विषय: रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 अध्याय: सामान्य जागरूकता – समसामयिकी और पर्यावरण विषय-वस्तु: 23.7 जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन आज विश्व की सबसे गंभीर वैश्विक चुनौतियों में से एक है, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है और मौसम के पैटर्न में असामान्य परिवर्तन हो रहे हैं। रेलवे टेक्नीशियन ग्रेड 3 की परीक्षा में जलवायु परिवर्तन से संबंधित प्रश्न सामान्य जागरूकता खंड में नियमित रूप से पूछे जाते हैं। ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीनहाउस प्रभाव, समुद्र स्तर में वृद्धि, हिमनदों का पिघलना और चरम मौसमी घटनाएँ इसके प्रमुख पहलू हैं। इनके अलावा जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए होने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौते जैसे क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता पर भी प्रश्न पूछे जाते हैं।
जलवायु परिवर्तन की मूलभूत समझ के लिए ग्रीनहाउस प्रभाव की अवधारणा आवश्यक है। पृथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित ग्रीनहाउस गैसें सूर्य से आने वाली ऊष्मा को रोकती हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान जीवन के लिए अनुकूल रहता है। परंतु इन गैसों की अत्यधिक मात्रा के कारण तापमान सामान्य से अधिक बढ़ रहा है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग कहा जाता है। मानवीय गतिविधियाँ जैसे जीवाश्म ईंधनों का जलना, वनों की कटाई और औद्योगिक उत्सर्जन ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि के मुख्य कारण हैं। ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड सबसे अधिक योगदान देती है।
इस अध्याय में हम जलवायु परिवर्तन के कारणों, प्रभावों और इसे रोकने के उपायों का विस्तार से अध्ययन करेंगे। साथ ही अंतरराष्ट्रीय प्रयासों जैसे IPCC रिपोर्ट, क्योटो प्रोटोकॉल, पेरिस समझौता और COP सम्मेलनों की जानकारी भी लेंगे। भारत के स्तर पर चल रहे जलवायु कार्यक्रमों जैसे राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) और इसके आठ मिशनों के बारे में भी जानेंगे। जलवायु परिवर्तन का अध्ययन न केवल परीक्षा के लिए, बल्कि वर्तमान वैश्विक स्थिति को समझने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जलवायु परिवर्तन के दो मुख्य वर्गों के कारण हैं: प्राकृतिक कारण और मानवीय कारण। प्राकृतिक कारणों में ज्वालामुखी विस्फोट, सौर विकिरण में परिवर्तन और पृथ्वी की कक्षा में परिवर्तन शामिल हैं। परंतु वर्तमान में हो रहे तीव्र जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण मानवीय गतिविधियाँ हैं। जीवाश्म ईंधनों (कोयला, पेट्रोल, डीज़ल) का जलना कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत है। औद्योगिक प्रक्रियाएँ, बिजली उत्पादन और परिवहन क्षेत्र ग्रीनहाउस गैसों के प्रमुख स्रोत हैं। वनों की कटाई से वायुमंडल में CO2 की मात्रा बढ़ती है, क्योंकि वृक्ष CO2 अवशोषित करते हैं।
मीथेन (CH4) एक अन्य महत्वपूर्ण ग्रीनहाउस गैस है, जो पशुपालन, चावल की खेती और लैंडफिल से उत्सर्जित होती है। नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) कृषि में उर्वरकों के उपयोग से निकलती है। फ्लोरिनेटेड गैसें (F-gases) प्रशीतन और एयर कंडीशनिंग में उपयोग होती हैं। ये सभी गैसें ग्रीनहाउस प्रभाव को बढ़ाती हैं। कार्बन डाइऑक्साइड का औद्योगिक क्रांति के बाद से स्तर 280 ppm से बढ़कर अब 420 ppm से अधिक हो गया है। औद्योगिक क्रांति के बाद वैश्विक तापमान में लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। ये आँकड़े परीक्षा में पूछे जा सकते हैं।
शहरीकरण और भूमि उपयोग में परिवर्तन भी जलवायु परिवर्तन के कारण हैं। शहरों में कंक्रीट के भवन, सड़कें और वाहनों की अधिकता से ऊष्मा द्वीप प्रभाव (Urban Heat Island) उत्पन्न होता है। इसके अलावा भूमि की निकासी और मृदा क्षरण से भी कार्बन चक्र प्रभावित होता है। जलवायु परिवर्तन के इन सभी कारणों को समझकर उनके नियंत्रण के उपाय तय किए जाते हैं। परीक्षा में ग्रीनहाउस गैसों के स्रोत और उनके योगदान से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए इन कारणों की सटीक जानकारी आवश्यक है।
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव व्यापक हैं, जिनमें समुद्र स्तर में वृद्धि सबसे गंभीर है। हिमनदों और ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, जिससे तटीय क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ता है। ग्लेशियरों के पिघलने से मीठे पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है, जो लाखों लोगों के लिए जल आपूर्ति का स्रोत हैं। चरम मौसमी घटनाएँ जैसे चक्रवात, बाढ़, सूखा, लू (heat wave) और जंगल की आग की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। ये घटनाएँ कृषि को नुकसान पहुँचाती हैं और खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा करती हैं। परीक्षा में इन प्रभावों के नाम और उनके परिणामों पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
