विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: भौतिकी – यांत्रिकी विषय-वस्तु: 11.3 दूरी और विस्थापन
गति के अध्ययन में दो राशियाँ सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं — दूरी और विस्थापन। दूरी से तात्पर्य किसी वस्तु द्वारा अपने गति पथ पर तय की गई कुल लंबाई से है, जबकि विस्थापन वस्तु की प्रारंभिक और अंतिम स्थिति के बीच की सीधी रेखा की दूरी है। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में इन दोनों राशियों के बीच अंतर, उनकी गणना और उनके गुणों पर प्रतिवर्ष 2 से 4 प्रश्न पूछे जाते हैं। ये प्रश्न सामान्यतः अवधारणात्मक होते हैं, परंतु कुछ संख्यात्मक प्रश्न भी आते हैं।
दूरी एक अदिश राशि है, अर्थात केवल परिमाण होता है और दिशा नहीं होती। इसकी SI इकाई मीटर है। विस्थापन एक सदिश राशि है, अर्थात इसमें परिमाण के साथ दिशा भी होती है। विस्थापन की SI इकाई भी मीटर ही है। दूरी हमेशा धनात्मक होती है और कभी शून्य नहीं हो सकती जब तक वस्तु गति न करे, जबकि विस्थापन धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य तीनों हो सकता है। जब कोई वस्तु प्रारंभिक स्थिति पर लौट आती है, तो उसका विस्थापन शून्य हो जाता है, परंतु तय की गई दूरी शून्य नहीं होती।
इस अध्याय में हम दूरी और विस्थापन की परिभाषा, उनके बीच के अंतर, उनकी गणना की विधि तथा दूरी-समय और विस्थापन-समय ग्राफों का अध्ययन करेंगे। दूरी और विस्थापन में संबंध को समझना आगे के अध्यायों — चाल, वेग और त्वरण — के लिए आधारभूत है, क्योंकि चाल दूरी पर तथा वेग विस्थापन पर निर्भर करता है। रेलवे के संदर्भ में ट्रेन द्वारा तय की गई कुल पटरी की लंबाई दूरी है, जबकि दो स्टेशनों के बीच सीधी रेखीय दूरी विस्थापन की अवधारणा दर्शाती है।
दूरी वस्तु द्वारा अपने पथ पर तय की गई वास्तविक लंबाई है। यह गति पथ पर निर्भर करती है, अर्थात पथ जितना लंबा होगा दूरी उतनी ही अधिक होगी। उदाहरण के लिए, एक यात्री ट्रेन A स्टेशन से B स्टेशन तक वक्र पटरी से जाती है, तो दूरी उस वक्र पथ की कुल लंबाई होगी। दूरी हमेशा धनात्मक रहती है। एक सरल रेखा में गतिमान वस्तु के लिए दूरी और विस्थापन के परिमाण समान होते हैं, परंतु वक्र या टेढ़े-मेढ़े पथ पर दूरी, विस्थापन से अधिक होती है।
विस्थापन वस्तु की प्रारंभिक स्थिति से अंतिम स्थिति तक की सबसे छोटी (सीधी रेखीय) दूरी है, जिसमें दिशा भी शामिल होती है। यदि कोई वस्तु बिंदु P से चलकर Q तक पहुँचती है, तो विस्थापन P से Q की ओर की सदिश राशि है। विस्थापन गति पथ पर निर्भर नहीं करता, केवल प्रारंभिक और अंतिम स्थिति पर निर्भर करता है। इसीलिए कई अलग-अलग पथों से जाने पर भी विस्थापन समान रह सकता है, बशर्ते प्रारंभिक और अंतिम स्थिति समान हो। विस्थापन का परिमाण अधिकतम दूरी के बराबर तभी होता है जब पथ सीधा हो।
उदाहरण 1: एक रेलगाड़ी स्टेशन A से स्टेशन B तक जाती है जो सीधी पटरी पर 60 किलोमीटर दूर है, फिर वही पटरी वापस लौटकर A आ जाती है। तय की गई कुल दूरी और कुल विस्थापन ज्ञात कीजिए।
हल: दूरी = 60 + 60 = 120 किलोमीटर। चूँकि गाड़ी प्रारंभिक स्थिति A पर लौट आई है, इसलिए कुल विस्थापन = 0 किलोमीटर। अतः दूरी 120 किमी तथा विस्थापन शून्य होगा।
दूरी और विस्थापन में अनेक मौलिक अंतर हैं जिन्हें परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है। दूरी अदिश राशि है जबकि विस्थापन सदिश राशि है। दूरी हमेशा धनात्मक या शून्य होती है, जबकि विस्थापन धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य हो सकता है। दूरी गति पथ की लंबाई पर निर्भर करती है, जबकि विस्थापन केवल प्रारंभिक और अंतिम स्थिति पर निर्भर करता है। दूरी कभी विस्थापन से कम नहीं होती, जबकि विस्थापन दूरी के बराबर या उससे कम होता है।
