन का निर्णय लिया जाता है। मुद्रास्फीति को लक्ष्य से अधिक होने पर RBI रेपो रेट बढ़ाता है ताकि मांग घटे और कीमतें स्थिर हों।
भारत में हाल के वर्षों में मुद्रास्फीति की स्थिति मिश्रित रही है। कोविड महामारी के बाद आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण मुद्रास्फीति में उतार-चढ़ाव देखा गया। खाद्य मुद्रास्फीति विशेष रूप से प्याज, टमाटर, दालों और अनाज की कीमतों से प्रभावित होती है। सरकार खाद्य मुद्रास्फीति नियंत्रित करने के लिए बफर स्टॉक, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का उपयोग करती है। RBI की दीर्घकालिक नीति का उद्देश्य मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखकर आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। मुद्रास्फीति के आँकड़े साप्ताहिक और मासिक रूप से जारी होते हैं।
आर्थिक सूचकांकों के अंतर्गत औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) भी महत्वपूर्ण है, जो औद्योगिक क्षेत्र के उत्पादन में परिवर्तन को मापता है। IIP का आधार वर्ष 2011-12 है। पूँजी बाजार में सेंसेक्स और निफ्टी जैसे शेयर सूचकांक भी आर्थिक स्वास्थ्य के संकेतक हैं। सेंसेक्स बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का सूचकांक है जो 30 प्रमुख कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि निफ्टी राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का सूचकांक है जो 50 प्रमुख कंपनियों पर आधारित है। मानव विकास सूचकांक (HDI) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा प्रकाशित होता है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और आय के आधार पर विकास को मापता है। परीक्षा में इन सूचकांकों के प्रकाशक और उनके आधार वर्ष से प्रश्न पूछे जाते हैं।
| प्रकार | दर | प्रभाव |
|---|---|---|
| रेंगती (Creeping) | 2-3 प्रतिशत | आर्थिक विकास सहायक |
| चाल (Walking) | 3-10 प्रतिशत | सामान्य |
| सरपट (Galloping) | 10-100 प्रतिशत | चिंताजनक |
| अति (Hyper) | 100 प्रतिशत से अधिक | विनाशकारी |
| सूचकांक | माप | आधार वर्ष | प्रकाशक |
|---|---|---|---|
| CPI | खुदरा मुद्रास्फीति | 2012 | NSO |
| WPI | थोक मुद्रास्फीति | 2011-12 | OEA/वाणिज्य मंत्रालय |
| GDP अपस्फीतिकारक | समग्र कीमत स्तर | वर्तमान-आधार अनुपात | NSO |
| IIP | औद्योगिक उत्पादन | 2011-12 | NSO |
| HDI | मानव विकास | प्रतिवर्ष | UNDP |
flowchart TD
A[मुद्रास्फीति और आर्थिक सूचकांक] --> B[मुद्रास्फीति]
A --> C[सूचकांक]
A --> D[नियंत्रण उपाय]
B --> B1[रेंगती 2-3%]
B --> B2[चाल 3-10%]
B --> B3[सरपट 10-100%]
B --> B4[अति 100%+]
B --> B5[मांग-आधारित]
B --> B6[लागत-आधारित]
C --> C1[CPI - खुदरा]
C --> C2[WPI - थोक]
C --> C3[GDP अपस्फीतिकारक]
C --> C4[IIP - औद्योगिक]
D --> D1[रेपो रेट बढ़ाना]
D --> D2[कर बढ़ाना]
D --> D3[व्यय घटाना]
D --> D4[आपूर्ति प्रबंधन]
मुद्रास्फीति और आर्थिक सूचकांक भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत के प्रमुख संकेतक हैं। इस अध्याय में हमने मुद्रास्फीति की परिभाषा, उसके प्रकार, कारण और प्रभाव का अध्ययन किया। CPI और WPI के आधार वर्ष, उनके प्रकाशक और उनके बीच का अंतर परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। GDP अपस्फीतिकारक को सबसे व्यापक माप के रूप में समझा गया। RBI की मौद्रिक नीति का लक्ष्य CPI मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत के आसपास बनाए रखना है। मुद्रास्फीति से विभिन्न वर्गों पर पड़ने वाले प्रभाव और नियंत्रण के उपायों का ज्ञान आवश्यक है। त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाओं और माइंड मैप की सहायता से इन तथ्यों को दोहराकर परीक्षा में निश्चित अंक प्राप्त किए जा सकते हैं।