जलवायु परिवर्तन का कृषि पर सीधा प्रभाव पड़ता है। बदलता मौसम फसलों के उत्पादन को प्रभावित करता है, जिससे खाद्यान्न की कमी और कीमतों में वृद्धि होती है। अत्यधिक वर्षा और सूखे की स्थितियाँ किसानों की आय को प्रभावित करती हैं। जैव विविधता पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ता है, क्योंकि कई प्रजातियाँ बदलते तापमान के अनुसार अनुकूलन नहीं कर पातीं और विलुप्ति के कगार पर पहुँच जाती हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में गर्मी से होने वाली मृत्यु, संक्रामक रोगों का फैलाव और वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ती हैं। जलवायु शरणार्थियों की समस्या भी बढ़ रही है, जिसमें लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने को मजबूर हैं।
भारत के संदर्भ में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव विशेष रूप से गंभीर हैं। हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जो गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के जल स्रोत हैं। मानसून के पैटर्न में परिवर्तन से अनिश्चित वर्षा होती है। तटीय क्षेत्रों जैसे मुंबई, चेन्नई और कोलकाता में समुद्र स्तर वृद्धि का खतरा है। गर्मी की लहरों (heatwaves) से उत्तर भारत में कई जिले प्रभावित होते हैं। इन प्रभावों से निपटने के लिए भारत ने राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु अनुकूलन और शमन उपाय अपनाए हैं। परीक्षा में भारत विशिष्ट प्रभावों पर भी प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए इन्हें ध्यान से पढ़ें।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रयास हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल (IPCC) की स्थापना 1988 में की, जो जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक रिपोर्टें जारी करता है। क्योटो प्रोटोकॉल 1997 में अपनाया गया, जिसे 2005 में लागू किया गया। पेरिस समझौता 2015 में हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखना और 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयास करना है। COP (Conference of Parties) सम्मेलन हर वर्ष होते हैं। COP26 ग्लासगो और COP27 शर्म अल-शेख में हुआ था। इन सम्मेलनों की जानकारी परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए 2008 में राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) बनाई, जिसमें आठ राष्ट्रीय मिशन शामिल हैं। इनमें राष्ट्रीय सौर मिशन, राष्ट्रीय बढ़ी हुई ऊर्जा दक्षता मिशन, राष्ट्रीय सतत आवास मिशन, राष्ट्रीय जल मिशन, राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी मिशन, राष्ट्रीय हरित भारत मिशन, राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन और जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय ज्ञान मिशन प्रमुख हैं। इन आठ मिशनों में से पहला राष्ट्रीय सौर मिशन सबसे अधिक प्रचलित है। इन मिशनों के नाम और उद्देश्य पर परीक्षा में प्रश्न पूछे जाते हैं।
भारत ने COP26 में पंचामृत (Panchamrit) का संकल्प लिया, जिसके तहत 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, 50 प्रतिशत ऊर्जा आवश्यकताएँ नवीकरणीय स्रोतों से, कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 बिलियन टन की कमी और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा गया। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की स्थापना भारत और फ्रांस ने मिलकर की, जिसका मुख्यालय गुरुग्राम में है। इन घोषणाओं और लक्ष्यों पर परीक्षा में निश्चित प्रश्न पूछे जाते हैं। जलवायु परिवर्तन के इस अध्याय को तैयार करने के लिए समझौतों के वर्ष, स्थान और उद्देश्यों को तालिका के रूप में व्यवस्थित करके पढ़ना सबसे प्रभावी है।
| समझौता | वर्ष | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|
| क्योटो प्रोटोकॉल | 1997 | ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी |
| पेरिस समझौता | 2015 | तापमान वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखना |
| COP26 | 2021 | ग्लासगो में जलवायु प्रतिज्ञाएँ |
| COP27 | 2022 | शर्म अल-शेख सम्मेलन |
| NAPCC | 2008 | भारत की आठ मिशनों वाली कार्य योजना |
| ग्रीनहाउस गैस | प्रमुख स्रोत |
|---|---|
| कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) | जीवाश्म ईंधन, उद्योग |
| मीथेन (CH4) | पशुपालन, लैंडफिल |
| नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) | उर्वरक, कृषि |
| फ्लोरिनेटेड गैसें (F-gases) | प्रशीतन, एयर कंडीशनिंग |
flowchart TD
A[जलवायु परिवर्तन] --> B[कारण]
A --> C[प्रभाव]
A --> D[अंतरराष्ट्रीय प्रयास]
A --> E[भारत की पहलें]
B --> B1[जीवाश्म ईंधन]
B --> B2[वनों की कटाई]
B --> B3[औद्योगिक उत्सर्जन]
C --> C1[समुद्र स्तर वृद्धि]
C --> C2[चरम मौसम]
C --> C3[खाद्य सुरक्षा]
D --> D1[IPCC]
D --> D2[क्योटो प्रोटोकॉल]
D --> D3[पेरिस समझौता]
E --> E1[NAPCC]
E --> E2[पंचामृत लक्ष्य]
E --> E3[अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन]
जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक संकट है जो पृथ्वी के तापमान, मौसम और पारिस्थितिकी तंत्र को गहराई से प्रभावित करता है। इस अध्याय में हमने जलवायु परिवर्तन के कारणों, ग्रीनहाउस गैसों, प्रभावों और अंतरराष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे प्रयासों का विस्तार से अध्ययन किया। क्योटो प्रोटोकॉल, पेरिस समझौता, NAPCC और पंचामृत जैसे विषय परीक्षा में अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। इन तथ्यों को तालिकाओं में सुव्यवस्थित करके पुनरावृत्ति करने से यह खंड आसानी से तैयार हो जाता है। अब अगले अध्याय में हम जैव विविधता और संरक्षण का अध्ययन करेंगे।