दूरी और विस्थापन में संबंध यह है कि विस्थापन का परिमाण हमेशा दूरी से छोटा या बराबर होता है। यदि वस्तु सीधी रेखा में एक ही दिशा में चलती है तो दूरी और विस्थापन के परिमाण बराबर होते हैं, अन्यथा विस्थापन छोटा होता है। जब वस्तु प्रारंभिक बिंदु पर लौट आती है, तो विस्थापन शून्य होता है जबकि दूरी धनात्मक होती है। दूरी और विस्थापन दोनों की SI इकाई मीटर है, परंतु दिशा के कारण विस्थापन के साथ दिशा भी लिखी जाती है। इसी कारण औसत चाल और औसत वेग में भी अंतर आता है, क्योंकि चाल दूरी पर तथा वेग विस्थापन पर आधारित है।
उदाहरण 2: एक लड़का बिंदु O से पूर्व दिशा में 8 किलोमीटर चलता है, फिर पश्चिम दिशा में लौटकर 5 किलोमीटर चलता है। उसकी तय दूरी और विस्थापन ज्ञात कीजिए।
हल: तय दूरी = 8 + 5 = 13 किलोमीटर। प्रारंभिक स्थिति से अंतिम स्थिति = 8 - 5 = 3 किलोमीटर पूर्व दिशा में। अतः दूरी 13 किमी तथा विस्थापन 3 किमी पूर्व की ओर होगा।
दूरी-समय ग्राफ में समय को क्षैतिज अक्ष पर और दूरी को ऊर्ध्वाधर अक्ष पर रखा जाता है। यदि दूरी-समय ग्राफ एक सरल रेखा है, तो वस्तु एकसमान चाल से चल रही है। इस ग्राफ का ढाल वस्तु की चाल बताता है। यदि ग्राफ समय अक्ष के समांतर हो तो वस्तु स्थिर है। विस्थापन-समय ग्राफ भी इसी प्रकार होता है, परंतु इसका ढाल वेग बताता है और इसमें ऋणात्मक मान भी संभव हैं। इस प्रकार दोनों ग्राफों से वस्तु की गति की प्रकृति का पता चलता है।
वृत्तीय गति में विस्थापन की एक विशेष स्थिति होती है। जब कोई वस्तु वृत्ताकार पथ का पूरा एक चक्कर लगाती है, तो उसकी तय दूरी वृत्त की परिधि 2πr के बराबर होती है, जबकि विस्थापन शून्य होता है, क्योंकि वस्तु प्रारंभिक बिंदु पर लौट आती है। यदि वस्तु आधा चक्कर लगाती है, तो दूरी πr होती है और विस्थापन व्यास 2r के बराबर होता है। वृत्तीय गति के प्रश्न रेलवे परीक्षा में प्रायः पूछे जाते हैं। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति 400 मीटर भुजा वाले वर्गाकार मैदान के चारों कोनों पर क्रमशः पहुँचता है, तो विस्थापन क्रमशः 400 मीटर, 400√2 मीटर, 400 मीटर और शून्य होता है।
उदाहरण 3: एक पहिया 7 मीटर त्रिज्या के वृत्ताकार मैदान में एक पूरा चक्कर लगाता है। तय दूरी तथा विस्थापन ज्ञात कीजिए।
हल: दूरी = परिधि = 2πr = 2 × (22/7) × 7 = 44 मीटर। एक पूरा चक्कर लगाने पर वस्तु प्रारंभिक बिंदु पर लौटती है, अतः विस्थापन = 0 मीटर। उत्तर दूरी 44 मीटर तथा विस्थापन शून्य है।
| लक्षण | दूरी | विस्थापन |
|---|---|---|
| राशि का प्रकार | अदिश | सदिश |
| दिशा | नहीं होती | होती है |
| चिह्न | सदैव धनात्मक | धन, ऋण या शून्य |
| पथ पर निर्भरता | होती है | नहीं होती |
| प्रारंभिक स्थिति पर लौटने पर | धनात्मक | शून्य |
| SI इकाई | मीटर | मीटर |
| स्थिति | तय दूरी | विस्थापन |
|---|---|---|
| पूरा चक्कर | 2πr | 0 |
| आधा चक्कर | πr | 2r |
| चौथाई चक्कर | πr/2 | r√2 |
flowchart TD
A[दूरी और विस्थापन] --> B[दूरी]
A --> C[विस्थापन]
A --> D[ग्राफ विधि]
B --> B1[अदिश राशि]
B --> B2[पथ की कुल लंबाई]
B --> B3[सदैव धनात्मक]
C --> C1[सदिश राशि]
C --> C2[प्रारंभिक-अंतिम स्थिति]
C --> C3[धन ऋण या शून्य]
D --> D1[दूरी-समय ग्राफ ढाल = चाल]
D --> D2[विस्थापन-समय ग्राफ ढाल = वेग]
A --> E[वृत्तीय गति]
E --> E1[पूर्ण चक्कर विस्थापन शून्य]
दूरी और विस्थापन गति की दो मौलिक राशियाँ हैं जो भौतिकी के आधारभूत ज्ञान का हिस्सा हैं। इस अध्याय में हमने दूरी को अदिश राशि और विस्थापन को सदिश राशि के रूप में समझा, उनके बीच के अंतर का अध्ययन किया तथा वृत्तीय पथ जैसी विशेष स्थितियों में उनकी गणना सीखी। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 परीक्षा में ये अवधारणाएँ चाल, वेग और त्वरण के प्रश्नों का आधार हैं, इसलिए इनकी स्पष्ट समझ अनिवार्य है। दूरी और विस्थापन के साथ-साथ चाल और वेग में भी ठीक यही अंतर लागू होता है। इन मौलिक अंतरों को दृढ़ता से समझ लेने पर परीक्षा के गति-संबंधी प्रश्न सरलता से हल हो जाते हैं और आगे के अध्यायों की नींव भी मजबूत बनती है।